March 21, 2009

छत्तीसगढ़ को अमरकंटक क्यों नहीं मिलना चाहिए



छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के दौरान काफी प्रयास किया गया था कि अमरकंटक को छत्तीसगढ़ में शामिल कर लिया जाए। तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में अजीत जोगी ने भी इस मामले में काफी रुचि ली थी, पर उस समय मध्यप्रदेश के दिग्गज नेताओं के विरोध की वजह से सफलता नहीं मिल पाई थी। अब अपनी दूसरी पारी में छत्तसीगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने भी अमरकंटक को छत्तीसगढ़ से जोडऩे के मुद्दे पर कहा है कि अमरकंटक से यहां के लोगों की भावनाएं जुड़ी हुईं हैं तथा हम इसका सम्मान करते हैं और सरकार इसके लिए हर संभव कोशिश करेगी।
- आचार्य रमेन्द्र नाथ मिश्र


छत्तीसगढ़ देश का एक ऐसा भू-भाग है जो उत्तर- पूर्व पश्चिम भारत को जोड़ता है। यह सांस्कृतिक एकता की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। अतीत से अद्यतन यहां पर सर्व धर्म सम भाव एवं सामाजिक समरसता की भावना रेवा (नर्मदा), चित्रोत्तपला (महानदी) के निरंतर प्रवाहमयीं जलधारा के सदृश्य विद्यमान है। प्राचीनकाल से लेकर महारानी विक्टोरिया के प्रत्यक्ष प्रशासन के पूर्व तक अमरकंटक छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां के एक गढ़ करक्कट्टी से जुड़ा एवं पेंड्रागढ़ के अंतर्गत अमरकंटक रहा है। यह समूचा क्षेत्र रतनपुर के हैहयवंशी राजाओं के अधिकार में सदियों तक रहा तथा उनके पराभव के बाद मराठा शासकों के अधिकार में आया। नागपुर के भोसला राजा रघुजी तृतीय के प्रशासन के अंतर्गत छत्तीसगढ़ प्रांत में अमरकंटक था। यह सब ऐतिहासिक दस्तावेज हैं जो प्रमाणित करते हैं कि अमरकंटक छत्तीसढ़ के भूभाग में आता है।

रतनपुर राज्य के इतिहासकार बाबू रेवाराम की कृति तवारिख श्री हैहय वंशी राजाओं की तथा पं. शिवदत्त शास्त्री के रतनपुर आख्यान छत्तीसगढ़ी की कृति में अमरकंटक का उल्लेख कुछ इन शब्दों में हुआ है- लाफा, विंध्याचल, मेकल, तुम्मानखोल, नर्मदा, अमरकंटक क्षेत्र रतनपुर राज्य की परिसीमा में था। यहां के राजा जीवन के अंतिम दिनों में तपस्या करने के लिए अमरकंटक में रहते थे। राज पाट अपने युवराज पुत्र को सौंप देते थे। गंगा तीर्थ नर्मदा या श्री क्षेत्र अमरकंटक में रतनपुर के राजा यज्ञ भी करते थे। अधिकांश राजा इस पुण्य भूमि में मृत्यु को प्राप्त करते थे।

छत्तीसगढ़ सीमा घाट क्षेत्र अमरकंटक लांजी तक बताया गया है। सन् 1838 के भोंसला राजा के समय के कागजात के बस्ते से जो जानकारी मिली है उससे यह पिंडरा नर्मदा नदी के तीर में मेकल पहाड़ है। तपस्वी लोग बहुत रहते आये ऐसा कहा जाता है। सबब, उस जगह में भी तपस्या किये होंगे। यह पिंडरा (पेंड्रा) मेकल पहाड़ के घाट पर बसा है अत: पुराण में मेकल पहाड़ और नर्मदा महात्म व नर्मदा खंड पुरान में आवती है। केंदा पहाड़ी जगा है नर्मदा का तट वही पुन्य भूमि है ना जाने बहुतेरे जोगी लोग तपस्या किये होंगे, जग्य भी ऋषि लोग किये होंगे।

