December 14, 2013

व्यंग्य

   चूहों से पंगे लेना संगीन अपराध

        - अविनाश वाचस्पति

 देख चुनावों का असर, चूहे मस्त दिखाई दे रहे हैं। अब उन्हें नहीं,उनकी वजह से इंसान को जान के लाले पड़े हुए हैं। आप सोच रहे होंगे कि इसमें लाल रंग की कौन-सी बात है। सातवें वेतन आयोग का गठन देर-सवेर तो होना ही था, सरकार ने देर नहीं की और सवेरे ही कर दिया। पर इससे चूहे क्यों खुश होने लगे। दरअसल चूहों की अँगड़ाई की वजह सातवें वेतन आयोग की घोषणा नहीं है, यह झुनझुना तो बजना ही था, सो बजने लग गया है। सभी सरकारी कर्मचारी रात के अंधेरे में भी उल्लुओं की माफिक अँधेरे में भी नज़रें गड़ाए उलटे लटक कर स्वहित को सर्वोपरि स्वीकारते हुए उल्लू धर्म का निर्वाह कर रहे होते हैं।
मैं यहाँ पर चुनावों की वजह से चूहों को मिलने वाली खुशी की बात कर रहा हूँ। आप सोच रहे होंगे कि भला चुनावों से चूहे क्यों खुश होने लगे। कुतरने का मौका तो उन्हें यूँ ही खूब मिलता रहता है फिर भी चाहकर वे नेताओं को कुतर नहीं पाते हैं। चूहे नेताओं की जेबों में बलात् घुसकर कुतरने की मंशा पालते हैं, पर सुरक्षा घेरे के कारण सफल नहीं हो पाते। वैसे भी कुत्ते, बिल्ली पालने के लिए सब तैयार रहते हैं और चूहों को पालने से सब परहेज करते हैं।
आपने पढ़ी है या नहीं पर मैंने खूब ध्यान से पढ़ी है कि चूहों को पकडऩे पर जेल हो सकती है; जबकि बलात्कारियों पर सरकार अभी तक इतनी सख्ती नहीं कर पाई है। मैं अपने लैपटॉप को गतिशील रखने के लिए माउस नामधारी चूहे पर भरोसा करता हूँ; क्योंकि मुझे उँगली या अँगूठा करना कभी पसंद नहीं रहा है, विसंगतियों को भी मैं सीधी उँगली से ही ट्रीट करता हूँ वहाँ भी टेढ़ी उँगली करना मुझे अच्छा नहीं लगता। खबर के मुताबिक चूहों को पकडऩे के लिए 'वन्यजीव संरक्षण संशोधित कानून, 2013 में दंड का प्रावधान कर दिया गया है, जिसके तहत आवारा पशु भी वन्य जीव की श्रेणी में शुमार किए जाएँगे। उन्हें जान से मारने और डराने की बात अपने दिमाग से निकाल दीजिए। यह घोषणा ऐन चुनावों के वक्त पर की गई है जिससे चूहों में जश्नी खुमार तारी हो गया है। मैंने खुद अपने घर में लैपटाप और डेस्कटाप के माउस रसोईघर के चूहों से इस बाबत मंत्रणा करते देखा है पर उन्हें टोकने की मेरी हिम्मत नहीं हुई कि खफा होकर वे न जाने किस दफा में मेरे खिलाफ़ एफ़आईआर पुलिस में दर्ज करवा दें।
चाहे उन्हें वोट डालने का हक नहीं मिला पर इंसान द्वारा उन्हें पकड़ने, छेड़ने और मारने और तो और पिंजरा दिखलाने के अधिकार तक पर रोक लगा दी गई है। इससे अधिक चूहों के लिए खुशी की बात और क्या हो सकती है। अभी तक तो वे सिर्फ साहसी थे, पर अब उन्हें दुस्साहसी बनने से कोई नहीं रोक सकेगा। अब तक केवल महिलाओं की ही चूहे को देखते ही घिग्घी बंध जाया करती थी ; पर अब पुरुष और नेताओं में भी इनके कारण भय का माहौल व्याप्त हो गया है। वजह साफ है कि अब वे नेताओं के कुर्ते में घुसकर उधम मचाने से बाज नहीं आएँगे और उनकी तूती वहाँ पर भी बोला करेगी।
श्रीगणेश जी जैसे देवता तक उन्हें सम्मान देते आए हैं। कम्प्यूटर के जनक ने उन्हें कम्प्यूटर के साथ जोड़कर इनके रुतबे में जो बढ़ोतरी की थी, रही सही कसर इस अध्यादेश से पूरी हो गई है। इसी वजह से पिंजरे की बिक्री, इन्हें मारने और भगाने वाली दवाई की सेल में घनघोर गिरावट आई है। ऐसे में जबकि देश आर्थिक संकट के दौर में है, इससे देश की अर्थव्यवस्था पर संकट बढ़ गया है। चूहों की आज़ादी में खलल डालना अपराध की श्रेणी में जुड़ गया है; इसलिए सावधान रहिएगा और कोई गलती अनजाने में भी मत कर बैठिएगा, वरना इसका खमियाजा ताउम्र भुगतते रहेंगे आप। इस पूरे मामले पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है,नि:संकोच लिखिएगा।

सम्पर्क: साहित्यकार सदन, 195 पहली मंजिल, सन्त नगर, नियरईस्ट ऑफ कैलाश,नई दिल्ली - 110065     Email-nukkadh@gmail.com

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