October 14, 2019

आलेख


गाँधी जी के आदर्श और विश्व शांति      
- श्रीमन्नारायण अग्रवाल
अपने विश्वभ्रमण में मैंने देखा कि यूरोप के कई देशों में एक और तो पिछले महायुद्ध के घावों को भरने को कोशिश की जा रही है- टूटी  इमारतों की मरम्मत चल रही है और निराश्रितों को फिर बसाया जा रहा है , दूसरी और यह दृश्य भी देखा कि तीसरे महायुद्ध की तैयारियाँ गंभीरतापूर्वक और तेजी से चल रही हैं। इस तरह के दयनीय व करुणाजनक चित्र विशेषकर जर्मनी, आस्ट्रिया, इटली, ग्रीस और टर्की में देखने को मिले। यह स्पष्ट है कि हर एक देश की आम जनता युद्ध नहीं चाहती। युद्ध के भयानक परिणामों को वे अच्छी तरह जानते हैं और समझते हैं कि तीसरे महायुद्ध का नतीजा संसार का प्रलय ही होगा ; लेकिन अमरीका और रूस की तनातनी के वातावरण में अन्य देशों के लिए अछूता बना रहना करीब- करीब नामुमकिन हो गया हैं। अमरीका की जनता कहती हैं कि रूस महायुद्ध शुरू करना चाहता है और दुनियाभर में साम्यवाद फैलाने की कोशिश कर रहा है। रूस के नेताओं का आरोप हैं कि अमरीका व अन्य पूँजीवादी राष्ट्र रूस को नष्ट कर डालने पर तुले हुए हैं और साम्यवाद को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहते हैं। इस प्रकार पारस्परिक अविश्वास और घृणा के कारण दिन-दिन राजनैतिक संघर्ष और मनमुटाव बढ़ता चला जा रहा हैं  और लड़ाई के बादल चारों और से आसमान में घिरते आ रहे हैं। यह काले भयानक बादल किस दिन फटकर बरसने लगेंगे और दुनिया में प्रलय मचा देंगे, कौन जाने ? किन्तु यह तो साफ नजर आता है कि अगर एक महायुद्ध फिर शुरू हो गया तो इस बार मनुष्य मात्र की खैर नहीं हैं।

इस निराशापूर्ण वातावरण में करीब सभी देशों में कई संस्थाएँ विश्वशांति के लिए दिन -रात लगन से काम कर रही हैं । क्वेकर सम्प्रदाय अमरीका व यूरोप में प्रशंसनीय कार्य कर रहा हैं । वे लड़ाई में भरती होने से इन्कार करते हैं और सब तरह की यातनाएँ सहते हैं।
'वार रजिस्टर्सइन्टरनेशनलसंस्था के सदस्य भी यूरोप में महत्त्वपूर्ण प्रयत्न कर रहे हैं कि संसार में युद्ध न हो, विश्व-शांति स्थापित हो । नैतिक शस्त्रीकरण का आंदोलन भी काफी सफलतापूर्वक कई देशों के बीच मैत्रीभाव पैदा करने की भरसक कोशिश कर रहा हैं  यूनो और यूनेस्को' तो स्थापित ही इसलिए किए गए हैं कि दुनिया में' लड़ाई-झगड़े न हों और सारे संघर्ष शांतिपूर्वक ढंग से सुलझाए जा सकें। और भी कई ऐसी संस्थाएँ हैं जो ऐसे ही आदर्श अपने सामने रखती हैं और श्रद्धापूर्वक इस कठिन कार्य को पूरा करने में व्यस्त हैं।
 किन्तु प्रश्न यह उठता है कि क्या इसी तरह कार्य करने से तीसरा युद्ध टल सकेगा ? इस प्रश्न की चर्चा करने के लिए ही दिसम्बर के प्रथम सप्ताह में विश्व-शांति सम्मेलन का प्रारंभिक अधिवेशन शांति-निकेतन में हो रहा है और बाद में दिसम्बर के आखिरी सप्ताह में यही सम्मेलन सेवाग्राम में होगा। इस सम्मेलन में जो व्यक्ति पधार रहे हैं  इनमें से कई सज्जनों से मुझे अपनी यात्रा में मिलने का अवसर भी मिल चुका हैं । विश्व-शांति की स्थापना के बारे में महात्मा गाँधी के क्या विचार थे, इस सम्बन्ध में उनसे बातचीत हुई । दुनिया के शांति-सैनिकों को भारत से बड़ी-बड़ी आशाएँ हैं ; क्योंकि उनकी निगाह में भारत गाँधी की पुण्य-भूमि है, इसीलिए इतने देशों के प्रतिनिधि भारत में एकत्र हो रहे हैं शान्ति का मार्ग खोजने के लिए।
