December 02, 2009

चलता रहेगा आत्महत्याओं का दौर

निर्माण की निरंतर बहती एक नदी में स्वराज्यजी ने आंकड़ों के साथ अपनी बात रखने का प्रयास किया है। आंकड़ों पर बहस हो सकती है लेकिन बदलाव की बयार की बात एकदम सही है। इस बदलाव की क्रांति को अब धूर- नक्सली क्षेत्रों तक ले जाने की चुनौती सरकार के सामने है। देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह इसमें कितना सफल होते हैं। कर्ज माफी के फरेब में किसानों को छत्तीसगढ़ सरकार ने नहीं उलझाया वरन उनके लिए सिंचाई, कम ब्याजदर में कर्ज की उपलब्धता आदि उपाय किेए। परिणाम सामने है। पड़ोसी राज्य के विदर्भ क्षेत्र में कर्ज माफी से उपजी अंतरिम राहत अब दम तोड़ चुकी है। सिंचाई सुविधाओं के अभाव में किसानों की आत्महत्या बदस्तूर जारी है। अब तो कोई चुनाव भी सामने नहीं है, इसलिए कहा जा सकता है कि कम से कम अगले तीन साल और इस क्षेत्र में आत्महत्याओं का दौर चलता रहेगा।
- अंजीव पांडेय, डिप्टी सिटी एडीटर दैनिक 1857,नागपुर, panjeev@gmail.com
बाबू मानसिकता
सरकार की सारी योजनाओं को पलीता लगाने में एक वर्ग पूरी तरह कमर कसकर जुटा है- वह वर्ग है बाबू मानसिकता वाली टीम। दोनों में सांठ-गांठ हो जाए तो इन्हें ब्रह्मा भी नहीं तोड़ सकता है। इनका बस चले तो ये सब कुछ बेच डालें।
अनकही: भ्रष्टाचार और गरीबी का घातक गठबंधन पर प्रतिक्रिया
- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' rdkamboj@gmail.com
भावभीनी विदाई
मुन्ना पाण्डेय जी के लेख बहादुर कलारिन एक जीवंत दस्तावेज के द्वारा हबीब साहब को एक भावभीनी विदाई दी गई है, कहा जा सकता है। हालांकि रंगमंच, हिंदी साहित्य, और लेखन से मेरा कोई गहरा जुड़ाव नहीं है और ना ही इन सबका कोई अनुभव है लेकिन हबीब साहब जैसे रंगधुनी से वाकिफ होना और प्रभावित होना कोई अचरज की बात नहीं। बहादुर कलारिन नाटक और रचनात्मकता को बहुत सलीके से दर्शाया गया है। इस लेख को पढ़ कर मुझे अपने भीतर एक नयी उर्जा, नयी सोच और नयी दिशा का अहसास हुआ इसके लिए मैं मुन्नाजी और उदंती.कॉम का आभारी हूं।
- मनोज मीना, a-vella-label-Ø blog
साफ-सुथरी पत्रिका
उदंती का नवम्बर अंक प्राप्त हुआ। पत्रिका मैंने पहली बार देखी और यह देखकर प्रसन्नता हुई कि आपने किसी भी अखिल भारतीय स्तर की पत्रिका के अनुरूप यह पत्रिका प्रकाशित की है। पत्रिका का कागज, छपाई और सामग्री सभी कुछ स्तरीय और पठनीय है। अनकही के अंतर्गत आपके विचार देश की ज्वलन्त समस्या पर प्रकाश डालते है। पर्यावरण, आपदा प्रबंधन, रंगमंच, पुरातन, वन्य जीवन, लघु कथाएं ये सभी स्तंभ पत्रिका के स्तर को ऊंचा उठाते है। इस अंक में मुझे विशेष रूप से खलील जिब्रान की कहानी महत्वाकांक्षी फूल और लियो तोल्स्तोय के संस्मरण बहुत पसंद आये। इसके साथ ही रंग बिरंगी दुनियां के अंतर्गत दोनों रंगबिरंगे समाचार अच्छे लगे। अभियान के अंतर्गत हैली जी लेख पसन्द आया। एक साफ-सुथरी पत्रिका के प्रकाशन के लिए बधाई।
- संतोष खरे, राजेन्द्र नगर, सतना (मप्र)
सुंदर समायोजन
उदंती डॉट काम पर इतनी दमदार सामग्री का इतने सुन्दर ढ़ंग से आपका समायोजन निश्चित ही पाठकों पर अपना प्रभाव छोड़ता है। रचनाओं का चयन पत्रिका के स्तर के अनुरूप होता है, यह एक बड़ी बात है। आपकी लगन और आपका श्रम निरर्थक नहीं जाएगा, मुझे पूरा विश्वास है।
-सुभाष नीरव, subhneerav@gmail.com
आग को जलाए रखना
आग के ऐसे न जाने कितने दावानल हैं जो हमारे देश के हर इंसान के हृदय में धधक रहा है, लेकिन यह दुखद है कि हम अफसोस मनाते रह जाते हैं। जैसे ही आग बुझती है, यह दावानल भी कहीं दफऩ हो जाता है। लेकिन आप जैसे लिखने वालों की लेखनी में यह दावानल धधकते रहना चाहिए। संतोष कुमार जैसे पत्रकार ही इस आग को जलाए रख सकते हैं। आपके इस आग के लिए आपको बधाई।
- एसएन राणा, रायपुर
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