December 13, 2008

रंग -बिरंगी दुनिया

सफेद दाढ़ी वालों के लिए खुशखबरी
क्रिसमस के मौके पर विदेशों में विभिन्न सडक़ों, रेस्तरांओं और माल्स में सांता क्लाज को लोगों का मनोरंजन करते देखा जा सकता है। ग्राहकों को लुभाने के लिए सांता क्लाज बना हुआ व्यक्ति अपनी पोटली में टॉफी, गिफ्ट आदि रखकर बच्चों को लुभाते नजर आते हैं। इस तरह क्रिसमस का मौका बहुतों के लिए रोजगार ले कर आता है। लेकिन जर्मनी में इस साल सांता क्लाज की कमी पड़ गई है। कंपनियां सांता क्लाज की भर्ती के लिए बाकायदा विज्ञापन दे रही हैं।
एक विज्ञापन का नमूना देखिए... हमें एक मजाकिया, थोड़ा गोल-मटोल ऐसा आदमी चाहिए जिसका कोई आपराधिक रिकार्ड न हो। सफेद दाढ़ी वाले लोगों को तरजीह दी जाएगी।
एक प्रमुख जॉब एजेंसी के मुताबिक हम तेजी से ऐसे पढ़े-लिखे लोग खोज रहे हैं जिन्हें जल्दी से प्रशिक्षण देकर सांता क्लाज बनाया जा सके। म्यूनिख में सांता की नियुक्तियां करने वाले प्रमुख जेंस विटेनबर्गर के अनुसार सांता क्लाज बनना आसान काम नहीं है। शापिंग माल्स, निजी पार्टियों और बाजारों में नियुक्त किए जाने वाले सांता क्लाज में कुछ खास विशेषताएं होनी चाहिए। जैसे वह बच्चों के साथ आसानी से घुलमिल सके, उसे अच्छा संगठनकर्ता, विश्वसनीय और कुशल अभिनेता भी होना चाहिए। हालांकि सांता बनना मुश्किल काम होता है। लेकिन मंदी के इस दौर में बेरोजगारी से तो अच्छा ही है।
भारत में भी पिछले कुछ वर्षों से विभिन्न रेस्तरां, मॉल्स और निजी पर्टिंयों में भी सांता क्लाज घूमते नजर आने लगे हैं, भारत में वैसे ही बहुत बेराजगारी है सो यहां सांता क्लाज की कमी नहीं है। हां जर्मन कंपनी चाहे तो वे भारत से सांता क्लाज ले जा सकते हैं, रही बात ट्रेनिंग की तो भारत इसमें भी एक्सपर्ट है।
शुद्ध पेयजल चहिए तो...
अमरीकी स्पेस अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा अंतरिक्ष यान में भेजे जाने वाले स्त्री पुरुषों को महीनों तक अंतरिक्ष यान के भीतर रहना पड़ता है, जहां उनके लिए पेयजल की व्यवस्था करना एक बड़ी समस्या थी। अंतरिक्ष यान में जल बहुत ही सीमित मात्रा में ले जाया सकता है। इस समस्या का बहुत ही आसान समाधान नासा ने निकाल लिया है। वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष यात्रियों के मूत्र को उपकरणों से शुद्ध करके इन्हें पीने लायक बना लिया है। नासा का दावा है कि अंतरिक्ष यान में इस प्रकार उपलब्ध जल धरती पर नगरों में उपलब्ध पेयजल से भी कहीं अधिक स्वच्छ होता है। यह तो बहुत अच्छी खबर है क्योंकि नासा की इस खोज से कम से कम भविष्य में धरती पर होने वाली पेय जल की समस्या का कुछ तो निदान किया ही जा सकेगा।
मल्टी-स्टोरी कब्रिस्तान!
अंग्रेजों द्वारा भारत से म्यांमार (बर्मा) निर्वासित किए जाने पर अंतिम मुगल बादशाह ने यह जान लिया था कि उनका नामोनिशां उनकी मातृभूमि से मिट जाएगा यानि उनकी कब्र भी भारत में नहीं होगी। तभी तो कवि हृदय इस बादशाह ने अपनी आत्मा की व्यथा को व्यक्त करते हुए कहा था दो गज जमीन भी न मिली कुए यार में... लेकिन क्या अंग्रेजों ने कभी भी यह सोचा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि खुद अंग्रेजों के लिए ही इंग्लैंड में कब्र के लिए जमीन नहीं मिलेगी। लेकिन है यह यथार्थ।
इंग्लैंड एक छोटा सा टापू है, जिसमें सभी कब्रिस्तान खचाखच भर चुके हैं और नए कब्रिस्तान के लिए वहां जमीन नहीं मिल सकती। ऐसे में आजकल अंग्रेज मृतकों की अन्त्येष्टि उनका कफन समुद्र में दफन करके हो रही है। परंतु समुद्र में अंत्येष्टि एक महंगा सौदा है। इसमें जमीन पर कब्र बनाने की तुलना में दुगना खर्चा आता है। कुए यार (जन्मभूमि) में ही दो गज जमीं के लिए मोहताज अंग्रेजों की कराहों से व्यथित इंग्लैंड की सरकार ने एक योजना बनाई है कि वर्तमान कब्रिस्तानों में स्थित कब्रों को खोदकर उनमें दफन मृतकों को और ज्यादा गहराई में गाड़ा जाए जिससे उनके ऊपर और कब्रें बनाई जा सकें। अर्थात् मल्टी-स्टोरी कब्रिस्तान। जाहिर है इंग्लैंड के पास हर मुसीबत और समस्या का समाधान है। ये तो अच्छा है कि भारत में हिन्दू धर्म के अनुसार मृतक को अग्नि के हवाले कर दिया जाता है, अन्यथा यहां की बढ़ती जनसंख्या के चलते तो न जाने कितने मल्टी स्टोरी कब्रिस्तान बनाना पड़ता।

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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