बापू के आदर्शों के अनुसार यह शांति मार्ग कौन-सा हैं? गाँधीजी किस प्रकार संसार में शांति स्थापित करने की आशा रखते थे ? वे जानते थे  कि केवल युद्ध में भरती न होने से युद्ध टाला नहीं जा सकता। जिस समय लड़ाई शुरू हो जाती हैं, उस वक्त उसे रोकना-थामना अशक्य हो जाता हैं। युद्ध को जड़ से नष्ट करने के लिए तो हमें समाज की आर्थिक व राजनैतिक रचना व संगठन ही बदलना होगा । बापू का विश्वास था कि अगर अहिंसा व प्रेम की बुनियाद पर विभिन्न देशों में एक तरह की नवीन समाज रचना खड़ी की जा सके, तो फिर युद्ध समूल नष्ट किया जा सकता हैं। इस अहिंसक समाज की नींव विकेन्द्रीकरण, प्रादेशिक स्वावलम्बन व जीवन की सादगी पर आधारित रह सकती है। केन्द्रीकरण,युद्ध को जन्म देता हैं। विकेन्द्रीकरण युद्ध के स्रोत को सुखा डालता हैं और शांति की गंगा को बहाने में  सफलता प्राप्त कर सकता हैं। इसीलिए गाँधीजी औद्योगिक विकेन्द्रीकरण, पर जोर देते थे और कहते थे कि खादी और ग्रामोद्योगों के द्वारा ही भारत शांतिपूर्वक स्वराज्य प्राप्त कर सकता हैं और अपनी स्वतन्त्रता को टिका सकता हँ। राजनैतिक क्षेत्र में भी केन्द्रीकरण के बजाय ग्राम-पंचायतों के व्यापक संगठन की आवश्यकता हैं। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में पारस्परिक व्यवसाय व लेन-देन कम-से-कम किया जाए, ताकि आर्थिक संघर्ष की नौबत न आए। हाँ, सांस्कृतिक क्षेत्र में आपसी सम्बन्ध घटाने की बजाय अधिक बढ़ाने का प्रयत्न करना हमारा धर्म हो जाता हैं। सामाजिक क्षेत्र में धर्म, जाति, वर्ग तथा अन्य किसी भी प्रकार का भेद-भाव संघर्ष का कारण बन जाता हैं। अमरीका में जिस तरह हब्शियों के प्रति बरताव किया जाता हैं, वह दुनिया की संस्कृति की शान के बिलकुल खिलाफ़ हैं। अगर उसमें समय पर सुधार न किया गया ,तो वही एक महायुद्ध का कारण बन सकता है। दक्षिण अफीका और आस्ट्रेलिया में भी काले-गोरे का जो भेद-भाव बढ़ रहा हैं, वह विश्व-शांति के लिए बहुत खतरनाक हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़ी सावधानी की आवश्यकता हँ। अगर ठीक तरह की तालीम न दी जाए, तो वह लड़ाई का सबब बन सकती है। यही वज़ह थी कि बापूजी बुनियादी शिक्षा पर इतना जोर देते थे।
इस तरह गाँधीजी के आदर्शों के अनुसार विश्वशांति की स्थापना अंहिसा की बुनियाद पर ही हो सकती हँ । आर्थिक क्षेत्र में अहिंसा का अर्थ हँ औद्योगिक विकेन्द्रीकरण, राजनैतिक क्षेत्र में अहिंसा का अर्थ है पंचायती विकेन्दित राज्य, सामाजिक संगठन की दृष्टि से अहिंसा का तात्पर्य हैं समानता व भेदभाव का उन्मूलन और शिक्षा-क्षेत्र में अहिंसा का मतलब है शारीरिक व बौद्धिक समतोल । इन सभी क्षेत्रों में अहिंसा के प्रयोग करने पर ही शांति की स्थापना में सफलता मिल सकती हँ। युद्ध के कारणों को अगर समूल न उखाड़ फेंका गया तो सारी कोशिशें अकारथ जाएँगी और किसी-न-किसी रूप में फिर महायुद्ध अपने सिर को उठाए बिना न रहेगा।
