April 19, 2010

विश्व धरोहर की बाट जोहता सिरपुर

सिरपुर की प्राचीनता का सर्वप्रथम परिचय शरभपुरीय शासक प्रवरराज तथा महासुदेवराज के ताम्रपत्रों से उपलब्ध होता है जिनमें 'श्रीपुर' से भूमिदान दिया गया था। पाण्डुवंशीय शासकों के काल में सिरपुर महत्वपूर्ण राजनैतिक व सांस्कृतिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। महाशिवगुप्त बालार्जुन के 57 वर्षीय सुदीर्घ शासनकाल में यहां अनेक मंदिर, बौद्ध विहार, सरोवर तथा उद्यानों का निर्माण करवाया गया।
महानदी के तट पर स्थित प्राचीन छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोशल) की राजधानी सिरपुर में जैसे जैसे उत्खनन का कार्य आगे बढ़ते जा रहा हैं वैसे- वैसे अतीत में छुपी अनेक पुरातात्विक, व ऐतिहासिक घटनाओं का खुलासा भी होते जा रहा है जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि व वास्तुकला के अकाट्य प्रमाण हैं।
सिरपुर प्राचीन काल में श्रीपुर के नाम से विख्यात रहा है तथा पाण्डुवंशीय शासकों के काल में इसे दक्षिण कोशल की राजधानी होने का गौरव प्राप्त रहा है। सिरपुर की प्राचीनता का सर्वप्रथम परिचय शरभपुरीय शासक प्रवरराज तथा महासुदेवराज के ताम्रपत्रों से उपलब्ध होता है जिनमें 'श्रीपुर' से भूमिदान दिया गया था। पाण्डुवंशीय शासकों के काल में सिरपुर महत्वपूर्ण राजनैतिक व सांस्कृतिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। महाशिवगुप्त बालार्जुन के 57 वर्षीय सुदीर्घ शासनकाल में यहां अनेक मंदिर, बौद्ध विहार, सरोवर तथा उद्यानों का निर्माण करवाया गया। सातवीं सदी ईस्वी में चीन के महान पर्यटक व विद्वान ह्वेनत्सांग ने सिरपुर की यात्रा की थी। उस समय यहां लगभग 100 संघाराम थे तथा महायान संप्रदाय के 10,000 भिक्षु निवास करते थे। महाशिवगुप्त बालार्जुन ने स्वयं शैव मतावलंबी होते हुए भी बौद्ध विहारों को उदारतापूर्वक प्रचुर दान देकर संरक्षण प्रदान किया था।
वर्तमान में चल रही खुदाई से सिरपुर में कई बड़े-बड़े शिव मंदिर तथा पंचायतन शैली के मंदिर मिले हैं, जिसे भारत का सबसे बड़ा मंदिर माना जा है। इसके अलावा अनेक भव्य बौद्ध मठ, बौद्ध विहार, घंटा घर, वैदिक पाठशाला और कई प्राचीन शिलालेख प्राप्त हुए हैं। बौद्ध स्तूप और राजप्रासाद एवं ईसा पूर्व छठवीं शताब्दी में पत्थरों से निर्मित तहखाना और एक आयुर्वेदिक स्नानागार भी मिला है। जिस स्थान पर तहखाना और घंटाघर मिला है, वहीं पर 36 अन्नागार और 9 आयुर्वेदिक स्नानकुंड प्राप्त हुए हैं यह सब इस बात को इंगित करते हैं कि सिरपुर के इतिहास को नए सिरे से परिभाषित करना होगा।
मंदिरों का नगर
यहां का प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर छठवीं शताब्दी में निर्मित भारत का सबसे पहले ईंटों से बना मंदिर है। यह मंदिर सोमवंशी राजा हर्षगुप्त की विधवा रानी बासटा देवी द्वारा बनवाया गया था। इस मंदिर के समीप ही ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व का राम मंदिर है, जो भग्नावस्था में है। इसके अलावा यहां सोमवंशी राजाओं की वंशावली को दर्शाने वाले अनेक दर्शनीय मंदिर हैं हैं- गंधेश्वर महोदव मंदिर, शिव मंदिर, राधाकृष्ण मंदिर, चण्डी मंदिर।
सांची के स्तूपों से भिन्न स्तूप
