August 25, 2010

तिरंगे को सलाम

- नवीन जिंदल

तिरंगा लहराना और भारत को एक सूत्र में बांधना युवाओं को मजबूत भारत के निर्माण के लिए प्रेरित करता है।
डलास की टैक्सास यूनिवर्सिटी में पढ़ते समय, 20 साल के युवा, नवीन जिंदल ने अध्ययन के दौरान अमेरिका के लोगों को अपने झंडे पर गर्व से इठलाते हुए देखा था। उनका घर हो या पहनने के कपड़े सभी पर उनके झंडे पर बने तारे और पट्टियां नजर आती थीं और अमेरिका के लोगों का गर्व अपने देश में उनके राष्ट्रीय झंडे के रूप में स्वत: प्रकट होता है।
इस प्रवृत्ति को देखकर युवा नवीन जिंदल ने सोचा कि ऐसा हमारे देश में क्यों नहीं हो सकता है? उच्चतम न्यायालय ने 2004 में उनको इसका जवाब दिया, जब अपने ऐतिहासिक फैसले में उसने व्यवस्था दी कि आदर और गरिमा के साथ स्वतंत्र रूप से राष्ट्रीय झंडे को फहराना प्रत्येक भारतीय नागरिक का मौलिक अधिकार है। छात्र जीवन के प्रारंभ में ही राष्ट्रीय झंडे के लिए नवीन जिंदल के मन में बेहद श्रद्धा का भाव था, वहां पर वे छात्रों की अधिसभा के अध्यक्ष के रूप में अपने राष्ट्रीय झंडे का प्रदर्शन बड़े ही गर्व के साथ करते थे।
यूएस में अपनी उच्च शिक्षा को पूरी करने के बाद, 1992 में भारत वापस आने के बाद भी नवीन जिंदल ने छत्तीसगढ़ (तब मप्र) में रायगढ़ की अपनी फैक्ट्री के परिसर में भारत के राष्ट्रीय ध्वज को सम्मानजनक तरीके से फहराकर भारत का नागरिक होने के नाते अपने कत्र्तव्य और सम्मान को प्रदर्शित करना जारी रखा। बिलासपुर के तत्कालीन आयुक्त ने तब आपत्ति जताई थी कि भारत के ध्वज संहिता के अनुसार, किसी भी गैर-सरकारी नागरिक को निश्चित दिनों को छोड़कर भारतीय ध्वज फहराने की अनुमति नहीं थी।
नवीन जिंदल के अतिविशाल ध्वज
0 सोनीपत, हरियाणा में 207 फीट विश्व में सबसे ऊंचा झंडा।
0 कुरूक्षेत्र, कैथल, लडवा, हिसार हरियाणा में 206 फीट ऊंचा।
0 दिल्ली और गुडग़ांव, हरियाणा में 100 फीट ऊंचा।
0 रायगढ़, छत्तीसगढ़ में 100 फीट ऊंचा।
0 अंगुल, उड़ीसा में 206 फीट ऊंचा।
नवीन जिंदल ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत, सरकारी पदाधिकारी द्वारा उन्हें राष्ट्रीय घ्वज को फहराने से मना करने की कार्रवाई के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका प्रस्तुत की। किसी गैर-सरकारी व्यक्ति द्वारा झंडा फहराने पर रोक लगाने का कोई कानून नहीं था और ऐसा करने से रोकना संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन था, यह अनुच्छेद सभी भारतीय नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी प्रदान करता है। केन्द्रीय सरकार ने इसकी व्याख्या दी थी लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय की खंड पीठ ने 22 सितंबर 1995 को नवीन जिंदल द्वारा प्रस्तुत रिट याचिका को अनुमति दे दी थी। यह संघर्ष लगभग एक दशक से भी अधिक समय तक चलता रहा और अन्तत: 23 जनवरी, 2004 को माननीय उच्चतम न्यायालय ने नवीन जिंदल और भारत के नागरिकों के पक्ष में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया। इस प्रकार, एक दशक पुरानी कानूनी लड़ाई में जीत हासिल हुई। श्री जिंदल का दूसरा अभियान भी सफल रहा था जब दिसंबर 2009 में गृह मंत्रालय ने स्मारकों/ विशाल खंभों पर रात्रि में पर्याप्त रोशनी के साथ ध्वज को फहराने के उनके प्रस्ताव पर अपनी सहमति जताई थी। इसके बाद, उन्होंने अपने अभियान को आगे बढ़ाया और फरवरी 2010 में माननीय स्पीकर के माध्यम से भारतीय संसद की नियम समिति से संसद सदस्यों को सदन में बैठने के दौरान लेपल पिन से राष्ट्रीय ध्वज को प्रदर्शित करने की अनुमति प्राप्त की।
नवीन जिंदल का अगला कदम तिरंगे को देशभक्ति के अगले मुकाम पर ले जाना था। उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को 100 फीट से अधिक ऊंचे खंभे पर फहराना शुरू किया।
माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय से प्रेरित होकर नवीन जिंदल ने 'फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया' की स्थापना की थी जिसके माध्यम से वे प्रत्येक भारतीय को तिरंगे से अपने आप को जोडऩा चाहते हैं। फ्लैग फाउंडेशन आज के युवा वर्ग को इस तिरंगे से जोडऩे के लिए पूरी निष्ठा से प्रयास कर रहा है ताकि आजादी के लिए हमारे संघर्ष का यह शक्ति का प्रतीक बन सके और उन करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा के महान स्रोत के रूप में सेवा कर सके जो पूरे विश्व में अपने-अपने कार्यक्षेत्र में देश का नाम रोशन कर रहे हैं।
फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने हरियाणा में झंडा फहराने के लिए पांच विशाल खंभों की स्थापना पहले ही कर दी है। इनका वजन 12.5 टन है और इनको इस प्रकार से बनाया गया है कि इन पर लगभग 325 वर्ग मीटर के आकार वाले झंडे को फहराया जा सकता है। झंडे को सभी मौसमों में सुरक्षित रहने वाले 'डेनियर पॉलीस्टर' नामक विशेष सामग्री से तैयार किया जाता है जो तूफान हो या कोई अन्य मौसम सभी में पूरी तरह से सुरक्षित रहता है।
जब हम राष्ट्रगान की धुन के साथ हवा में अठखेलियां करते राष्ट्रीय ध्वज को देखते हैं तो हम रोमांचित हो उठते हैं। यद्यपि यह केवल एक कपड़े का टुकड़ा ही तो है लेकिन यह ध्वज हमारे दिमाग और दिल पर जो अमिट छाप छोड़ता है वह अतुलनीय है। हमारी देशभक्ति उस समय ऊंचाइयों को छूने लगती है जब हम विजेन्द्र सिंह या अभिनव बिन्द्रा को उनके पदक को लेने के लिए ओलंपिक के मंच पर ऊपर चढ़ते समय भारतीय तिरंगे को फहराया जाता देखते हैं। राष्ट्रीय ध्वज, चैंपियन और सैनिक दोनों को आनंद से झूमने पर मजबूर कर देता है।
आज के समय में, जब भारत आर्थिक महाशक्ति बनने और वैश्विक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए अपने विकास पथ पर निरंतर आगे बढ़ रहा है तो राष्ट्रीय ध्वज को स्वच्छन्दता से लहराते देखकर और भी अच्छा लगता है।
स्वतंत्रता दिवस के पावन मौके पर, आओ अपने मौलिक अधिकारों का सदुपयोग करें और अपने राष्ट्रीय ध्वज को इतनी ऊंचाई पर फहराएं जितनी ऊंचाई पर हम इसे लहराता देखना चाहते हैं। अपने देश के महान प्रतीक के माध्यम से गर्व के साथ अपने अनुराग को व्यक्त करने का समय आ गया है और जैसा कि 14 अगस्त, 1947 को जवाहर लाल नेहरू ने भी कहा था कि 'विकास के भावी कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करके और अपने अनूठे देश के लिए राष्ट्रवाद की भावना को जगा कर हमें अपनी नियति को पहले से ही निश्चित कर लेना चाहिए।'
नवीन जिंदल का कहना है 'राष्ट्रीय ध्वज फहराने से व्यक्ति धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्रवाद के संकीर्ण विचारों से ऊपर उठ जाता है और भारतीय होने के गर्व की भावना से ओत-प्रोत हो जाता है। हमारा तिरंगा प्रत्येक भारतीय के धर्म, भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीयता का प्रतिनिधित्व करता है और यह सच है कि यह 'विविधता में एकता' का महान प्रतीक है।'
ध्वज फहराने की वह लंबी लड़ाई
0 यूएस में अपनी उच्च शिक्षा को पूरा करने के बाद नवीन जिंदल 1992 में भारत वापस आए।
0 उन्होंने छत्तीसगढ़ (तब मध्य प्रदेश) में रायगढ़ में अपनी फैक्ट्री के परिसर में राष्ट्रीय ध्वज को सम्मानजनक तरीके से फहराया।
0 बिलासपुर के आयुक्त ने इस पर इस आधार पर आपत्ति जताई कि भारत में ध्वज संहिता के अनुसार, कतिपय दिनों को छोड़कर गैर सरकारी व्यक्ति को भारतीय ध्वज को फहराने की अनुमति नहीं है।
0 नवीन जिंदल ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सरकारी पदाधिकारी द्वारा राष्ट्रीय ध्वज को फहराने से मना करने पर दिल्ली उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की।
0 दिल्ली उच्च न्यायालय की खंड पीठ ने 22 सितंबर 1995 को नवीन जिंदल द्वारा दाखिल रिट याचिका को अनुमति दे दी।
0 भारत संघ ने जनवरी 1996 की किसी तिथि को उच्चतम न्यायालय के समक्ष एक विशेष इजाजत याचिका प्रस्तुत की।
0 7 फरवरी 1996 को माननीय उच्चतम न्यायालय ने इसकी अनुमति दे दी थी और विरोधी फैसले के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी थी।
0 भारत संघ ने 18 अक्टूबर 2000 को एक अन्तर-मंत्रालय समिति का गठन किया था।
0 नवंबर 2000 से लेकर मई 2001 तक सरकार उच्चतम न्यायालय से बार-बार स्थगन मांगती रही। विलंब की इस प्रकार के दांव- पेचों पर कड़ा रुख अपनाते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय ने २ मई 2001 को राष्ट्रीय ध्वज को उचित सम्मान, श्रद्धा और गर्व के साथ फहराने की अनुमति प्रदान कर दी थी।

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