March 17, 2010

बांधवगढ़

जब शेर भी हमारे साथ डिनर पर पहुंचा...

- वंदना अवस्थी दुबे
मध्य प्रदेश के बाघ अभयारण्यों में से एक है बांधवगढ़। शहडोल जिले के अंतर्गत बांधवगढ़ पहुंचने के लिए विन्ध्य पर्वत श्रृंखला को पार करना होता है। इतने घने और हरे जंगल पूरी पर्वत श्रृंखला पर हैं, कि मन खुश हो जाता है। बांधवगढ़ पहुंचने के लिए विन्ध्य पर्वत श्रृंखला को पार करना होता है। हमारी गाड़ी पहाडिय़ों पर सर्पिल रास्तों से होती हुई आगे बढ़ रही थी। इतना सुन्दर दृश्य!! वर्णातीत!
इसी पर्वत श्रृंखला में है मोहनिया घाटी, जहां पहली बार सफ़ेद शेर मिला था, इसीलिए उसका नाम मोहन रखा गया। सुबह 10 बजे हम बांधवगढ़ पहुंचे। वहां ठहरने के लिए एक रिसॉर्ट में बुकिंग पहले ही करा ली गई थी। हम सीधे वहीं पहुंचे, वह रिसॉर्ट इतनी खूबसूरत जगह पर है कि यहां से बाहरी दुनिया का अहसास ही नहीं होता। अलग- अलग बने खूबसूरत कॉटेज और घना बगीचा। आम्रपाली के अनगिनत पेड़, और उन पर लटकते असंख्य आम। अनारों से लदे वृक्ष। मन खुश हो गया। लंच के बाद हम नेशनल पार्क के भ्रमण पर निकले। पहले दिन तो हम जंगल की खूबसूरती ही देखते रह गए। रास्ते में हिरन और चीतलों के असंख्य झुंड नजर आए। शेर के पंजों के निशान भी दिखाई दे गए।
दूसरे दिन सुबह चार बजे उठ कर साढ़े चार बजे तक हम सब सफारी में सवार होकर जंगल के बीच थे। हमारी किस्मत अच्छी थी दो चक्कर लगाने के बाद ही जंगल के राजा के दर्शन हो गए। आराम फरमाता शेर.... अलस्सुबह ही शेर के दर्शन... उसकी गुर्राहट कानों में अभी भी गूंज रही है।
शाम के भ्रमण के बाद हमने कुछ शॉपिंग की और रात दस बजे के आस-पास अपने रिसॉर्ट पहुंचे गए। साढ़े दस बजे वेटर ने भोजन की सूचना दी। हम सब डाइनिंग स्पेस की तरफ बढऩे। पर्यटकों के रुकने की जगह को भी जंगल का अहसास दिलाने के लिये पूरे रिसॉर्ट को ही घने जंगल जैसा माहौल दे दिया गया था, लेकिन डाइनिंग स्पेस तो केवल आधे दीवारों से ही घिरा था। किसी चौबारे की तरह। खैर...हम डिनर के लिये पहुंच गए। अभी खाना प्लेट में निकाल ही रहे थे, कि बाहर की ओर से किसी जानवर के गुर्राहट की आवाज सुनाई दी। सब ने सुनी, मगर किसी ने कुछ नहीं कहा। एक बार...दो बार...तीन बार... अब बर्दाश्त से बाहर था... आवाज़ एकदम पास आ गई थी। मेरी बेटी ने पहल की- बोली ये कैसी आवाज़ है? अब सब बोलने लगे- हां हमने भी सुनी... हमने भी...
खाना सर्व कर रहे वेटर ने बेतकल्लुफ़ी से कहा- अरे ये तो बिल्ली की आवाज़ है। हममें से एक ने कहा... ऐसी आवाज़ में बिल्ली कब से बोलने लगी!!! नहीं... ये बिल्ली नहीं है... गुर्राहट और तेज़ हो गई... अब दीवार के उस पार शेर और इस पार हम... जंगल से लगा हुआ रिसॉर्ट... हदबंदी के लिये बाड़ तक नहीं... हमारा पूरा परिवार तो था ही, मेरी भांजी भी साथ में थी....हे ईश्वर!!! दौड़ कर दोनों बच्चों को किचन में बंद किया। सारे वेटर भी डरे हुए थे... बोले- हां शेर आ तो जाता है यहां... पिछले दिनों एक लड़के को खा गया था... काटो तो खून नहीं... टेबल पर जस का तस पड़ा खाना... हमने तय किया यहां खड़े-खड़े मौत का इंतज़ार करने से अच्छा है, अपने कॉटेज की तरफ़ जाना। हमारे कॉटेज डाइनिंग स्पेस से कम से कम सौ कदम दूर... इस समय जंगल का मज़ा देने वाले इस रिसॉर्ट पर कोफ्त हो आई।
कल तक जिसकी तारीफ़ करते नहीं थक रहे थे, आज वही मौत का घर दिखाई दे रहा था। खैर...धीरे-धीरे आगे बढ़े.. एक-दूसरे का हाथ पकड़ते किसी प्रकार कॉटेज तक पहुंचे। आह... सुकून की लम्बी सांस... पूरी रात आंखों में कटी। सबेरे जब हम फिर भ्रमण के लिये निकले- लोगों को कहते सुना- रात बोखा (मेल टाइगर का नाम) शहर की तरफ़
आया था!

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