February 21, 2013

हास्य-व्यंग्य





निगोड़ा बसन्त फिर आ गया?

-यशवन्त कोठारी

लो निगोड़ा, निर्लज्ज बसन्त फिर आ गया है। वह बिरहणियों को सताने, प्रेमियों का मन ललचाने तथा प्रेयसियों को रिझाने के लिए इस कुबेला में फिर आ धमका है। यही समय है जब पत्नियाँ मायके जाने की धमकियाँ देती हैं और पति बेचारे इन धमकियों से बचने के लिए बसन्त की दुहाई देते हैं। मगर बेचारा बसन्त क्या करें। उसे तो अपना धर्म निबाहना है, वह फिर आता है और आकर हम सबका मन लुभाता है। प्रकृति का अनन्य गायक है बसन्त। मन को हर जाता है बसन्त। कामदेव और कौमुदी उत्सव मनाता है बसन्त।
आज अगर कालिदास होते तो क्या बसन्त का वर्णन उसी प्रकार करते जैसा वे कर चुके हैं। उन दिनों हवा में एक मादकता तैरती थी। कालिदास ने बसन्त ऋतु के वर्णन में लिखा था, लो प्यारी, फूले हुए आम की मंजरियों के तीखे बाण लेकर और अपने धनुष पर भोरों की तरह पत्तों की डोरी चढ़ा कर वीर बसन्त रसिकों को बाँधने के लिए फिर चला आया है। मगर हाय रे यह इक्कीसवीं सदी की ओर जाने वाली दुनिया का निगोड़ा बसन्त, कालिदास भी अब यहाँ पर झूठे लगते हैं। कहाँ हैं आम्रमंजरियाँ, कहाँ है भौरें, और कहाँ है खनखनाती, सरसराती इठलाती मदमाती हवाएँ? सब काल के गाल में समा गये लगते हैं। पर्यावरण और प्रदूषण से भरती इस पृथ्वी पर बसन्त केवल संस्कृति साहित्य की पुस्तकों में ही रह गया है या फिर कुछ कविताओं में या फिर सामयिक लेख लिखने वाले लेखकों की कलम में ही छिप कर बैठ गया है बसन्त। कोई इस निगोड़े बसन्त को बाहर लाकर सार्वजनिक क्यों नही करता। लाल कनेर , चम्पा, जूही के फूल, कुसुम के लाल फूल और केसर की खुशबू सब कहाँ विलीन हो गये हैं। अषोक के वृक्ष, मालविका की खिली कलियाँ कहाँ हैं। सखि देख, बसन्त ने सब कुछ स्वयं ही नष्ट क्यों कर दिया है ये तो फाल्गुनी हवाओं के झोंकों के दिन हैं फिर बसन्त कहाँ और क्यों खो गया है कहाँ गयी मद से अलसाई कामिनियाँ और कामदेव के बाण सब काल के साथ समाप्त हो गये हैं। क्यों? सखि बसन्त को किसकी नजर लग गई है?
लेकिन सब कुछ ऐसे आसानी से कैसे समाप्त हो सकता है। एक पुरानी कहावत है मोल्या मोड़ो आयो रे, निकल गयी गणगौर। मगर मैं तो बसन्त के स्वागत में मकर संक्राति से ही बैठा हूँ। बसन्त तो आया। मगर वो मस्ती, वो मजे, वो सुगन्ध सब खो गयी। निगोड़ा बसन्त अपने अस्त्र, शस्त्र, हथियार, सब कहाँ छोड़ आया है। और प्रकृति में भी बसन्त केवल कहीं-कहीं दिखता है मौसम ही नहीं मानव और समाज सब कुछ बदल गया है।
पत्नी से कहा- सुनों बसन्त आ गया है उसने द्वार की और देखकर कहा- कहाँ है बसन्त भैया। मैंने कहा- आपके भाई बसन्त नहीं, ऋतुराज बसन्त। बस उन्होंने नाक चढ़ाकर कहा।
यह ऋतुराज निगोड़ा बसन्त तो हर साल आता है।
तो क्या हुआ आखिर बसन्त ऋतुओं का राजा है।
हुआ करे। अब राजाओं को कौन पूछता है। अब तो प्रजातंत्र है। रूस तक में सब बदल गया है।
वो तो ठीक है मगर हमारे देश में तो कालिदास का बसन्त आने की परम्परा है और कालदास?
अब देखिये हो गया न सब कुछ गुड़ गोबर। लेकिन बसन्त के आगमन पर यह सब होता रहता है इससे निगोड़े बसन्त पर कोई असर नहीं होता फिर आ जाता है कभी खिड़की के सहारे और कभी दरवाजे से। हर तरफ से आता था बसन्त। मदमाता था बसन्त। इठलाता था बसन्त। बार-बार आँखों को भरमाता था बसन्त। मगर पता नहीं क्या हुआ। बसन्त बसन्त ना रहा। प्यार-प्यार ना रहा।
बसन्त हर बार मेरे घर का दरवाजा खटखटाता है, मगर मैं उसके स्वागत में न तो अशोक के फूल सहेज पाता हूँ और न ही आम्रमंजरियों की सुगंध को महसूस कर पाता हूँ। कारण बिलकुल साफ  है, बसन्त को मँहगाई चाट गयी, बाकी जो बचा उसे देश के नेता चाट गये। कहाँ है बसन्त? कहाँ हैं वे लोग जो गा सकें वीरों का कैसा हो बसन्त।
कहाँ है निराला-सा कवि और भुवनेश्वर-सा नाटककार। बेचारा बसन्त जो कालिदास के जमाने से पूरे संसार को हँसा रहा है, खुश कर रहा है, वह बसंत आया तो है, मगर अफसोस, उसके स्वागत का समय नहीं है हमारे पास। हम सब व्यस्त हैं रोटी, कपड़ा और मकान के चक्कर में।
प्रेयसियाँ परिवार कल्याण की बात करती हैं और प्रेमी बसन्त के बजाय शाम की रोटी के जुगाड़ में व्यस्त हैं ऐसे में मन अगर बौराये भी तो कैसे? ऋतुराज बसन्त! तुम हम सब को दु:खी करने के वास्ते फिर क्यों आ गये हो। हमें हमारे हाल पर छोड़ दो ; क्योंकि अब हम बसन्त के लायक नहीं रहे। हे निगोड़े बसन्त! अब और ज्यादा दु:ख मत दो। हमारी दु:खती रग को मत छू और तू चला जा। जा निगोड़े बसन्त तू जा और रति के साथ हिमालय पर निवास कर, अगले वर्ष आना तब शायद हम बसन्त का स्वागत कर सके।          
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