सिरपुर की खुदाई में एक किलोमीटर की परिधि में फैले दूसरी शताब्दी के अवशेषों के अंतर्गत जो स्तूप मिले हैं उन स्तूपों का सीधा संबंध भगवान बुद्ध से है। इन स्तूपों के संबंध में बताया जाता है कि ये स्तूप सांची के स्तूपों से अलग हैं और पत्थर के बने हैं। पत्थरों के स्तूपों के बारे में कहा जाता है कि ऐसे स्तूप तो बुद्ध ही बनाते थे। पुरातत्व विभाग के अधिकारी बताते हैं कि बौद्ध ग्रंथों में इस बात का उल्लेख है कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी में भगवान बुद्ध सिरपुर आए थे। यहां के स्तूप उसी समय के हैं।
हाल की खुदाई में यहां प्राप्त 184 टीलो के नीचे स्वणर््िाम इतिहास दबा हुआ है। यहां जो स्तूप मिले हैं उन्हें सम्राट अशोक के काल का स्तूप माना गया है। स्तूप मिलने के बाद अब यहां की संस्कृति ईसा से तीन सदी पूर्व की मानी जाएगी। पुरातत्ववेत्ता डॉ. अरुणकुमार शर्मा के अनुसार जातक कथाओं मे भी इस बात का उल्लेख है कि महात्मा बुद्ध छत्तीसगढ़ आए थे। वे जहां- जहां गये थे वहां सम्राट अशोक ने उनके निर्वाण के बाद स्तूप बनवाये थे। अब छत्तीसगढ़ मे स्तूप मिलने से उनके यहां आने की पुष्टि तो होती ही है, एक नए इतिहास की शुरुआत भी हो जाती है।
बौद्ध विहार
यहां दो बौद्ध विहार के अवशेष प्राप्त हुए हैं इनका निर्माण भी ईंटों से हुआ है। विहार के मुख्य कक्ष में भगवान बुद्ध की साढ़े छै फुट ऊंची प्रतिमा प्रस्थापित है। इसके अतिरिक्त यहां अवलोकितेश्वर और मकर वाहिनी गंगा भी मिली है। अभिलेख से ज्ञात होता है महाशिव गुप्त बालार्जुन के राज्य में आनंदप्रभु नामक भिक्षु ने इस विहार का निर्माण करवाया था। दो मंजिला इस मठ में 14 कमरे थे। इसी के पास एक ध्वस्त विहार भी प्राप्त हुआ है। यहां भी बुद्ध की प्रतिमा है।
घंटाघर
यहां प्राप्त घंटाघर के संदर्भ में पुरातत्ववेत्ता डॉ. अरुण कुमार शर्मा का कहना है कि समय के ज्ञान के लिए तब घड़ी जैसे उपकरणों का अविष्कार नहीं हुआ था तब यह घंटाघर ही सिरपुर व्यवसायियों और रहवासियों के लिए समय की जानकारी देने का एकमात्र साधन रहा होगा। प्राचीनकाल में घंटा, मिनट और सेकंड के स्थान पर पहर, पल और छिन समय के सूचक हुआ करते थे। रात्रिकाल को चार पहर में बांटा गया था। सिरपुर में मिले लगभाग 2600 वर्ष पुराने लोहे- तांबे जैसे कठोर धातु से निर्मित इस घंटे को ईसा पूर्व तीसरी-चौथी सदी का बताया जा रहा है। मिट्टी में सैकड़ों साल तक दबे रहने और जंग लगने से घंटा जीर्ण अवस्था में है। घंटे के साथ ही दो छोटी घंटियंा भी मिली हैं। बड़े घंटे की लंबाई 33 सेमी, चौड़ाई 26 सेमी और मोटाई 16 सेमी है।
पुरातन वैदिक पाठशाला
उत्खनन में 5वीं शताब्दी में बनाई गई वैदिक पाठशाला के प्रमाण भी यहां देखे जा सकते हैं। इस वैदिक पाठशाला को अरुणकुमार शर्मा के निर्देशन में खोजा गया है। 10 मीटर लंबाई व 1. 5 मीटर चौड़ाई के कमरों के बीचोंबीच में विष्णु की मूर्ति मिली है। इस कमरे में 60 विद्यार्थियों के पढऩे की व्यवस्था थी। डॉ. शर्मा के अनुसार यह भारत में खोजी गई सबसे प्राचीन पाठशाला है। यहां पर शिक्षकों के कमरें भी मिले हैं।
भव्य स्नान कुंड
डॉ. शर्मा ने नगर संरचना के उत्खनन में एक सार्वजनिक मकान खोजा है, जिसमें बरामदे ही बरामदे हैं। इसके अलावा यहां सफेद पत्थरों से निर्मित कुंड निकला है। 3.6 मीटर लंब व चौड़े कुंड की गहराई 70 सेंटीमीटर है।
