December 02, 2009

हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा


- विनोद साव
आरंभ से छत्तीसगढ़ अंचल में शिक्षा का माध्यम हिंदी भाषा रही है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर स्नातक परीक्षाओं तक। मेडिकल और इंजीनियरिंग शिक्षा को छोड़कर हिंदी ही शिक्षा का उपयुक्त माध्यम मानी जाती रही है। सरकारी क्षेत्र में कार्यालयीन कामकाज के लिए भी जनता और सरकार के बीच की भाषा एकमात्र हिंदी ही रही है। शिक्षा माध्यम और सरकारी कामकाज के लिए इस अंचल में हिंदी का एकछत्र राज्य रहा, उसका वर्चस्व रहा और आज तक हिंदी का, उससे बढ़कर कोई बेहतर विकल्प नहीं तलाशा जा सका है। छत्तीसगढ़ अंचल की जनता हिंदी में रच बस गई है और सदैव यहां की जनता ने हिंदी को न केवल राष्ट्रभाषा के रुप में माना, बल्कि हिंदी को अपनी मातृभाषा जैसा सम्मान दिया है। यही कारण है कि स्कूल कॉलेज में प्रवेश के समय जब भी किसी छात्र ने प्रवेश पत्र पर अपनी मातृभाषा भरी तो उसने कभी छत्तीसगढ़ी नहीं लिखी और हमेशा हिंदी को ही अपनी मातृभाषा होना दर्शाया है। हिंदी को सीखते समय उसे कभी दुविधा नहीं हुई। हिंदी लिखने पढऩे और अपना हर कामकाज हिंदी में सरलता और सहजता पूर्वक वह करता आया है। बल्कि दूसरे हिंदी राज्यों की तुुलना में छत्तीसगढ़ में हिन्दी बोलने वालों की जुबान अधिक सधी हुई और संतुलित निकलती है। किसी देशज या स्थानीय ठेठपन से मुक्त यहां का जनमानस अच्छी खड़ी बोली का उच्चारण करते आया है किसी हिंदी सिनेमा के हीरो की तरह।
आज जब छत्तीसगढ़ एक स्वतंत्र राज्य बन गया है तब उसके विकास और उसकी रुपरेखा को लेकर विचार-विमर्श हो रहे हैं। सोच विचार के इन क्षणों में यह चिन्ता भी उभरकर आ रही है कि छत्तीसगढ़ राज्य की भाषा क्या होगी? हमारे सरकारी दफ्तरों में भाषा का स्वरुप कैसा होगा? हमारी शिक्षा का माध्यम क्या होगा?
तब यह देखा जायगा कि- देश को मिली आजादी के पहले से ही छत्तीसगढ़ में शिक्षा का माध्यम हिंदी रही है जो 1955 में मध्य प्रदेश बन जाने के बाद भी हिंदी और केवल हिंदी रही है। छत्तीसगढ़ राज्य बन जाने के बाद भी आठ बरस से अब तक हिंदी ही हमारी एक मात्र भाषा है। हां यह ध्यान देने योग्य है कि पिछले दो-तीन दशकों से इस अंचल में अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार भी बहुत बढ़ा है। इक्कीसवीं शताब्दी के मुहाने पर खड़े इस राज्य में ऐसा कोई जिला, तहसील या जनपद मुख्यालय नहीं बचा है जहां अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने वाले विद्यालय न खुले हों। इस दिशा व दशा में कई कस्बे व गांव भी पहुंच चुके हैं। खेत खलिहानों के बीच बसे गांव में भी पब्लिक स्कूल दिखलाई दे जाता है। यूनिफार्म पहने, स्कूल बैग, वॉटर बैग और टिफिन बाक्स लटकाए बच्चों को 'हम्टी डम्टी सेट ऑन ए वालÓ गुनगुनाते हुए स्कूल जाते हुए देखा जा सकता है।
