March 21, 2011

जल प्रदूषण नदियों को बचाना होगा

- अम्बरीष श्रीवास्तव
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस ग्रह पर उपलब्ध कुल पानी का मात्र 0.3 प्रतिशत हिस्सा ही मनुष्यों, पशुओं और पेड़- पौधों के उपभोग के लिए ठीक है। शेष 99.7 प्रतिशत जल या तो समुद्र के पानी के रूप में मौजूद है या फिर पहाड़ों पर हिमनद के रूप में।
जल प्रदूषण भारत में सबसे गंभीर पर्यावरण संबंधी खतरों में से एक बनकर उभरा है। इसके सबसे बड़े स्रोत शहरी सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट हैं जो बिना शोधित किए नदियों में प्रवाहित हो रहे हैं। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद शहरों में उत्पन्न कुल अपशिष्ट जल का केवल 10 प्रतिशत हिस्सा ही शोधित किया जा रहा है और बाकी ऐसे ही नदियों में प्रवाहित किया जा रहा है।
जल के स्रोतों जैसे झील और नदी- नालों में जहरीले पदार्थों के प्रवेश से इनमें उपलब्ध पानी की गुणवत्ता में गिरावट आ जाती है जिससे जलीय पारिस्थिकी गंभीर रूप से प्रभावित होती है। इस के कारण भूमिगत जल भी प्रदूषित हो जाता है। इन सबका इन जल स्रोतों के निकट रहने वाले सभी प्राणियों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। भारत सरकार को जल प्रबंधन के मोर्चे पर तत्काल कदम उठाने और ठोस परिणाम प्राप्त करने के लिए त्रुटिपूर्ण नीतियों को संशोधित करने की आवश्यकता है।
जल प्रदूषण मानव अस्तित्व की एक वास्तविकता है। कृषि और औद्योगिक उत्पादन जैसी गतिविधियाँ जैविक अपशिष्ट के अलावा जल प्रदूषण भी उत्पन्न करती हैं। भारत में हर वर्ष लगभग 5,000 करोड़ लीटर का जल अपशिष्ट उत्पन्न होता है जिसमें औद्योगिक और घरेलू दोनों ही स्रोतों से उत्पन्न अपशिष्ट जल शामिल हैं। अगर ग्रामीण क्षेत्रों के आंकड़ों को भी शामिल कर लिया जाए तो यह संख्या और बड़ी हो जाएगी। औद्योगिक अपशिष्ट में पाए जाने वाले हानिकारक तत्वों में नमक, विभिन्न रसायन, ग्रीज़, तेल, पेंट, लोहा, कैडमियम, सीसा, आर्सेनिक, जस्ता, टिन इत्यादि शामिल हैं। कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि कुछ औद्योगिक संगठन रेडियो- एक्टिव पदार्थों को भी जल के स्रोतों में प्रवाहित कर देते हैं जो जल शोधन संयंत्रों पर व्यय होने वाले धन को बचाने के लिए नियम कानूनों को ताक पर रख देते हैं।
भारत सरकार के सभी जल प्रदूषण नियंत्रण संबंधी प्रयास विफल रहे हैं क्योंकि शोधन प्रणालियों की स्थापना के लिए अधिक पूँजी निवेश और परिचालन के लिए भी अधिक आती है। शोधन संयंत्रों की उच्च लागत न केवल किसानों बल्कि फैक्टरी मालिकों के लिए भी सिरदर्द का कारण है क्योंकि इससे उनके द्वारा तैयार किये जा रहे उत्पादों की लागत बढ़ जाती है। किसी भी कारखाने में जल शोधन संयंत्र की स्थापना और उसके संचालन की लागत उस कारखाने के कुल खर्चों के 20 प्रतिशत तक हो सकती है। इसलिए हम एक ऐसी स्थिति देख रहे हैं जिसमें सरकारी मानदंडों के होने के बावजूद प्रदूषित जल बिना शोधन प्रक्रिया से गुजरे हुए नदियों में बहाया जा रहा है।
दूसरी ओर भारत सरकार जल प्रदूषण नियंत्रण पर प्रति वर्ष लाखों रुपए खर्च कर रही है। एक
मोटे अनुमान के मुताबिक भारत सरकार ने देश में विभिन्न जल प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाओं जैसे गंगा कार्य योजना और यमुना कार्य योजना पर अब तक लगभग 20,000 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। लेकिन अभी तक कोई भी सकारात्मक परिणाम दिखाई नहीं दिए हैं। सरकार को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि जल स्रोतों को प्रदूषण मुक्त करने के सभी उपाय विफल हो जायेंगे जब तक बिना शोधन के औद्योगिक और अन्य अपशिष्ट जल को उनमें प्रवाहित होने से नहीं रोका जाएगा।
इसलिए सरकार को जल प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाओं पर पैसा खर्च करने के बजाय कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों में जल शोधन संयंत्रों की स्थापना और संचालन को बढ़ावा देना चाहिए। जल प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाओं पर खर्च किये जाने वाले धन को उन उद्योगों को सब्सिडी देने और उन पर कड़ी निगरानी रखने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए जो अपनी गतिविधियों से अपशिष्ट जल उत्पन्न करते हैं। नैनो टेक्नालाजी जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि कम लागत में जल शोधन संयंत्र स्थापित किये जा सकें। यहाँ भी सरकार का दृष्टिकोण यह होना चाहिए कि शोधित जल को नदियों में प्रवाहित करने के बजाय कृषि जैसी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाए।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस ग्रह पर उपलब्ध कुल पानी का मात्र 0.3 प्रतिशत हिस्सा ही मनुष्यों, पशुओं और पेड़- पौधों के उपभोग के लिए ठीक है। शेष 99.7 प्रतिशत जल या तो समुद्र के पानी के रूप में मौजूद है या फिर पहाड़ों पर हिमनद के रूप में। इसलिए जल प्रदूषण के मुद्दे की और अधिक उपेक्षा करना तृतीय विश्व युद्ध को आमंत्रित करने जैसा होगा जो जल संसाधनों के नियंत्रण के लिए लड़ा जाएगा।
--

Labels: ,

1 Comments:

At 28 July , Blogger बस्तर की अभिव्यक्ति जैसे कोई झरना said...

प्रदूषण आज की भयावह समस्या है, फिर चाहे वह हवा का प्रदूषण हो, पानी का हो, भूमि का हो या फिर विचारों का । किंतु सरकारों के भरोसे हम पर्यावरण को जीने के लायक नहीं बना सकेंगे,जब तक नगरिक स्वयं इसकी गम्भीरता को नहीं समझेंगे तब तक कुछ नहीं हो सकेगा । विचार यह करना है कि लोगों को जागरूक कैसे किया जाय ..और फिर इस महा अभियान में उनकी सहभागिता कैसे तय की जाय !

 

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home