कुंड के चारों तरफ 12 स्तम्भ भी थे। इनके अवशेष के रूप में आधार स्तम्भ शेष बचे हैं। कुंड के उत्तर पूर्व में तुलसी चौरा है। इसमें जल की निकासी के लिए एक भूमिगत नाली से जोड़कर कुंड से मिलाया गया है। कुंड के दक्षिण-पश्चिम कोने पर भी भूमिगत नाली से जल निकासी के काम करने के प्रमाण यहां पर मिले हैं। यह कुंड संभवत: आयुर्वेदिक स्नान के लिए प्रयुक्त होता था। कुंड में नीम की पत्तियां डालने का अनुमान हो सकता है। यहां पर संभवत: तेल स्नान पद्धति का भी उपयोग किया जाता रहा होगा।
यहां सात धान्य भंडार भी मिले हैं। इसमें तुलसी और नीम पत्ती व गेरू के टुकड़े रखकर दीमक से सुरक्षा करने के प्रमाण मिले हैं।
व्यापारिक नगरी का प्रमाण
औद्योगिक नगर की प्रतिष्ठा शरभपुरिया और पांडूवंशीय काल में सिरपुर का वैभव एक महान राजधानी के तौर पर था लेकिन हाल में मिले साक्ष्यों से इस बात की पुष्टि हो गई है कि इससे पहले भी इसकी ख्याति औद्योगिक उत्पादनों के लिए थी। सातवाहनों का प्रभुत्व इस नगर पर तीसरी सदी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईसवी तक रहा। महानदी के तट पर स्थित सिरपुर अरब देशों में चावल निर्यात का प्रमुख केंद्र था। सूरत बंदरगाह होते हुए सदियों पूर्व अरबदेश के व्यापारी यहां आते थे।
उत्खनन के निदेशक डा. अरुण शर्मा ने बताया कि वहां पानी के बड़े कुंड के पास एक कमरा मिला है। इसमें सोने के गहने और कांच की चूडिय़ों की ढलाई होती थी। 10 सेमी लंबा और ढाई सेमी चौड़ा स्लेटी प्रस्तर खंड पर एक ऐसा सांचा मिला है जिसमें बारीक नक्काशीदार आकृतियां हैं। जिसे दो हजार वर्ष पहले की सातवाहन काल का बताया जाता है। सोने को गलाने के बाद इसमें डाला जाता था। आम और कई आकर्षक आकृतियों में गहनों की ढलाई कर ली जाती। गहने ही नहीं यहां बनाई जाने वाली कांच की चूडिय़ों की मांग देश के कई हिस्सो में होती थी। सोने-चांदी और कांच का सामान पिघलाने में इस्तेमाल होने वाले मिट्टी के पात्र भी पाए गए हैं। बड़े पैमाने पर गहने और कांच की चूडिय़ों का उत्पादन कर इनका गुजरात, उड़ीसा समेत देश के कई हिस्सों में व्यापार होता था।
राम वनवास और सिरपुर
खुदाई में जो तथ्य सामने आ रहे हैं उससे फिर से इस बात की पुष्टि हुई है कि भगवान श्रीराम को जब 14 साल का वनवास मिला था तब उनको सिरपुर से होकर ही दक्षिण की तरफ जाना पड़ा था। श्रीराम के छत्तीसगढ़ के सिरपुर से होकर जाने के और कई प्रमाण पहले से भी छत्तीसगढ़ में मौजूद हैं जैसे आरंग में अहिल्या का स्थान होने के साथ तुरतुरिया में बाल्मीकि का आश्रम। सात ही दंडकारण्य जाने का सबसे बेहतर रास्ता सिरपुर से होकर ही जाता था। श्रीराम ने शबरी से जो बेर खाए थे उसे सिरपुर के आस-पास के जंगलों में ही बताया जाता है।
शबरी जहां रहती थीं उस नगर को शबरीपुर कहा जाता था। शबरीपुर का उल्लेख अलेक्जेंडर कनिंघम की पुस्तक में भी मिलता है जो उन्होंने 1872 में लिखी थी। इस पुस्तक में शबरीपुर के साथ इस बात का भी उल्लेख है। यह बात भी स्थापित है कि सिरपुर में ही देश का प्रमुख चौराहा था। इस चौराहे से गुजरे बिना कोई भी दूसरी दिशा में जा ही नहीं सकता था। जहां किसी को दक्षिण की और जाना होता था तो उसको इलाहाबाद, सतना, अमरकंटक के बाद सिरपुर होकर ही दक्षिण की और जाना पड़ता था। श्रीराम भी दक्षिण जाने के लिए इस चौराहे से होकर गए थे। इस मार्ग का उपयोग उस समय ज्यादा इसलिए भी होता था क्योंकि यही एक ऐसा मार्ग था जिस मार्ग में नदियां कम पड़ती थी।
मंदोदरी पिता ने की टाउन प्लानिंग