इन हालातों में अब सवाल छत्तीसगढ़ी बोली का है। विकास की इस तेजी में, आज के आधुनिक शिक्षा माध्यम में पढ़ी महत्वाकांक्षी पीढ़ी के सपनों में, आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों के नित नये बदलते रुपों के बीच छत्तीसगढ़ी बोली कितना खरा उतरती है? यह देखना होगा कि छत्तीसगढ़ी बोली के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति देते हुए हमारी योग्यता और कार्य कुशलता का कितना सटीक ऑकलन हो पाता है! सरकारी और सार्वजनिक उपक्रमों के, होते निजीकरण के इस दौर में पेशेवर कम्पनियां 'प्लेसमेंटÓ करते समय हमारे छत्तीसगढ़ी ज्ञान के लिए कितना नम्बर देती हैं! शिक्षा, विज्ञान, साहित्य, कला और खेलकूद में अपनी राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पहचान बनाने में हमारी अपनी आंचलिक भाषा कितनी समर्थ हो पाती है! इन सभी कसौटियों पर अभी छत्तीसगढ़ी बोली को कसे जाने का अवसर आ रहा है। मिलने वाले इस सुनहरे, पर चुनौतीपूर्ण अवसर के सामने भाषा को भी अपना सामथ्र्य दिखाना होता है, उसे अपनी व्यावहारिक उपयोगिता सिद्घ करनी होती है। अपना राज तो पा लिया है पर अपना स्वतंत्र राज्य बन जाने के बाद ये चुनौतियां अब छत्तीसगढ़ी बोली के सामने आ खड़ी है।
यदा कदा ये मांगें उठती हैं कि छत्तीसगढ़ राज्य की राजभाषा छत्तीसगढ़ी होनी चाहिए। इस तरह की भावनात्मक मांगों के पीछे यह तर्क दिया जाता है कि जिस तरह बंगाल की राजभाषा बंगाली है, गुजरात की गुजराती है, अन्य अहिंदी भाषी राज्यों की अपनी अपनी भाषाएं हैं उसी तरह छत्तीसगढ़ राज्य की राजभाषा छत्तीसगढ़ी क्यों ना हो? इस तर्क में यह ध्यान रखने योग्य है कि अहिंदी भाषी राज्यों की जिन भाषाओं से हम छत्तीसगढ़ी की तुलना कर रहे हैं, वह तुलना उपयुक्त नहीं है बल्कि उन भाषाओं की तुलना हिंदी से है। अहिंदी भाषी राज्य की भाषाओं की तुलना केवल हिंदी से ही की जा सकती है क्योंकि वे सब शब्दकोष, साहित्य और अभिव्यक्ति की दृष्टि से हिंदी के समकक्ष हैं और हिंदी के साथ प्रतिस्पद्र्घा में खड़ी होती हैं। छत्तीसगढ़ी की तुलना यदि हम करते हैं तो उसे अवधी, ब्रज, भोजपरुी, मैथिल और मेवाड़ी बोली की तुलना में देखा जाना चाहिए जहां तुलसी, सूर, विद्यापति और मीरा पैदा हुई हैं। कबीर, रैदास, कुंभनदास हुए हैं, रहीम और रसखान जनमें हैं। इन महाकवियों ने अपनी- अपनी बोली में ऐसे अमर काव्य की रचना की हैं, जिनसे आंचलिक बोली में लिखी जाने वाली इन कृतियों से हिंदी का साहित्य संसार समृद्घ हुआ है। हिंदी साहित्य की समृद्घि का इतिहास आंचलिक बोली में लिखे साहित्य का इतिहास है। छत्तीसगढ़ी बोली में इस तरह की किसी महाकाव्यात्मक कृति के लिखे जाने की अभी प्रतीक्षा है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि छत्तीसगढ़ी एक मीठी बोली है। यहां के निवासियों की तरह यह बोली सीधी सादी और सरल लगती है। इसके स्वर में आत्मीयता और अंतरंगता की वही गूंज है जो छत्तीसगढ़ की माटी के रग- रग में बसी है। इस बोली में वही साफगोई और निश्छलता है जो हमारी रगों में कूट- कूट कर भरी है। इसका शब्द भंडार भी अनन्त है। यह हानोंं और कहावतों से उतनी ही भरी हुई है जितनी देश की कोई भी समृद्घ बोली है। इसके कई