August 20, 2009

पीपल का पेड़ और मैं

- हरि जोशी 
मैं हूं और मेरे सामने पीपल का पेड़ है,
पतझर कल ही गई है,
एक- एक पत्ता जो सूख चुका था,
उड़ गया हवा में,
 अब निर्वस्त्र रह गया, दुबला, दरिद्र पेड़।

कल जो पत्ता कृशकाय था,
हवा के छोटे- छोटे थपेड़े भी सह न सका,
अन्तत: उखड़ गया जड़ से।

आज से सहस्त्रों पान, स्निग्ध और भोले भाले
नई हवा के प्रवाह में,
सुख ही नहीं देंगे, ये नवजात शिशु समूह
हिल हिल कर नहीं, हाथ हिलाकर,
 वसंत का स्वागत करने वाले हैं।

नवजात पत्तों की शिराओं में भी बहता है धवल दुग्ध,
जो मात्र स्फूर्ति ही नहीं,
जीवन भर, लडऩे की जिजीविषा भी देता है।

जो पत्ता वृद्ध था, कड़ा हुआ, फिर उखड़ा,
आंधी के प्रथम प्रहार ने निर्वासित कर दिया।
वह अपने शिशुपन में, लचीला था,
 हरा भरा उत्साह से भरपूर बहुत।

पत्ता चाहे हरा पीला या सूखा था,
वृक्ष से जब तक जुड़ा था, संरक्षित सुरक्षित था
टूटते ही हो गया अनाथ,
खाने लगा दर दर की ठोकरें।

मुझे ज्ञात है एक वर्ष पूर्व ही
प्रथम जन्मदिन था उसका,
इस वर्ष हो गई उसकी मृत्यु,
एक वर्ष का जीवन पूरा कर,
 छोड़ गया सारा संसार,
आ जाएगा नया पत्ता उसकी जगह,
किन्तु उसका अता पता अब किसी को नहीं।

कैसी भी तुरुप चाल चले,
उसका अवसान होना है,
पत्ते और मनुष्य में उम्र का ही भेद है,
अन्यथा नियति वही,
लाल होना, हरा- भरा होना,
पीला पड़ जाना, फिर उड़ जाना।

पीपल की पूजा होती, क्योंकि वह छांह देता,
फसलों, बच्चों को, सुख देता लहलहाने का।

मनुष्य लहलहाने का नहीं,
 लहूलुहान करने का अनुभव देता,
सिर्फ एक वर्ष नहीं, पूरे सौ वर्ष तक,
हां उसके बाद पत्ता तो उसका भी कटता है।
कौन उसके साथ में भटकता है।
नदी
उसे मात्र नदी न कहो,
वह अलौकिक ही नहीं संपूर्ण साध्वी भी है,
पारदर्शी, अतल गहराई युक्त, उदार हृदय वाली।
निरन्तर प्रवाहमान, उमंग में छलछलाती,
करूणामयी तुरही, सांस्कृतिक दुंदुभि।
 
गजबदनी प्राणियों के लिए ही नहीं,
चीटियों, भ्रमरों के लिए भी,
आशीर्वाद का स्नेह छलकाती बढ़ती ही जाती वह।
आशा की किरण,और विश्वास की  यह देवी
किनारे पर खड़े शिशु वृक्षों को,
जलपान, पयपान कराती चलती।

भविष्य के छायादार, फलदार वृक्ष यही होंगे,
पूर्णतया आशान्वित रहती
अपने साम्राज्य की सतर्क महारानी,
सबके लिए सिंचन कर, जीवन में हर्ष लाती है।

छाया के तले हरी दूर्वा पर झपकी लें,
पदन्यासी विश्राम करेंं।
तनिक भेदभाव नहीं, धर्म का या पंथ का,
स्नान करें, चाहें स्तुतिगान करें।

स्थायी आमंत्रण, निर्मल स्वच्छ, होने का,
प्रत्येक मां बच्चे का ज्यों  व्यक्तित्व संवारती,
भीतर और बाहर से, निष्कलुष हो जाने का
आज, इसी क्षण उसी सूत्र को बताएगी,
भले वह कल कल कहे।

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