January 19, 2009

लघुकथाएं/ आलोक सातपुते

                                                          थप्पड़



उस बस स्टैण्ड में तीन दयालु व्यक्ति, और एक कहीं से भी दयालु नहीं लगने वाला व्यक्ति बैठा था। इतने में एक बुढिय़ा अपने दोनों बेटों के विक्षिप्त होने के कारण दाने-दाने को मोहताज होने की जानकारी देते हुए रोने लगी। इस पर पहले दयालु ने कहा- 'तुम लोग भूखे मर रहे हो इसका यह अर्थ है कि, राज्य नीति-निर्देशक तत्वों का पालन नहीं कर रहा है, मैं इस बात को विधानसभा और लोकसभा तक ले जाऊंगा।'

दूसरे दयालु ने कहा - 'ये तुम्हारे गांव वालों के लिए शर्म की बात है कि उनके होते हुए एक परिवार भूख से मर रहा है।'

तीसरे दयालु ने कहा -'माई अब रोना-धोना बंद करो। मैं बड़ा ही भावुक किस्म का आदमी हूं। तुम्हें रोता देखकर मुझे भी रोना आ रहा है।'

चौथा व्यक्ति निस्पृह भाव से उनकी बातें सुनता रहा, और फिर उठकर वहां से चला गया। इस पर दयालु ने कहा- देखो तो, लोग एक शब्द सांत्वना के भी नहीं बोल सकते।

कुछ देर बाद वह व्यक्ति एक थैले में दस किलो चांवल लेकर आया, और बड़ी ही खामोशी से उस बुढिय़ा को थैला सौंप दिया। अचानक तीनों दयालुओं का हाथ अपने-अपने गालों तक पहुंच गया। उन्हें ऐसा लगा, जैसे किसी ने उन्हें झन्नाटेदार थप्पड़ रसीद कर दिया हो।
............

                                                       सार्थक चर्चा


रेलवे प्लेटफार्म में एक सीट पर दो अपरिचित व्यक्ति बैठे

हुए हैं। टे्रन आने में कुछ समय है। उनके बीच

औपचारिक बातचीत का सिलसिला प्रारंभ होता है।

पहला - आप कहां सर्विस करते हैं?

दूसरा- जी मंत्रालय में... शिक्षा मंत्री के यहां।

पहला- अरे वाह। आप तो बड़े काम के आदमी हैं। मैं

शासकीय कालेज में हिन्दी विभाग का अध्यक्ष हूं ...

रमाकान्त (दुबे गर्व से)

दूसरा- जी मैं मंत्रालय में निहायत ही मामूली पद पर हूं।

मेरी पहचान एक लेखक के रूप में ही अधिक है।

पहला- किस तरह का लेखन करते हैं आप? मतलब

किस वाद से या विचारधारा से जुड़े हुए हैं?

दूसरा- जी मैं सार्थक लेखन में यकीन करता हूं।

पहला- मैं भी सार्थक चर्चा में यकीन करता हूं। वैसे आपका नाम क्या है?

दूसरा-जी अशोक।

पहला- अशोक और आगे?

दूसरा-अशोर घोरपड़े।

पहला- क्या गिर पड़े?

दूसरा- जी नहीं, घोरपड़े, जीएचओआर...

पहला- अच्छा-अच्छा ठीक है। वैसे आप हैं कहां से?

दूसरा-जी महाराष्ट्र से।

पहला- महाराष्ट्र में तो कई जातियां होती हैं...

आप ?

दूसरा-मेरी जाति का नाम आपकी समझ में नहीं आएगा।

पहला- खैर, कोई बात नहीं... आप एससी, एसटी,

ओबीसी या अन्य किस में आते हैं?

दूसरा- जी एसी में।

पहला (व्यंग्य में)- अच्छा तो आप एससी में आते है...।

(इतने में टे्रन आ जाती है)

पहला (चलते-चलते) - अच्छी सार्थक चर्चा हुई हमारे

बीच। वैसे मंत्रालय में जब भी सेटिंग की जरूरत

पड़ेगी, मै आपको कष्ट दूंगा।

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लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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