June 05, 2010

डर से परे ही आजादी है

फ्रैंच नाइट पुरस्कार से सम्मानित

प्रथम भारतीय नारी डॉ. आशा पांडे
- रेणु राकेश
फ्रांसीसी राजदूत जेरोम बोनाफां के पत्र में घोषित किया गया था कि 28 सितम्बर 2009 को राष्ट्रपति, निकोलस सरकोजी ने फ्रेंच नाइट सम्मान के लिए आशा पांडे को मनोनीत किया है। इस घोषणा से वे 'नाइट सम्मान', नाइट ऑफ द नेशनल ऑडर ऑफ लीजन ऑफ ऑनर पाने वाले सत्यजित रे, रविशंकर, अमिताभ बच्चन और प्रसिद्ध पर्यावरणविद आर. के. पचौरी के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गयीं हैं।
इस सम्मान को पाने वाली पहली भारतीय नारी डा. आशा पांडे राजस्थान विश्वविद्यालय के ड्रामाटिक्स विभाग की अध्यक्ष हैं और यूरोपियन स्टडीज कार्यक्रम में मास्टर्स की संस्थापक निर्देशक हैं। विश्वविद्यालय के फ्रैंच और फ्रैंकोफोन स्टडीज केन्द्र की भी अध्यक्ष हैं। राजस्थान के स्कूल कॉलेजों में पिछले 27 वर्षों से फ्रैंच को प्रोत्साहन देने के लिए ही डा. पांडे को सम्मानित किया गया है।
डा. पांडे ने बताया कि इस भाषा से उनका प्रेम संबंध 1971 में शुरू हुआ तब वे पुणे से हायर सैकेंडरी करके अपने बड़े भाई स्वर्गीय एम.पी. पांडे के पास दिल्ली आयीं। दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले की तारीख निकल चुकी थी। अतीत में झांकती हुई आशा जी कहती है 'जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर और रूसी भाषा के विद्वान मेरे भाई ने सुझाव दिया कि मैं ज.ने.वि. द्वारा शुरु किये गये फ्रैंच भाषा के पंचवर्षीय स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में दाखिला ले लूं। उसमें एक विकल्प यह भी था कि साल भर बाद उसे छोड़ा जा सकता था। मैंने इस सुझाव को मान लिया।'
पर अब तो वे फंस चुकी थी। डा. पांडे का मानना है 'साल के अंत होते-होते मैं धड़ल्ले से फ्रैंच बोलने लगी थी। साथ ही अध्यापकों ने भी पाठ्यक्रम पूरा करने पर जोर दिया। खास बात यह थी कि अब मैं खुद भी नहीं छोडऩा चाहती थी।'
भाग्य ने साथ दिया और तीन साल में ही यू.जी.सी. से सॉरबॉन विश्वविद्यालय, पेरिस में तीन महीने के लिए फैलोशिप मिल गयी। वे अपनी पहली पश्चिम यात्रा के अनुभव याद करते हुए कहती हैं 'तब मैं केवल 19 साल की थी, मुझे अनुमति देने में मेरे माता-पिता को कुछ वक्त लगा। हम 6 विद्यार्थियों ने पेरिस के लिए एयर इंडिया की उड़ान ली। बिल्कुल नया अनुभव था- पहली हवाई यात्रा, पहला विदेशी सफर और वह भी अकेले। वहां, उतर कर एसकॅलेटर देखे, उनपर पांव रखने में भी डर लगा। सपनों के देश जैसा लगा। भाषा की समस्या तो नहीं थी पर सांस्कृतिक अंतर बहुत ज्यादा था। स्थानीय लहजे में फ्रैंच बोलने वालों के बीच थोड़ा डर भी लगा। पर, जैसा कि मैं अपने विद्यार्थियों से भी कहती हूं कि डर के परे ही आजादी है।'
जब आशा भारत लौटीं, उस समय देश में अंतर्राष्ट्रीय फिल्म उत्सव की तैयारी चल रही थी। आयोजक फ्रैंच दुभाषिया ढूंढ रहे थे। वे बताती हैं 'एक दिन आयोजक दुभाषिया का काम कराने के लिए मेरे यहां आये। मेरे इम्तहान करीब थे। पर जब उन्होंने कहा कि 'बेटा देश की इज्जत का सवाल है तो मैं मना न कर सकी।'
उनकी जिंदगी में यह परिवर्तन का पल था। इस उत्सव से उन्हें ख्याति मिली। भारतीय फिल्म उद्योग की जानी- मानी हस्तियों और बड़े अफसरों के साथ काम किया। इस दौरान शाम को होने वाली पार्टियों में भी आकर्षण का केन्द्र रहती थीं। उन पलों को याद करती हुई प्रोफेसर कहती हैं 'सबको पता था कि मैं विद्यार्थी हूं। खूब प्यार मिला मुझे सबसे। सारी रात पढ़ाई करती, सुबह इम्तहान देती और सारे दिन काम करती। राष्ट्रपति भवन की एक पार्टी में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भी मिली और उससे फ्रैंच में बातें भी की।'
फ्रैंच में एम.ए. करने के बाद आशा को 1976 में यू.जी.सी. की ओर से सॉरबॉन में पी.एच.डी. के लिए छात्रवृति मिली। पर पति आई.ए.एस. अशोक पांडे संप्रति राजस्थान के चुनाव आयुक्त, से विवाह हो जाने के कारण वे न जा सकीं। अपने दोनों बच्चों सिद्धार्थ ओर गौतम के लालन पालन के लिए उन्होंने 1977 से 1981 तक
नौकरी भी नहीं की।
1981 में एयर फ्रांस ने जयपुर में दफ्तर खोलने पर आशा को 1500/- अपने प्रतिमाह पर नौकरी का प्रस्ताव दिया। पर उनके पति ने उन्हें अध्यापन कार्य की ओर प्रेरित किया। उस समय महज 700 रु. प्रतिमाह वेतन पर जयपुर के माहेश्वरी पब्लिक स्कूल में काम प्रारंभ किया। एक साल बाद ही राजस्थान बोर्ड ने फ्रैंच को विषय के रूप में मान्यता दे दी। उसी साल डा. पांडे ने फ्रांस और भारत के बीच शैक्षिक और सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ाने के लिए इंडो-फ्रैंच कल्चरल सोसायटी की स्थापना की। उन्होंने अपने स्कूल में फ्रैंच क्लब शुरू किया जहां फ्रैंच सीखने के अलावा फ्रैंच फिल्म और गीतों की ओर विद्यार्थियों को प्रेरित किया।
1982 में जब उन्होंने काम करना शुरु किया था तब स्कूल और कॉलेजों में फ्रैंच का नामोनिशान भी नहीं था लेकिन अब यह संख्या 7000 तक पहुंच गयी है।
17 साल बाद 2004 में उन्होंने फ्रैंच में एम.ए. और पी.एच.डी. कोर्स शुरू किये। राजस्थान में 6 शोधार्थियों सहित 25 स्कूलों और 10 कॉलेजों में फ्रैंच की शिक्षा के लिए किये गये अपने प्रयत्नों पर डा. पांडे को गर्व है। विद्यार्थी और फैकल्टी के आदान-प्रदान कार्यक्रम के लिए भी उन्होंने कई फ्रैंच विश्वविद्यालयों के साथ संपर्क विकसित किये हैं।
डा. पांडे अपनी मां को याद करती हैं 'मैं अपने माता-पिता की नौवी संतान और चौथी बेटी थी। आस पड़ोस के लोग मां को ताना किया करते थे पर वह बहादुर थी। अक्सर कहती थी कि एक दिन यह लड़की नाम रोशन करेगी। अगर आज वो होती तो बहुत खुश होतीं।'
लड़कियों को सशक्त बनाना डा. पांडे का लक्ष्य है। गरीब लड़कियों के लिए वे विमुक्त विद्यालय चलाती हैं जहां लड़कियों को मुफ्त भोजन, आने-जाने की सुविधा, किताबें और गणवेष आदि सुविधाएं दी जाती हैं। 20 लड़कियों से शुरू हुए स्कूल में आज 250 लड़कियां हैं।
उनका विश्वास है कि उन्हें जो फ्रैंच सम्मान मिला है उससे जिंदगी में आगे बढऩे वाली महिलाओं को प्रेरणा मिलेगी। (विमेन्स फीचर सर्विस)

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