अब सवाल यह हैं कि अहिंसक समाज किस तरह स्थापित किया जाए? किस प्रकार औद्योगिक विकेन्द्रीकरण व पंचायती राज्यों को कायम किया जाए? यह कार्य आसान नहीं हैं। इस कार्य को पूरा करने के लिए हमें निरंतर जो तोड़कर मेहनत करनी होगी। अपने व्यक्तिगत जीवन को अहिंसक बनाने का सतत प्रयत्न करना होगा। हमें यह बराबर धयान रखना होगा कि हम अपने स्वार्थ के लिए किसी दूसरे व्यक्ति , समाज या देश का अनुचित शोषण तो नहीं कर रहे हैं? इसके लिए हमें शारीरिक श्रम का महत्त्व बढ़ाना चाहिए। आज समाज में एक ऐसा वर्ग है, जो श्रम करता हैं और दूसरा ऐसा वर्ग है, जो दूसरों के श्रम को भोगता हैं। इसी तरह अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में कुछ ऐसे देश हैं, जो गुलाम बनाए जाते हैं और उनके नागरिकों की मेहनत का फायदा दूसरे देश अपने ऐश व आराम के लिए उठाते हैं। यह सर्वथा अनुचित है; क्योंकि उसमें हिंसा भरी हुई हैं। अहिंसक समाज को बनाने के लिए उक्त प्रकार का शोषण बन्द होना नितान्त आवश्यक हँ। जीवन में सादगी लाए बिना और श्रम की प्रतिष्ठा बढ़ाए बिना यह संभव नहीं है।
हम यह आशा नहीं रख सकते कि किसी भी देश की सरकार अहिंसक समाज की रचना को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेगी और स्वयं उस और तेजी व लगन से कदम उठाएगी। भारत में भी हम यह उम्मीद नहीं रख सकते। इसलिए यह भी जरूरी हैं कि जिन लोगों को अहिंसा में विश्वास है, वे कुछ गाँवों को लेकर अहिंसक समाज के संगठन का प्रयत्न करें।  इस तरह के प्रयोग कई देशों में हो भी रहे हैं। अमरीका, इंगलैड व यूरोप के कुछ देशों में, विशेषकर स्वीटजरलै'ड में, इस तरह की कई कॉलोनी स्थापित की गई है, जहाँ शोषण को स्थान नहीं हैं और हरेक व्यथित समाज के सुख व प्रगति के लिए परिश्रम करता हैं। अगर इस तरह की अहिंसक कॉलोनी सफलता-पूर्वक चलाई जाए,तो उनका प्रभाव विभिन्न देशों की जनता व सरकारों पर पड़े बिना न रहेगा और धीरे-धीरे संसार में शांति व सहयोग का वातावरण बनने की संभावना स्पष्ट दीख पड़ेगी।
 अहिंसक समाज अपना रक्षण किस तरह करेगा, यह प्रश्न भी सहज ही उठता हैं। इस सवाल का जवाब सचमुच बहुत कठिन हैं। महात्मा गाँधी ने सुझाया था कि सशस्त्र सेना को धीरे-धीरे हटाने के लिए शांति-सेना (peace brigades ) कायम करनी चाहिए। यह शान्ति-सेना सिर्फ युद्ध के समय ही काम न करेगीबल्कि दिन-प्रतिदिन अहिंसक समाज को रचना में रचनात्मक कार्य करते हुए पूरा हिस्सा लेगी। लड़ाई के वक्त इस सेना के अहिंसक सिपाही अपना बलिदान करने को तैयार रहेंगे  युद्ध की आग को रोकने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देंगे। यह काम आसान नहीं हैं; किन्तु मेरा निश्चित मत हैं कि शान्ति-सेना का संगठन किये बिना मिलिटरी को हटाने की सिफारिश करना अशक्य हैं। मुझे आशा हैं कि विश्व-शान्ति-परिषद इस सम्बन्ध में गंभीरता से विचार करेगी और कुछ व्यावहारिक मार्ग खोज निकालेगी।
(मासिक पत्रिका- जीवन साहित्य, वर्ष-11, अंक 1-2, जनवरी-फरवरी 1950 में प्रकाशित- पत्रिका का यह अंक विश्व शांति सम्मेलन पर केन्द्रित था, जो शांति निकेतन और सेवाग्राम में सम्पन्न हुआ था)

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