December 02, 2009

समोसा माट साहब


- राधाकान्त चतुर्वेदी
मैं अपने बाल सखा बचपन के मित्र लंगोटिया यार प्रताप सिंह राठौर के साथ बैठकर टीवी पर समाचारों का आनंद ले रहा था। हम दोनों ही रिटायर होकर पेंशनयाफ्ता है और टीवी पर समाचार चैनलों को सर्वसुलभ और सस्ता (अक्सर अत्यंत सस्ते स्तर का भी) मनोरंजन का साधन भी मानते हैं। टीवी स्क्रीन पर स्वनामधन्य लालू प्रसाद आत्मुग्ध होकर बता रहे थे कि 'जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक बिहार पर राज करेगा लालूÓ यह उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है। लालू और आलू का समीकरण तो नितीश कुमार ने छिन्न- भिन्न कर दिया, परंतु आलू शब्द सुनते ही हमारे मन में कुछ- कुछ होने लगा।
बात असल में यह है कि हम दोनों ही मूलत: फर्रुखाबाद के निवासी है। गंगा मइया के आशीर्वाद से फर्रुखाबाद जिले की अत्यधिक उपजाऊ जमीन की मुख्य उपज आलू ही है। खरा खेल फर्रुखाबादी गंगा मइया में गोता लगा के आलू की ही दम पर खेला जाता है। 1960 के आस पास तक देश में आलू की कुल उपज का आधा भाग अकेले फर्रुखाबाद जिले में ही पैदा होता था। अब तो आलू की फसल देश के सभी राज्यों में होने लगी है।
हां तो बात हो रही थी आलू की और समोसे का जिक्र आते ही मेरे मन में कुछ- कुछ होने लगने की। हुआ यह कि आलू और समोसे से संबंधित बचपन की एक गुदगुदाने वाली याद मन में हिलोरे लेने लगी। मैं म्यूनिसिपिल स्कूल, फतेहगढ़ में छठी क्लास में पढ़ता था। फर्रुखाबाद जिले का मुख्यालय फतेहगढ़ है। म्यूनिसिपिल स्कूल एक सराय की इमारत में था। यह सराय अंग्रेजों ने 1857 से पहले बनवाई थी। फतेहगढ़ को भी उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में अंग्रेजों ने ही मिलिटरी केन्टूनमेन्ट के रूप में बसाया था।
ये वो जमाना था जब माट साहब लोग (शिक्षक) अपनी विद्वत्ता तमाचों, घूंसो इत्यादि से छात्रों के तन मन पर अंकित करते थे। और तो और अभिभावक भी जो माट साहब छात्रों की हड्डी पसली तोडऩे में माहिर होते थे उन्हें उत्तम कोटि का शिक्षक मानते थे। हमारा विश्वास था कि सिलेबस में पहला आइटम शिक्षक के हाथों पिटाई थी। पाठ्य पुस्तकों का नंबर उसके बाद आता था।
ऐसे में स्कूल का सबसे प्रिय अंग था आधे घंटे का इंटरवल जिसमें हम लोग माट साहब लोगों के आतंक से मुक्त होकर खुली हवा मे सांस लेते थे। इस समय का सदुपयोग हम लोग अपने माट साहब लोगों के व्यक्तित्व और चरित्र की विशिष्टताओं की आलोचना चटखारे लेकर करते थे। इस आलोचना से हमारे तनमन पर माट साहब द्वारा लगाई चोटों पर मलहम भी लगता था।
हमारे इंटरवल के हीरो थे समोसा माट साब। थे तो वे सक्सेना साहब परंतु छात्रों में वे समोसा माट साब नाम से ही जाने जाते थे। मुझे भी उनका पूरा नाम नहीं मालूम। समोसा माट साब हरफन मौला शिक्षक थे। किसी कक्षा में वे हिंदी पढ़ाते थे, किसी को इतिहास, किसी को अंग्रेजी तो किसी कक्षा में भूगोल। मिसलेनियस टीचर।
इंटरवल होते ही सब शिक्षक तो टीचर्स रूम में चले जाते पर समोसा माट साहब जिस क्लास में पढ़ा रहे होते उसी के बाहर आकर खड़े हो जाते। मैं अपने दो तीन मित्रों के साथ किसी ऐसे पेड़ की आड़ में खड़े हो जाता जहां से समोसा माट साहब के क्रियाकलाप हम साथ देख सकें। समोसा माट साहब की उद्विग्न निगाहें किसी को ढूंढ रही होती। तभी हमारा सहपाठी कालीचरन समोसा माट साहब के सामने प्रगट होता। काली चरन को समोसा माट साहब काली चर्न पुकारते थे। उसे देखते ही समोसा माट साहब की बांछे खिल जाती और उसे एक दुअन्नी थमा कर उससे कहते बेटा फटाफट बढिय़ा वाले चार समोसे खूब ज्यादा सी चटनी डलवा के लाओ। कुत्ते की चाल से जाओ और बिल्ली की चाल से आओ। उधर काली चरन दौड़ता हुआ समोसे लेने जाता, इधर समोसा माट साहब ओठों पर जीभ फेरते हुए ऐसे चहलकदमी करने लगते जैसे खुराक मिलने के समय चिडिय़ाघर में टाइगर अपने कटघरे में इधर से उधर चलता रहता है। कालीचरन को समोसे का दोना लिए आते देख कर माट साहब क्लास रूम में कुर्सी पर जा बैठते और काली चरन समोसे रख देता। माट साहब श्रद्धावनत होकर समोसे सूंघते और सिहर उठते। इसके बाद माट साहब एक- एक करके चारों समोसे आंंखें मूंदकर देर तक चबाते हुए खाते। इस बीच कालीचरन एक लोटा पानी माट साहब के सामने रख जाता। समोसे खाने के बाद माट साहब उंगलियों से बची खुची चटनी चाटते और तब लोटे से पानी पीकर तृप्ति की डकार लेते। माट साहब के चेहरे पर तृप्ति का वह भाव होता जो कई दिन के भूखे व्यक्ति के चेहरे पर तब होता है जब उसे भरपेट भोजन मिल जाता है।
यह सीन रोज दोहराया जाता था। यह हमारा भी रोज का मनोरंजन था। जो अबाध रूप से चार वर्षों तक चलता रहा। कक्षा 9 के बाद अभिभावक के तबादले के कारण मुझे फतेहगढ़ से कानपुर जाना पड़ा। इसके बाद समोसा माट साहब के दर्शन का अवसर फिर कभी नहीं मिला। लेकिन मधुर स्मृतियों के एलबम में समोसा माट साहब की छवि अक्षुण्ण है। ऊपर का वृतांत पढ़कर लोग समझ जाएंगे कि जब भी समोसा मेरे सामने रखा जाता है मैं मुस्कुराता क्यों हूं।
अन्त में मैं यह भी स्वीकार करना चाहूंगा कि पूज्य समोसा माट साहब की मधुर स्मृति मुझे भी उतना आनंद देती है जितना समोसे माट साहब को देते थे।

संपर्क- डी-38, आकृति गार्डेन्स, नेहरू नगर, भोपाल (मप्र)
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