July 14, 2019

अनकही

क्यों नहीं बदली गाँव की तस्वीर 
डॉ. रत्ना वर्मा
       गाँव की जो तस्वीर अब तक मेरे मन में है, उसमें मैं अपने गाँव को याद करती हूँ, तो एक खुशहाल गाँव की जो तस्वीर उभरती है, वह कुछ इस तरह है -खपरैल वाले कच्चे गोबर से लिपे साफ सुथरे घर, कच्ची सड़कें, कंधे पर हल थामे खेतों की ओर जाते किसान। बैलगाडिय़ों की रुनझुन करती आवाज़ लहलहाते धान के खेत, खेतों में काम करती हुई लोकगीत गाती महिलाएँ। घरों में ढेकी, जाता में अनाज कूटती, पीसती महिलाएँ। तालाब, कुएँ, गाय, बैल, तीज त्योहार, मेले मढ़ई और हँसते मुस्कराते परिवार के साथ जि़न्दगी बिताते लोग। एक गाँव में हर तरह के काम करने वाले होग होते थे, उन्हें जीवन की ज़रूरत पूरा करने के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता ही नहीं होती थी। हर काम के लिए अलग अलग कारीगर -बुनकर कपड़ा बनाते थे, बढ़ई लकड़ी के सामान, चर्मकार जूते, लुहार लोहे के औजार, कुम्हार मिट्टी के र्बतन, बहुत लम्बी लिस्ट है ऐसे दृश्यों की।
अब आज की बात करें, तो  ऊपर जो भी लिखा है, उनमें से एक भी चीज़ आज के गाँव में दिखाई नहीं देती। टेक्नोलॉजी के इस युग में यह सब दिखाई भी नहीं देगा। किसानों की बात करें तो अनाज बोआई से लेकर कटाई और कूटने- पीसने तक सब कामों में मशीनीकरण हो गया है। यानी हाथ से किए जाने वाले सभी काम मशीन से होने लगे हैं। काम भले जल्दी हो रहे हैं, पर आदमी के हाथ खाली हैं। छोटा किसान किसी तरह आपने खाने के लिए अनाज उगा रहा है और यदि कभी अधिक पैदावर की आस में कर्ज लेकर आगे बढऩे की कोशिश करता है, तो असफल होता है। फलस्वरूप आज किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हो रहे हैं। यह स्थिति हमारे देश के लिए सबसे शर्मनाक है। अन्न पैदावर में अव्वल रहने वाले देश के किसान मरने को मजबूर हैं। सरकार यदि इसे गंभीरता से नहीं लेती, तो उनसे और क्या उम्मीद करें...
किसानों के साथ साथ गाँव के अन्य रोजगार भी समाप्त हो चुके हैं। न बुनकर हैं, न बढ़ई, न लुहार, न कुम्हार, न चर्मकार। परिणाम यह है कि लोग काम की तलाश में शहरों की ओर भाग चुके हैं। पलायन का यह सिलसिला आज भी जारी ही है। कुछ ऐसे भी गाँव मिल जाएँगे, जहाँ केवल बूढ़े बचे हैं, कहीं वे भी नहीं। गाँव में शिक्षा के स्तर को भी बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता। जब शहरों में पढऩे वाले बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर बेहतर नौकरी पा सकते हैं, तो फिर गाँव के बच्चे वहाँ तक क्यों नहीं पहुँच पाते। क्या इसके लिए हमारी शिक्षा व्यवस्था जिम्मेदार नहीं है? ग्रामीण और शहरी भारत के बीच बढ़ती दूरी ने दोनों के बीच एक बड़ी खाई बना दी है। देखने में यह आया है कि गाँव में रहने वाले सम्पन्न परिवार अच्छी शिक्षा के लिए अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए शहर भेज देते हैं, उनके बच्चे उच्च शिक्षा तो प्राप्त कर लेते हैं, फिर अपने गाँव को भूल जाते हैं; क्योंकि उनके लिए गाँव में कुछ करने को होता नहीं। अफसोस! हम ऐसे अवसर पैदा ही नहीं कर पाए कि गाँव का पढ़ा-लिखा बच्चा गाँव में रहते हुए अपने गाँव की तस्वीर सुधारने की दिशा में कुछ सोचे।
1991 के उदारीकरण के बाद ग्रामीण और शहरी भारत के बीच बड़े पैमाने पर एक असंतुलन पैदा हुआ है। उदारीकरण के बाद नौकरियों के जो अवसर उपलब्ध कराए गए, उसका फायदा ग्रामीण भारत को नहीं मिला, जिसका एक मुख्य कारण हमारी शिक्षा व्यवस्था ही है। आँकड़ें बताते हैं कि आईटी सेक्टर में गाँव से पढ़ाई करके निकले बहुत कम युवा कार्यरत है, क्योंकि खऱाब शिक्षा व्यवस्था के कारण उनके पास पर्याप्त स्किल नहीं है, जबकि शहरों से पढ़कर निकले छात्रों ने आईटी क्षेत्र में हुई क्रांति का भरपूर फायदा उठाया और वे गाँव के छात्रों से बहुत आगे निकल गए। यदि इस समस्या की ओर आरम्भ से ही ध्यान दिया जाता तो आज शहर और गाँव के बीच बढ़ती यह खाई  कम हो गई होती, जिसे हम आजादी के इतने बरसों बाद भी नहीं कर पाए।
दरअसल सरकारी स्कूल और निजी स्कूलों में पढ़ाई के तरीकों में भेदभाव, शिक्षकों की कमी, सुविधाओं का अभाव तथा उनके पढ़ाने के तरीकों में अंतर ने दोनों के बीच बहुत बड़ा पहाड़ खड़ा कर दिया है। अत: जब तक शिक्षा के स्तर में सुधार नहीं होगा, हम तब तक किसी बदलाव की उम्मीद नहीं कर सकते। शिक्षा में सुधार के साथ- साथ गाँव में बिजली पानी, सड़क, परिवहन के साधन, रोजगार व अन्य दैनिक जीवन की सुविधाएँ उपलब्ध हों, तो क्यों कोई अपने गाँव का घर छोड़कर जाना चाहेगा। आगे बढऩे की चाह हर इंसान में होती है। जब देश के प्रत्येक गाँव का हर व्यक्ति सुखी व सम्पन्न होगा, तभी तो हम खुशहाल देश के खुशहाल नागरिक कहलाएँगे।
अमीरी और गरीबी की खाई जिस तरह बढ़ती चली जा रही है, उसी तरह गाँव और शहर के बीच भी दूरी बढ़ती जा रही है, इसे पाटना आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है। गाँधी जी के ग्राम स्वराज की बातें आज भाषणों और किताबों में छापने के लिए रह गईं हैं, इसे धरातल पर लागू करने के बारे में कोई नहीं सोच रहा है। राजनीति में भी ग्रामीण विकास की बात सिर्फ वोट बटोरने तक सीमित है। हमारे देश के कर्ता-धर्ता जब तक इस जमीनी हकीकत से रूबरू नहीं होंगे, तब तक गाँव की तस्वीर बदलने की बात करना खय़ाली पुलाव पकाने की तरह ही होगा। रोजग़ार को गाँव तक लाएँगे, तो पलायन भी रुकेगा और शहरों में बढ़ती भीड़ का दबाव भी कम होगा। बड़े शहरों को आवास, पानी, बिजली के अभाव की नारकीय स्थिति से बचाने के लिए यह करना ही होगा।

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