March 17, 2010

पानी का संकट

होली को पूर्वजों ने एक सामूहिक सफाई के त्यौहार के रूप में भी माना था। जैसे दिवाली पर प्रत्येक व्यक्ति निजी घर की लिपाई, पुताई और स्वच्छ करता है, उसी प्रकार होली पर समस्त ग्राम या कस्बे की सफाई का सामूहिक कार्यक्रम रखा जाता था। वसंत ऋतु में पेड़ों के पत्ते झड़ जाते है, कूड़ा कबाड़ भी इकट्ठा होता है, उन सबकी सफाई होली में कर दी जाती थी। पर अब लोग उस उद्देश्य को भूलकर दूसरों पर कीचड़ और धूल फेंकने को त्यौहार का अंग समझ बैठे हैं।

जबकि पुराने समय में टेसू के फूलों का रंग बनाकर एक-दूसरे पर डालने की प्रथा चलाई गई थी और यज्ञ की सामग्री में भी इन्हीं फूलों की अधिकता रखी गई थी जिससे वायु में उपस्थित रोग के कीटाणु नष्ट हो जायें। पर आज उस टेसू के लाभदायक रंग के स्थान पर हानिकारक रंगों का प्रयोग किया जाता है। जिसे छुड़ाने के लिए हजारों गैलन पानी हम नष्ट करते हैं।

क्या हम होली के दौरान पानी बचा सकते हैं? क्या हमें पानी के अपव्यय के प्रति जागरुक नहीं होना चाहिये? सिफऱ् एक बार विचार कीजिये कि रोजाना हम पानी का उपयोग कितना बिना सोचे-समझे करते हैं। होली खुशी और उल्लास से मनाईये लेकिन पानी का अपव्यय करकें नहीं। क्या आप पूरा एक दिन बिना पानी के गुजारने की कल्पना कर सकते हैं? नहीं, पानी अनमोल है, इसलिये संकल्प करें कि इस होली पर पानी बचाकर न सिफऱ् आप अपने बल्कि समूचे विश्व को एक नए रंग में रंग देंगे।

इस वर्ष होली के बाद 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जायेगा, यह सिर्फ संयोग नहीं है, बल्कि प्रकृति का एक सन्देश है कि हम ये बात याद रखें कि इस धरती पर भीषण जल संकट है, विश्व की लगभग सवा छ: अरब आबादी में से एक अरब जनसंख्या को पीने का साफ़ पानी भी उपलब्ध नहीं है। जबकि विभिन्न इलाकों में पानी के लिये लड़ाईयां जारी हैं। ऐसे में हम अपना त्यौहार कम से कम पानी से मनायें तो अच्छा होगा। गुलाल से सूखी होली खेलने का अभियान इस वर्ष पानी बचाने की दृष्टि से एक अच्छी शुरुआत है।

पानी को कमी को लेकर जबसे चिंतन किया जा रहा है तब से बहुत सी संस्थाएं सुखी होली खेलने के लिए प्रेरित कर रही हैं लेकिन क्या आप जानते हैं मंडावा में सूखी व शालीन होली खेलने की परंपरा पिछले सौ साल से चली आ रही है। जहां सिर्फ अबीर-गुलाल से होली खेली जाती है। मंडावा की इस होली की खासियत यह है कि यहां ब्रज की लट्ठमार होली की तरह जयपुर, दिल्ली व मुम्बई के साथ विदेशों से भी सैलानी इसे देखने आते हैं। यहां की होली में फुहड़पन, कीचड़, पानी और पक्का रंग नहीं होता फिर भी रंग ऐसा चढ़े कि छुटाए ना छूटे।

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