अमरकंटक को छत्तीसगढ़ में क्यों होना चाहिए इसके कई और भी प्रमाण हमारे इतिहस में दर्ज हैं जैसे रतनपुर के राजा ने पेंड्रा जमींदारी की स्थापना 15वीं शताब्दी (संवत् 1533 ई व 1476) के उत्तरार्ध में किया था। इसके अलावा 1860 में रायपुर के डिप्टी कमिश्नर एवं 1867 के चीजम की रिपोर्ट में अमरकंटक का उल्लेख मिलता है। यूरोपीय यात्री कैप्टन ब्लंट ने 1795 में इस अंचल की यात्रा की थी। जनरल कंर्निधम की रिपोर्ट में भी इस अंचल की यात्रा की जानकारी मिलती है। 1857 की क्रांति में सोहागपुर में बेरन साहब (बेरन वॉम मेयरन) ने विप्लवकारियों के दमन का प्रयास किया था, जिसमें रीवां राज्य का सहयोग रहा। क्रांति के बाद पेंड्रा जमीदारी के दक्षिण-पश्चिम सीमावर्ती अमरकंटक को अंग्रेजों ने दबावपूर्ण जमीदार से लेकर रीवां के राजा को सहयोग के फलस्वरूप उपहार में दे दिया था। इसके बाद भी अंग्रेजी राज के अंतर्गत छत्तीसगढ़ पीडब्ल्यूडी विभाग द्वारा पेंड्रा से अमरकंटक तक सड़क बनाई गई थी, क्योंकि तीर्थ यात्री इसी मार्ग से अमरकंटक जाते थे और उनकी सुरक्षा का दायित्व पेंड्रा के जमींदार पर रहता था।
उपरोक्त उद्धरणों से यह प्रतीत होता है कि प्राचीन पांडुलिपियों में रतनपुर की लौकिक परंपरा में अमरकंटक छत्तीसगढ़ का अविभाज्य अंग रहा है। इस संबंध में यदि अन्य कोई अभिलेखीय प्रमाण, ताम्र पत्र आदि हैं तो उनका अध्ययन किया जाना चाहिए जैसे रींवा राजा के अभिलेखागार के स्त्रोतों का अध्ययन होना चाहिए ताकि तथ्य और सत्य उजागर हो सके। कुल मिलाकर सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक दृष्टि से अमरकंटक आज भी छत्तीसगढ़ से संबंद्ध है। इस नाते अमरकंटक को छत्तीसगढ़ राज्य में होना चाहिए।

आज अमरकंटक की जनता छत्तीसगढ़ राज्य में रहना चाहती है। उनके जीवन यापन के साधन पेंड्रा रोड से ही संपादित होते हैं।
संयोगवश छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश में एक ही विचारधारा की सरकार है अत: समस्या का समाधान सकारात्मक रूप से भी हो सकता है। नर्मदा का उद्गम स्थल अमरकंटक जो छत्तीसगढ़ में है इस सत्य को स्वीकारते हुए मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा के गौरव को भी स्वीकारना है, क्योंकि नर्मदा का समग्र अधिकांश भाग तो मध्यप्रदेश में ही है। यदि यह नर्मदा गुजरात में जाकर समुद्र में मिलती है तो वह क्षेत्र गुजरात का ही रहेगा। तो क्या गुजरात भी अमरकंटक पर दावा करे। अत: इसे राजनीतिक परक विचारों से दूर रखकर जनता के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक भावनाओं के परिप्रेक्ष्य में महान नदी नर्मदा की महानता को अक्षुण रखा जाए। हमें उसे भौगोलिक सीमा से परे राष्ट्र की धरोहर के रूप में हमें स्वीकारना होगा। अमरकंटक में उपलब्ध कल्चुरी कालीन मंदिर भी इस बात के घोतक हैं कि सांस्कृतिक दृष्टि से उस युग में भी सामंजस्य एवं सद्भावना की भावना नीहित थीं।

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राष्ट्र के ही एक अंग हैं। अत: भेद भाव न करते हुए इसे छत्तीसगढ़ का अमरकंटक के रूप में यथार्थ बोध को आत्मसात करना होगा। भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर नर्मदा के उद्गम से लेकर कपिलधारा तक उस पार मध्यप्रदेश में रहे और इस पार को छत्तीसगढ़ राज्य की सीमारेखा के रूप में भी स्वीकारा जा सकता है। इससे दोनों राज्यों को फायदा होगा। पर्यटन की दृष्टि से विकास का अवसर मिलेगा और तब लोग अमरकंटक के महत्व को अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिपादित करने में सहभागी बनेंगे। अमरकंटक में सोननदी, गुलबकावली का बगीचा नर्मदा कुंड, कपिल धारा तथा दूध धारा तथा कल्चुरी कालीन मंदिर जैसे स्थल हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। इस पुण्य स्थल के दर्शन से सर्वजनीय लाभ होगा। संप्रति यही सद्भाव एक सार्थक पहल होगा।


छत्तीसगढ़ से प्रति वर्ष 30 हजार पर्यटक

1065 मीटर की ऊंचाई पर विंध्य और सतपुड़ा पर्वतमालाओं के बीच
स्थित हरा-भरा अमरकंटक प्रसिद्ध तीर्थ और पर्यटन स्थल है।
क्या खास: जलेश्वर महादेव, सोनमुड़ा, भृगु कमंडल, धूनी पानी, दुग्धधारा,

नर्मदा का उद्गम, नर्मदा मंदिर व कुंड, कपिलधारा, दूधधारा, माई की

बगिया, सर्वोदय जैन मंदिर।

धार्मिक महत्व: नर्मदा को समर्पित कई मंदिर, कल्चुरि काल के मंदिर,

जैन मंदिर और नर्मदा कुंड।

शहर से दूरी: कटनी बिलासपुर रेल लाइन पर पेंड्रा से 42 कि.मी.।

बिलासपुर से बाई रोड 110 कि.मी.।

कितने पर्यटक: हर माह छत्तीसगढ़ से करीब 25 से 30 हजार पर्यटक

अमरकंटक पहुंचते हैं।

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही साथी समाज सेवी संस्थाद्वारा संचालित स्कूलसाथी राऊंड टेबल गुरूकुल में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है।
शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से साथी राऊंड टेबल गुरूकुलके बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है।
अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर,तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में),क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर,पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर,जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ।
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