October 24, 2009

60 के पार चुस्त-दुरुस्त रहना हो तो....

- नरेन्द्र देवांगन
वे घर पर पहले की अपेक्षा बेहतर जीवन बिता पा रहे हैं। मानसिक सक्रियता कुछ ऐसी बढिय़ा हो गई है कि वे अपने नाती-पोतों को उनकी छोटी- मोटी उलझनें दूर करने में थकान या परेशानी बिलकुल नहीं महसूस करते। बल्कि वे बड़े मज़े से इन बच्चों को उनके सवालों का हल ढूंढने अथवा शब्दकोश में से शब्दार्थ ढूंढ निकालने में मदद कर सकते हैं।
बढ़ती उम्र का सबसे डरावना लक्षण होता है दिमागी हालत का बिगडऩा। लेकिन यह समस्या या ऐसे लक्षण उन लोगों के पास फटकते भी नहीं जो अपने दिमाग को हमेशा सक्रिय रखते हैं। यह केवल कपोल कल्पना नहीं बल्कि अनुसंधान द्वारा प्रमाणित सत्य है। अध्ययन बताते हैं कि दिमागी कसरतें जारी रखी जाए तो इसका जादुई सकारात्मक असर स्मरण शक्ति पर, तर्क करने की क्षमता पर और जटिल से जटिल विषयों को समझने के मामले में दिखाई देता है। अब तक के ऐसे सबसे बड़े अध्ययन में 65 वर्ष से ऊपर के 2800 बुजुर्गों को शामिल किया गया था। सभी स्वस्थ मानसिक स्थिति वाले थे। कुछ व्यक्ति तो 94 वर्ष से भी ऊपर के थे। पांच सप्ताह तक कंप्यूटर और पेपर-पेंसिल की मदद से इनको एक तरह का प्रशिक्षण दिया गया था और इसके बाद निहायत आश्चर्यजनक परिणाम सामने आए। इन बुजुर्गों की मानसिक क्षमता तो बढ़ी ही, साथ ही ऐसा महसूस होने लगा मानो इनकी उम्र 7 से 14 वर्ष तक कम हो गई हो। इस तरह के प्रयोग के दौरान यह पाया गया कि ये बुजुर्ग लोग बड़ी जल्दी ही बात को समझकर उस पर अपना मत व्यक्त करने लगे, टेलीफोन बुक में से बहुत जल्दी ही फोन नंबर ढूंढ लेते थे। आसपास की घटनाओं और सूचनाओं को भी बहुत अच्छी तरह और तेज़ी से ध्यान में लेने लगे थे। कुछ अन्य प्रयोगों में यह भी देखा गया कि उम्रदराज़ लोगों की गाड़ी चलाने की क्षमता भी विकसित हुई। प्रशिक्षणों में शामिल बुजुर्ग स्त्री-पुरूषों ने यह स्वीकार किया है कि उनकी मानसिक स्थिति काफी चुस्त-दुरुस्त हुई है। कुछ का कहना है कि वे अब बेहतर तरीके से गाड़ी चलाने लगे हैं जबकि कुछ लोगों ने बताया कि वे घर पर पहले की अपेक्षा बेहतर जीवन बिता पा रहे हैं। मानसिक सक्रियता कुछ ऐसी बढिय़ा हो गई है कि वे अपने नाती-पोतों को उनकी छोटी- मोटी उलझनें दूर करने में थकान या परेशानी बिलकुल नहीं महसूस करते। बल्कि वे बड़े मज़े से इन बच्चों को उनके सवालों का हल ढूंढने अथवा शब्दकोश में से शब्दार्थ ढूंढ निकालने में मदद कर सकते हैं। हालांकि वैज्ञानिक और डॉक्टर्स कहते हैं कि इस तथ्य के प्रमाणीकरण के लिए पर्याप्त सबूत उपलब्ध नहीं हैं कि केवल एक विशिष्ट प्रकार का प्रशिक्षण मानसिक अवस्था में सकारात्मक परिवर्तन लाता है लेकिन वे यह ज़रूर मानते हैं कि बुज़ुर्ग लोग ही नहीं बल्कि कोई भी पहेलियां बूझने वाले खेलों से, ताश के ब्रिज जैसे खेलों से, किसी नए विषय को सीखने की रुचि से अपने दिमाग की क्षमता का विस्तार कर सकता है। साथ ही यह भी माना जा रहा है कि इस तरह की दिमागी कसरतों के ज़रिए हर व्यक्ति का जीवन बेहतर बनाया जा सकता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि दिमाग को सक्रिय रखना, इससे काम लेते रहना ही इसके लिए बेहतरीन कसरत साबित होती है। इस तरह की कसरत नियमित रूप से करनी चाहिए।
प्रमाण ऐसे भी मिले हैं कि वृद्धावस्था में भी दिमाग लचीला ही रहता है बशर्ते कि उसका भरपूर उपयोग किया जाए। बढ़ती उम्र में दिमागी हालत के बिगडऩे अथवा दिमागी बीमारियों का शिकार होने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह रहता है कि इसका पर्याप्त रूप से इस्तेमाल नहीं किया जाता। बढ़ती उम्र में दिमाग की कोशिकाएं अगर नष्ट होती हैं तो नई कोशिकाएं बनती भी हैं। और इस प्रक्रियाको और तेज़ किया जा सकता है। इसके लिए दिमागी कसरतों के साथ-साथ शारीरिक कसरत भी नियमित रूप से करने की ज़रूरत होती है। पोषक आहार भी इस प्रक्रिया को सुदृढ़ करने में मददगार साबित होता है। एंटीऑक्सीडेंट्स और कई विटामिनों से युक्त फलों एवं सब्जिय़ों का सेवन बेहतर परिणाम देता है। तनाव से दूर रहना, अच्छी नींद लेना, सामाजिक सक्रियता बनाए रखना वगैरह कुछ ऐसी बातें हैं जो वृद्धावस्था में भी आपको शारीरिक व मानसिक रूप से खूब तन्दुरुस्त रख सकती हैं। उच्च रक्तचाप और मधुमेह (डायबिटीज़) जैसी बीमारियों का तुरंत व समुचित इलाज करवाकर दिमाग को इनके दुष्प्रभावों से बचाया जा सकता है। प्राय: यह देखा गया है कि 60 से 70 की उम्र के आसपास दिमाग की हालत कमज़ोर होने लगती है। लेकिन अगर उपरोक्त बातों का ध्यान रखा जाए तो ऐसी शिकायतों से बचे रहना सभी के लिए संभव है। इस गलतफहमी से मुक्त हो जाएं कि बढ़ती उम्र दिमाग खराब करती है। तात्पर्य यह है कि दिमागी हालत को चुस्त-दुरुस्त रखना है तो दिमाग का जमकर इस्तेमाल करें। तभी यह सक्रिय रहेगा वरना निष्क्रिय हो सकता। (सोत फीचर्स)
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2 Comments:

Jaijairam anand said...

A veryuseful artikle for seniors.the other articles are alsotellthe story of the present
Thanks to the editors &allconcerned
Dr JaiJai Ram Anand

कडुवासच said...

... prasanshaneey lekh !!!!

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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