ढाई हजार साल पुराने सिरपुर की खुदाई कर रहे पुरातत्ववेत्ताओं का यह भी दावा है कि इस शहर की डिजाइन लंका के राजा रावण के ससुर मय ने बनाया है। रावण की पत्नी मंदोदरी के पिता मय का जिक्र पुराणों और पुरानी तमिल पांडुलिपियों में अद्वितीय वास्तुविद के रूप में मिलता है। सिरपुर के महल, शहर संरचना, राजधानी के लिए जगह के चयन से लेकर ईंटों को जोडऩे के लिए प्रयुक्त गारे तक में वही सामग्री इस्तेमाल हुई है, जिसका जिक्र 10 हजार साल पहले मय ने किया था।
भवन निर्माण की सारी विधियों को संस्कृत भाषा में लिखी गई पांडुलिपियों में सुरक्षित किया गया था। कुछ साल पहले इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली ने इन पांडुलिपियों को मयमतम् (मय के विचार) किताब के रूप में प्रकाशित किया था। डेढ़ हजार से ज्यादा पेजों की दो हिस्सों में छपी किताब का अंग्रेजी में अनुवाद बेल्जियम के ब्रूनो डेगन्स ने किया है, जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वास्तुविद और संस्कृत के शिक्षक हैं। ग्रंथ के हिसाब से पांडुवंशी राजाओं ने सिरपुर को ऐसे स्थान पर बसाया, जहां पीली मिट्टी थी और उसका आकार नदी की धारा के साथ-साथ धनुष जैसा था। शहर की बाहरी दीवार नदी के धारा के समानांतर ठीक 22 से 30 डिग्री के कोण पर थी। मयमतम् के अनुसार नदी से लगी दीवारों के ऐसे कोण से बाढ़ में भी शहर को नुकसान नहीं पहुंचता। सिरपुर का ढाल भी किताब के अनुसार पूर्व से पश्चिम की तरफ है।
सिरपुर में अब तक मिले 17 शिवमंदिरों में भी एक खास सिद्धांत का प्रयोग हुआ है, जिन्हें भी वास्तुविद और भगवान शिव के भक्त मय ने बनाया था। सिद्धांत के अनुसार मंदिर का दरवाजा शिवलिंग के आकार से दोगुना बड़ा और मंदिर का शिखर आठ गुना होना चाहिए। जांच में पाया गया कि सारे शिवमंदिर उसी गणना के अनुरूप बने हैं। आज हम आधुनिक शहरों में भूमिगत नाली की व्यवस्था की बात करते हैं, लेकिन सिरपुर में 1800 से 2500 साल पुराने मकानों में पहले से ही यह व्यवस्था थी। शहर की कुछ भूमिगत नालियां तो एक किमी से भी ज्यादा लंबी मिलीं है।
ईंटों की जुड़ाई का फार्मूला
मकान, मंदिरों में इस्तेमाल ईंटों की जुड़ाई में मसाले की जगह फेविकोल जैसे पेस्ट का बखूबी इस्तेमाल किया गया था। सीमेंट से कहीं ज्यादा मजबूत जुड़ाई करने वाले पेस्ट के नमूने को शर्मा ने केमिकल टेस्ट के लिए देहरादून के लैब में भेजा था। जांच से उन्हें पता चला कि पेस्ट तैयार करने के लिए हजारों साल पुराने फार्मूले का इस्तेमाल हुआ था। इसे बबूल की गोंद, अलसी के तेल, भूसे, सड़े हुए गुड़, कुछ जड़ी-बूटियों के मिश्रण को सड़ाकर तैयार किया जाता था।
विश्व धरोहर की बाट जोहता सिरपुर?
सिरपुर के इन पुरातन विशेषताओं के देखते हुए लंबे समय से इसे विश्व धरोहर घोषित कराने की मांग की जा रही है परंतु इस पर अभी तक गंभीरता से विचार नहीं किया गया है। राज्य सरकार को चाहिए कि वह इस ओर पुन: प्रयास आरंभ करे ताकि विश्व के पर्यटन मानचित्र पर सिरपुर का नाम भी प्रमुकता से आए और आधिक से अधिक देशी और विदेशी पर्यटक इस ओर आकर्षित हों वैसे राज्य सरकार ने वर्ष 2006 से सिरपुर महोत्सव का आयोजन प्रारंभ कर किया है जिससे सिरपुर को राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक विशेष पहचान मिली है। इसके बावजूद अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
(उदंती फीचर्स)

0 Comments:

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष