April 19, 2010

आपके पत्र/ मेल बॉक्स

स्त्रियों की दशा
मार्च अंक के अनकही में आपने स्त्रियों की दशा पर वल्र्ड इकानामिक फोरम के सर्वे के आधार पर प्रकाश डाला है। यह अध्ययन वाकई आंखें खोल देने वाला है। कहीं न कहीं लगता है अन्य सभी वर्गों के उत्थान के समान ही पनप चुकी असमानता की तरह ही महिलाओं में आंतरिक असमानता काफी बढ़ चुकी है। इस ओर यदि ध्यान आकर्षित किया जाए तो अधिक कारगर होगा।
- अंजीव पांडेय, समाचार संपादक, मेट्रो 7, नागपुर
Email-panjeev@gmail.com
निजी स्वार्थ के लिए वैराग्य
राठौर जी, आपने एकदम सही लिखा आजकल गृहस्थों से ज्यादा संयासी धनी हैं और उन्हें ही धन की जरूरत है। आज तो उन्होंने अपने निजी स्वार्थ के लिए वैराग्य की भी नई-नई परिभाषाएं शुरु कर दी हंै। इस बार की हरद्वार यात्रा से मेरा मन भी अत्यंत ही विचलित हो गया सन्यासियों की भोग लिप्सा देखकर।
- वेदना
बहुआयामी पत्रिका
उम्दा, बहुआयामी तथा सृजनात्मक क्षमता से पूर्ण मासिक पत्रिका उदंती हेतु आपको कोटिश: बधाई।
- सुरेश यादव, नई दिल्ली
sureshyadav55@gmail.com
रचनात्मक कला
एक स्वस्थ एवं संपूर्ण उदंती का अंक मिला। पत्रिका की सामग्री रोचक, ज्ञानवर्धक और पठनीय है। देवमणी पांडेय की रचनात्मक कला उत्तम है। इस अंक में प्रस्तुत लघुकथा और कविता का भरपूर आनंद लिया।
- देवी नागरानी, यूके
dnangrani@gmail.com
उदंती के बेबाक और विचारोत्तेजक लेख
उदंती के दिसंबर अंक में राहुल सिंह के लेख के जरिए हमें पता चलता है कि हमारे जीवन में तालाब कितना महत्व रखते हैं, आज मानव को यह जान लेना बेहद जरुरी हो गया है। हमारी पुरानी संस्कृति हमें प्रकृति के संवर्धन की शिक्षा देती है लेकिन हम इस धरती की लूट- खसोट में लगे हुए हैं... प्राकृतिक आपदाएं किसी न किसी रुप में हमें सचेत करती हैं, किन्तु इन्सान के लालच ने उसे इतना गिरा दिया कि उसकी सोचने की शक्ति क्षीण हो चुकी है।
जनवरी- फरवरी संयुक्तांक में अनकही एक विचारणीय लेख है। आज भी रक्षक के भेष में कई कथित भक्षक समाज में मौजूद हैं। जरुरत है तो इनके खिला$फ आवाज उठाने की और अराधना की तरह दिलेरी दिखाने की। पिछले दिनों ही अराधाना गुप्ता मुम्बई आईं थीं, उन्होंने जब पूरे घटना क्रम को सुनाया तो दिल दहल उठा। सुन कर हम सभी स्तब्ध रह गये। अराधना से मिलकर हमें बहुत अच्छा लगा साथ ही लडऩे का बल भी मिला। प्रताप सिंह राठौर के लेख में सही कहा गया है कि बाजारीकरण की हवा आज के तथाकथित बाबाओं को लग गयी है... इन्होंने असली संतों तथा आस्था पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। आपने सच ही कहा है कि आज सच्चे सन्तों को पहचानना मुश्किल हो गई है। पिछले दिनों इच्छाधारी बाबा के कारनामे सुनकर तो होश ही उड़ गए। सबसे बड़ी बात तो यह कि इन्हें राजनेताओं का आश्रय प्राप्त है, और ये बहुत जल्दी छूट भी जायेंगे। कवि कुलवंत की रचनाएं हमेशा नयापन लिए होती हैं। उदंती के मार्च अंक में होली पर उनकी कविता उतनी ही सुन्दर है... बधाई कुलवन्त जी!
उदंती के पिछले अंकों में बेबाक और विचारोत्तेजक लेखों के लिए उदंती परिवार को बधाई!
- सुमीता केशवा, मुम्बई , sumitakeshwa@yahoo.com

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लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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