February 25, 2009

भारतीय कारोबार की छवि पर कालिख

इस समय जब दुनिया भर में आर्थिक मंदी का दौर चल रहा है, ऐसे में देश की चौथी सबसे बड़ी कम्प्यूटर कंपनी सत्यम के शेयर घोटाले का उजागर होना हमारे देश के लिए एक शर्मनाक घटना है। सत्यम द्वारा की गई यह जालसाजी राष्ट्रीय स्तर का धोखा है।
सत्यम के मालिक रामलिंगा राजू ने अपनी ही कंपनी में 7 हजार 800 करोड़ का घोटाला करके असंख्य छोटे शेयर धारकों के साथ धोखा किया है। इस तरह के मामलों से बड़ी कंपनियों की विश्वसनीयता तो घटती ही है देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है। इस घटना के बाद भारत के प्रधानमंत्री ने कहा कि इस घोटाले से अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारतीय कारोबार की छवि पर कालिख लग गई है।
किसी भी बड़ी कंपनी में इस प्रकार की जालसाजी में सबसे बड़ा दोषी वह माना जाता है जो कंपनी का नियामक - वॉचडॉग (पहरेदार) - होता है, जिसका काम ही होता है कंपनी के कारोबार पर निगरानी रखना और उसका सही- सही लेखा- जोखा प्रस्तुत करना। वॉचडॉग को यदि जरा सी भी भनक मिल जाए कि कंपनी में गड़बड़ी की आंशका है तो उसकी पहली जिम्मेदारी बनती है कि वह खतरे की घंटी बजाए, शोर मचाए। बिल्कुल उसी तरह जिस प्रकार घर का पालतू कुत्ता घर की रखवाली करता है, चोरों से मालिक को सावधान करता है। लेकिन यहां उस नियामक को क्या कहिए जिसका मेहनताना पिछले सात वर्षों में बढाक़र तिगुनी कर दी गई हो, वह भला कंपनी की गड़बडिय़ों को उजागर करके अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी क्यों मारेगा। लेकिन जहां लाखों लोगों की पूंजी लगी हो वहां सब कुछ जानते और देखते हुए भी चुप रहना बहुत बड़ा गुनाह है। आम आदमी यह सोचकर किसी भी बड़ी कंपनी के शेयर खरीदता है कि फायदा होने पर कुछ अधिक पूंजी जमा हो जाएगी, जो मुसीबत के समय उसके काम आएगी।
अब प्रश्न यह उठता है कि जो निवेशक इस जालसाजी का शिकार हुए हैं, क्या कानून उन्हें अपने नुकसान की भरपाई के लिए कोई विशेष अधिकार देगा? परंतु सबसे पहले जरुरी यह होना चाहिए कि नियामक यदि बेइमानी करे तो उसे दंड देने के लिए कड़े प्रावधान हों क्योंकि अभी तक नियामक को दंडित करने का कानून बेहद ही लचर... है। जब चोर चोरी करके भागता है तो वह तो अपराधी तो होता ही है पर जब पुलिस चोर को भागते देखकर भी अनदेखी कर देती है तो वह उससे भी बड़ा गुनाहगार होता है। ऐसा ही कुछ सत्यम घोटाले में भी हुआ है।
सत्यम कम्प्यूटर्स में जालसाजी का मामला सिर्फ नैतिक मूल्यों के पतन का मामला नहीं है यह एक बहुत बड़ी आर्थिक, सामाजिक समस्या की ओर इशारा करता है। दरअसल धन कमाने को ही समृद्धि और सफलता का पर्याय मान लेने वाले हम भारतीय और हमारे जैसे अन्य विकासशील देशों का यह दुर्भाग्य है कि वर्तमान उपभोक्तावादी संस्कृति इसी मान्यता को बढ़ावा देने में ही पूरी शक्ति लगा रही है, इसमें साधन चाहे जो भी हो, उद्देश्य पैसा कमाना ही होता है। हमारे देश में भी अब इस बात को ही प्रमुखता से प्रचारित- प्रसारित किया जा रहा है कि जो व्यक्ति जितना ज्यादा अमीर है उतना ही सफल है। हमारी शिक्षा व्यवस्था भी आजकल उसी दिशा की ओर बढ़ रही है। युवा पीढ़ी का उद्देश्य पढ़- लिख कर अधिक धन कमाना भर रह गया है। शिक्षा का मतलब बुद्धि का विकास या ज्ञान प्राप्त करना उनके लिए दकियानुसी बाते हैं।
कुल मिलाकर आज हम एक ऐसे आधुनिक समाज का निर्माण कर रहे हैं जहां भारतीय मूल्य पैसे की चमक के नीचे दबते चले जा रहे हैं। जब अधिक धनी होना ही समाज में प्रतिष्ठा का कारक माना जाएगा तो राजू जैसे व्यक्ति ही पैदा होंगे। अधिक धन कमाना और सफलता की ऊंचाईयों को पाना, दोनों को जब एक ही तराजू पर तौला जाएगा तो हम समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भला किस तरह से निभा पाएंगे।
व्यवसायिक प्रतिष्ठान या कंपनियां पूंजी से चलती हैं और पूंजी शेयर धारकों की होती हैं, अतएव कंपनी के संचालकों का धर्म हे कि धारकों की अमानत में खयानत न करें।
- रत्ना वर्मा

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