July 12, 2011

मिनी तिब्बत का रहस्य लोक

- प्रिया आनंद

निर्वासन की तकलीफ झेलते हुए भी तिब्बतियों ने यहां जो मंगलमय दुनिया बसाई है, वह अद्भुत है। यह शहर दिन प्रतिदिन घना बसता जा रहा है, सड़कें तंग और खराब हैं, पर इन सड़कों के दोनों ओर एक रहस्यमय रंगीन संसार है। सुंदर एंटीक, रंगीन मनकों की माला, ढेरों पारदर्शी नगीने और फेंगशुई के सामान बेचती महिलाएं आपका ध्यान खींच लेंगी
मैकलोडगंज की झिलमिल करती रोशनियां दूर से ही साफ दिखाई देती हैं। धौलाधार के नीले पहाड़ों की गोद में बसा यह छोटा सा शहर अपनी खूबसूरती की वजह से पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। धर्मशाला से थोड़ा ऊपर तिब्बती समुदाय का यह एक ऐसा संसार है, जो अपनी संस्कृति और व्यवहार के कारण ही मिनी तिब्बत कहा जाने लगा है। यहां निर्वासित तिब्बत सरकार के धार्मिक गुरु महामहिम दलाईलामा का निवास है।
मैकलोडगंज का बौद्धमठ नामग्याल मॉनेस्ट्री के नाम से जाना जाता है। यहां की परम शांति, धार्मिक गतिविधियां और संध्या समय जलते हुए असंख्य घृत दीप... पर्यटकों का आकर्षण हैं। धर्मशाला से अगर आप मैकलोडगंज जाते हैं तो इस धरती पर पांव रखते ही आपको पूरा परिदृश्य बदला हुआ नजर आने लगता है।
एक क्षण के लिए सोचना पड़ता है कि हम हिमाचल में हैं या फिर तिब्बत के किसी हिस्से में आ गए हैं। मुख्य चौराहे से सड़कें लिंक रोड की तरह अलग- अलग स्थानों को जाती हैं। इन सड़कों को अच्छा तो नहीं कहा जा सकता, पर इससे यहां आने वालों पर कोई फर्क नहीं पड़ता। लोग पैदल ही बौद्ध मंदिर की तरफ चल देते हैं। इनमें ज्यादातर विदेशी पर्यटक होते हैं या फिर बौद्ध मठ के भिक्षु, जो रोज यहां से धर्मशाला अप- डाउन करते हैं। स्थानीय लोगों की आवाजाही भी इस तरफ रहती है, क्योंकि वीकएंड मनाने के लिए इससे अच्छी जगह और कोई नहीं है। जाड़ों या बारिश के मौसम में यह क्षेत्र अकसर घाटी में छाई धुंध के आवरण में ढका रहता है, जहां देवदारों के बीच से होकर गुजरती धुंध मोहक लगती है। कभी खुली धूप हो तो सारा मैकलोडगंज चमकता नजर आता है।
धौलाधार पर्वत की पहाडिय़ों की गोद में बसा यह मिनी तिब्बत विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करता है, यहां हॉलीवुड के सितारे भी आते रहते हैं। हैरत में रह जाते हैं लोग जब अचानक ही बौद्धमठ के परिसर में रिचर्ड गेर दिख जाते हैं। यहां वे हॉलीवुड स्टार नहीं, महामहिम के अनुयायी की हैसियत से आते हैं। दलाईलामा की लोकप्रियता विश्वप्रसिद्ध है। वह निर्वासित हैं, पर संसार में उनका मान सम्मान अप्रतिम है।
वह बीसवीं शताब्दी का वक्त था। जब एशिया अफ्रीका और लैटिन अमरीका के बहुत सारे देशों को औपनिवेशिकता से मुक्ति मिली, पर यह तिब्बत का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि पहले व दूसरे विश्व युद्ध के दौरान स्वतंत्र और तटस्थ राष्ट्र होते हुए भी 1949 में तिब्बत की स्वतंत्रता छिन गई। कुल 25 लाख वर्ग किलोमीटर और 65 लाख की जनसंख्या वाला तिब्बत, चीन के कम्युनिस्ट राष्ट्र निर्माण का शिकार हुआ। 1959 में चीनी सेना ने तिब्बत की राजधानी ल्हासा व दलाईलामा के आवास पर सीधा हमला किया, तब दलाईलामा ने अपने 80,000 शरणार्थियों के साथ भारत में शरण ली। उस समय की नेहरू सरकार ने सभी तिब्बतियों को अतिथि रूप में स्वीकार किया। तिब्बत में 1959 से अब तक 12 लाख के करीब तिब्बती मारे गए हैं तथा वहां के 6 हजार से अधिक मठ, मंदिर साधना केंद्र नष्ट कर दिए गए हैं। इन पवित्र स्थानों में या तो चीनियों के आयुध भंडार हैं या फिर उन्हें शौचालय में परिवर्तित कर दिया गया है।