शब्दकोश और सामान्य ज्ञान सम्बंधी अनेक ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। यह बंागला और उडि़या भाषा की तरह सीखने में आसान और बोलने सुनने में मधुर लगती है। यह देवनागिरी लिपि की मराठी और नेपाली से भी कहीं ज्यादा हिंदी के करीब है, बल्कि इतने करीब है कि प्रत्येक हिंदी भाषी को यह अपनी ही बोली लगती है। हर कोई जो हिंदी बोल लेता है वह छत्तीसगढ़ी पूरी तरह समझ लेता है और कुछ बोल भी लेता है। अहिंदी भाषी जन भी अन्य भाषाओं की तुलना में छत्तीसगढ़ी को जल्दी समझ लेते हैं। हिंदी के साथ अपनी विकट निकटता के कारण छत्तीसगढ़ की जनता को हिंदी पूरी स्वााभाविकता से स्वीकार्य और मान्य रही है। उसे हिंदी अपनी ही भाषा लगती रही है।
यह सदैव ध्यान में रखा जावे कि उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान के पास अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मैथिल और मेवाड़ी जैसी भरी पूरी बोलियां होने के बावजूद वहां की जनता ने हिंदी को ही अपनी सर्व स्वीकृत भाषा घोषित किया है। हिंदी पढऩा, हिंदी सीखना, हिंदी बोलना और हिंदी में सारे कामकाज निपटाना उनका सदा ही ध्येय और पाथेय रहा है। हरियाणा और हिमाचल प्रदेश की अपनी आंचलिक बोलियां हैं लेकिन उन्होंने हिंदी को ही अपनी राजभाषा घोषित कर अपनी सफलता का मार्ग प्रशस्त किया है, तब छत्तीसगढ़ की जनता अपना हित सर्वव्यापी भाषा हिंदी में क्यों ना देखे। जब विभाजित मध्य प्रदेश में बुन्दलेखण्डी और मालवी बोली होने के बाद भी वहां हिंदी का परचम लहरा रहा है तो हम क्यों पीछे हो जाएं। हमारी ही तरह अलग हुए राज्य उत्तरांचल और झारखण्ड जब हिंदी की रोटी खा रहे हैं तब हम क्यों इससे मुंह मोड़े। जब इस देश के नौ राज्यों की भाषा हिंदी हैं तब दसवां राज्य और सही।
इन स्थितियों में यह बहुत सोच समझकर विचार किया जाना चाहिए कि इस नव प्रदेश की राजभाषा क्या हो? अगर हमारी आंचलिकता की पहचान छत्तीसगढ़ी से है तो राष्ट्रीयता का सूत्रपात हिंदी से ही संभव है। हिंदी के सहारे बढ़ाएंगे अपनी बोली छत्तीसगढ़ी को और छत्तीसगढ़ी समृद्घ करेगी हिंदी को।

संपर्क - मुक्तनगर, दुर्ग छत्तीसगढ़- 491001
मोबाइल- 9907196626

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1 Comments:

At 05 January , Blogger Vivek Gupta said...

सटीक तर्कों और तथ्यों वाला शानदार आलेख. लेखक को साधुवाद कि उन्होंने छ्त्तीसगढी को पर्याप्त महत्व देते हुए हिंदी की अनिवार्यता को साबित किया- व्यावहारिक और भावनात्मक, दोनों पहलुओं से. यह ध्यान देने वाली बात है कि हिंदी और छ्त्तीसगढी में कोई विरोध ही नहीं है. हर छत्तिसगढिया हिंदी से भी बराबर प्रेम करता है और उतना ही मान (या कहें कि कहीं ज़्यादा) देता है. हिंदी भाषा से बढ्कर राष्ट्रभाषा है और छत्तीसगढी हमारी अपनी बोली है. एक को पाने के लिए दूसरे को छोडने की कोई आवश्यकता नहीं है. और इसलिए यह कोई मुद्दा ही नहीं है.
-विवेक गुप्ता (फ़िलहाल भोपाल में)

 

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