December 13, 2008

एक कीड़ा पेड़ की टहनी जैसा?

यह कीड़ा मलेशिया के बोर्नियो द्वीप के जंगलों में से खोजा गया है। कीट का नाम सुनते ही तितलियों, कॉकरोच वगैरह की याद आती है। मगर जो नया कीट मिला है वह पूरे 56.7 सेमी लंबा है। यानी आधा मीटर से भी ज़्यादा। यह लंबाई तब नापी गई है जब उसकी टांगों को एक सीध में रखा गया। टांगों को छोडक़र बात करें, तो भी यह 35.7 सेमी लंबा है।

इसे सबसे पहले खोजा था डाटुक चान ने। उनके ही नाम पर इसका नामकरण फोबेटिकस चानी किया गया है। वैसे साधारण भाषा में इसे चान मेगास्टिक कहते हैं। इस प्रजाति का विस्तृत वर्णन तैयार करने व नामकरण का काम ब्रिटिश वैज्ञानिक फिलिप ब्रौग ने किया। यह उन कीटों में से है जो बिलकुल टहनी जैसे दिखते हैं। यदि आपको ऐसा कीट दिखेगा तो काफी संभावना है कि आप इसे कोई तिनका या टहनी मानकर आगे बढ़ जाएंगे। इससे पहले जो सबसे लंबा कीट ज्ञात था वह भी एक टहनी कीट ही था- फोबेटिकस सिरेटाइपस। उसकी लंबाई चान मेगास्टिक की अपेक्षा 1 सेमी से भी ज़्यादा कम थी और यदि सिर्फ शरीर की लंबाई की बात करें तो चान मेगास्टिक पिछले रिकॉर्डधारी फोबेटिकस किर्बाई से करीब 3 सेमी लंबा है।

फोबेटिकस कीटों की करीब 300 प्रजातियां पाई जाती हैं। रोचक बात यह है कि पहले के रिकॉर्डधारी कीट तो हम 100 वर्षों से जानते हैं मगर यह वाला अक्टूबर 2008 में जाकर ही हाथ लगा है। वैसे अभी भी हमें इसकी जीवन चर्या के बारे में कुछ नहीं मालूम। ऐसे कीट साधारणतया बरसाती जंगल में वृक्षों की छाया में पाए जाते हैं। अब इसके तीन प्रादर्श उपलब्ध हैं और तीनों संग्रहालय में रखे हैं। साइज़ के अलावा इस कीट के अंडे भी कम विचित्र नहीं हैं। आम तौर पर हम सुनते आए हैं कि बीजों में ऐसी संरचनाएं पाई जाती हैं, जो उनको दूर- दूर तक बिखेरने में सहायक होती हैं।

मगर इस मेगास्टिक के अंडों में दोनों तरफ पंखनुमा संरचनाएं होती हैं, जो इसे हवा में उड़ाकर दूर-दूर तक पहुंचने में सहायता करती हैं।
(स्रोत)

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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