भारत में ही रह कर दलाईलामा ने विश्व भर में ख्याति अर्जित की और उनकी शांतिप्रियता को देखते हुए ही उनके अनुयायी उन्हें भगवान की तरह ही पूजते हंै। बौद्ध परंपरा के कुछ जानकार यह भी भविष्यवाणी करते हैं कि वर्तमान चौदहवें दलाईलामा के बाद कोई दलाईलामा नहीं होगा। देखें तो यह बात सच भी लगती है। तिब्बत जो अपने ढंग का एक विलक्षण देश रहा है, चीनी हमले के बाद पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। संभवत यह अकेला ऐसा देश था जहां का जन जीवन दैवी प्रेरणाओं से संचालित और नियंत्रित होता था। इस विलक्षणता को यहां के लामाओं ने ही बरकार रखा है। गौरतलब है कि चीन के आक्रमण से पहले तिब्बत रहस्यमय सिद्धों का देश माना जाता था। सामान्य दृष्टिï में दलाईलामा का भारत आना पलायन ही है और कुछ नहीं। इस घटना को उन्होंने खुद भी माइलैंड एंड माइ पीपल में पलायन शीर्षक से दर्ज किया है। परंतु इस सबसे अलग एक सच यह भी है कि दलाईलामा अपने साथ जो आध्यात्मिक विरासत बचा कर ले आए वह भविष्य के लिए मूल्यवान है।
दरअसल दलाईलामा कोई नाम नहीं एक उपाधि है, वैसे ही जैसे कि भारत में महामंडलेश्वर या शंकराचार्य की उपाधि। दलाईलामा का अर्थ है ज्ञान का महासागर। रोचक यह भी है कि पिछले तेरह दलाईलामा इतने चर्चित नहीं हुए जितने कि वर्तमान दलाईलामा हैं। हो सकता है इसका कारण उनके व्यक्तित्व के अलावा परिस्थितियां भी हों। फिर चीन के आक्रमण और उनके निर्वासन के बाद दुनिया भर में दलाईलामा का पक्ष अत्यधिक सहानुभूति के साथ सुना गया। महामहिम का जन्म, तिब्बत के उत्तरपूर्व में तक्सरे नामक गांव में हुआ। उन्होंने स्वयं लिखा है कि मेरे परिवार में दो बहनें और चार भाई थे। आर्थिक रूप से मेरा परिवार विपन्न था, पर अगर मैं अभिजात कुल में जन्मा होता तो निम्नवर्ग की भावनाओं को इतना नहीं समझ सकता था। बचपन में दलाईलामा को सिर्फ आध्यात्मिक शिक्षा ही नहीं दी गई बल्कि उन्हें विधिवत संस्कृति, वैद्यक, तर्क, दर्शन आदि विषयों की शिक्षा दी गई। इसलिए वे कई विषयों की विलक्षण जानकारी रखते हैं।
जहां तक भारत का सवाल है तो भारत ने भले ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर दलाईलामा का साथ न दिया हो पर संरक्षण जरूर दिया। यही नहीं भारतीय जनमानस भी इसे उपकार नहीं सद्भाव की दृष्टि से देखता है। दलाईलामा स्वीकार करते हैं कि चीन की
नीयत कभी ठीक नहीं रही, पर भारत एक विशाल हृदय वाला देश है और यहां बौद्ध धर्म को कोई खतरा नहीं है। वे यह भी मानते हैं कि योग और ध्यान की संपदा में भारत उनका बराबर का भागीदार है। ध्यान के कुछ मामलों में तिब्बत भिक्षुओं को अपने प्रयोगों में अभूतपूर्व सफलता मिली है। पुनर्जन्म के क्षेत्र में लामाओं को जितनी सफलता मिली है और उन्होंने जितने प्रयोग किए हैं, वे आध्यात्म जगत में इलेक्ट्रानिक क्रांति की तरह ही महत्वपूर्ण हैं। दरअसल जो लोग समय के पार देखते हैं जिनके लिए अस्तित्व उतना ही नहीं जितना कि दिखाई देता है, उनके लिए दलाईलामा का काम दुनियावी कामों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। महमहिम की सरलता पहली नजर में एक आम व्यक्ति की छवि देती है, पर उनका ज्ञान और आध्यात्म के क्षेत्र में उनकी पहुंच उन्हें इतिहास का सर्वोच्च दलाईलामा सिद्ध करती है।
मैकलोडगंज तो जैसे विदेशियों का घर ही बन कर रह गया है। प्रति दिन यहां उनका आगमन होता रहता है। संभवत: वे अध्यात्म के बारे में कुछ नया पाने की ललक में यहां आते रहे हैं। क्योंकि वे बौद्ध धर्म को ज्यादा सहज और आसान पाते हैं। कितने ही विदेशी दलाईलामा के अनुयायी बन गए हैं। बौद्ध शिक्षाएं और व्यवहार उनके मस्तिष्क को आराम देते हैं। उन्हें यह शांति का रास्ता नजर आता है। हालीवुड स्टार रिचर्ड गेर दलाईलामा के अनुयायी हैं और वे विश्व में तिब्बत की स्वतंत्रता के लिए जारी संघर्ष का प्रचार कर रहे हैं। क्या तिब्बती अपने इस अभियान में कामयाब होंगे?
बहरहाल पराई जमीन पर तिब्बती जिस दुख और हताशा से घिर कर रह गए हैं, उससे उन्हें यही लगता है कि इस निराशा का कहीं अंत नहीं है। मैकलोडगंज की शांति अभूतपूर्व है। मंदिर में प्रतिदिन हजारों घी के दीप जलाए जाते हैं। उनकी झिलमिल करती रोशनियां आकर्षक लगती हैं। निर्वासन की तकलीफ झेलते हुए भी तिब्बतियों ने यहां जो मंगलमय दुनिया बसाई है, वह अद्भुत है। यह शहर दिन प्रतिदिन घना बसता जा रहा है, सड़कें तंग और खराब हैं, पर इन सड़कों के दोनों ओर एक रहस्यमय रंगीन संसार है। सुंदर एंटीक, रंगीन मनकों की माला, ढेरों पारदर्शी नगीने और फेंगशुई के सामान बेचती महिलाएं आपका ध्यान खींच लेंगी।
मंदिर के पास ही एक छोटा सा म्यूजियम है, इस बार पांच रुपए का टिकट लेकर मैं भी अंदर गई। यहां चारो ओर दुख, हताशा यातना और पलायन की तस्वीरें हैं। हां, इन सारी तस्वीरों के बीच एक बच्चे की तस्वीर है जो अपने हाथों में दलाईलामा की तस्वीर लिए मुस्करा रहा है। यही रहस्य है तिब्बती समुदाय की अदम्य जिजीविषा का।
दलाईलामा हजारों लोगों की आशा के पुंज हैं, किसी ईश्वरीय अवतार की तरह। संकट से घिरे इन लोगों का एक मात्र आसरा यही चेहरा है। दलाईलामा का कहना है कितिब्बत की सभ्यता संसार की प्राचीन सभ्यताओं में से एक है, इसलिए इसका संरक्षण होना ही चाहिए। अगर यह सभ्यता इस धरती से लुप्त हो जाएगी तो यह दुख की बात होगी। तिब्बतियों का मानना है कि उनका आध्यात्मिक जीवन उनके सांसारिक जीवन से ऊपर है और अगर यह संस्कृति ही मर गई तो उनकी पहचान क्या रह जाएगी। वैसे इस सुंदर संस्कृति का आकर्षण तो है ही, क्योंकि हालीवुड के सितारे अब मैकलोडगंज का रुख करने लगे हैं। मार्शल आर्ट के माहिर जैट ली, गोल्डीहॅान, अभिनेत्री मारियास्त्रिवेर, अर्नाल्डफेहवाज्दन यहां आने वालों में से हैं। कोई भी सोच सकता है कि इन सितारों का दलाईलामा के पास क्या काम? इनमें से कुछ तो दलाईलामा के समीप्य का आनंद लेने आते हैं और कुछ उनके साथ तिब्बत बचाओ अभियान में शामिल हो गए हैं। पर क्या इन सब का प्रयास कभी कामयाब होगा?
जवाब भविष्य के गर्भ में है, पर प्रयास तो जारी हैं। म्यूजियम में एक फिल्म बिना रुके लगातार चलती रहती है, इसमें तिब्बतियों के ऊपर होता चीनी अत्याचार दिखाया गया है। यातनाएं जारी हैं उनके हाथ पीछे बंधे हैं बेरहमी से हत्याएं की जा रही हैं। बीच- बीच में उनके चेहरे आते हैं, जो किसी तरह वहां से बच कर चले आए। ये चेहरे कहते कुछ नहीं, बस उनकी आंखों से पानी ढलक जाता है।
कोई बताएगा, कि यह कौन सी दुनिया है जहां मानवता के आंसू इस तरह बहते हैं। मौत का सीधा साक्षात्कार करते ये शांति के संवाहक।
उस दिन बौद्ध मंदिर में घूमते हुए मेरा दिल जैसे घबरा गया था, मैं मॉनेस्ट्री से बाहर आ गई। काफी दूर निकल जाने के बाद मैंने हाथ में लिया टिकट देखा, लिखा था- यदि आप इनके लिए पूजा के दीप जलाना चाहते हैं तो कृपया इस फार्म को भर दें, आपके नाम पर संग्रहालय में दीप जलाया जाएगा। पूजा के दीप के लिए सिर्फ पांच रुपए। मैंने हाथ में लिए टिकट को निराशा से देखा... मॉनेस्ट्री काफी दूर थी... फिर कभी, मैंने सोचा और टैक्सी स्टैंड की ओर बढ़ गई।

संपर्क: दिव्य हिमाचल, पुराना मटौर कार्यालय, कांगड़ा पठानकोट मार्ग,
कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)176001 मो. 09816164058





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