September 18, 2016

डायरी लेखन

समय और तिथि से परे...

जीवन की संवेदनशील आवेगमयी सघन अनुभूतियों का दैनंदिन साहित्यिक अभिलेखी करण डायरी है, इसमें दिन/तिथि/माह/वर्ष और समय का उल्लेख  प्रामाणिकता से अधिक स्मृतियों की संभावी व्याख्या में सहायता  के लिए होता है। प्राय: घरेलू हिसाब-किताब की डायरी का प्रयोग हमारे दैनंदिन आय-व्यय, वैयक्तिक लेन-देन, किसी भेंट और आवागमन की स्मृति के लिए होता है। जहाँ सामान्य डायरी इन भौतिक स्थितियों का उद्घाटन करती है/ स्मरण कराती है, वहीं साहित्यिक डायरी हमारे भीतर के संवेदन का उद्घाटन करती है। इस डायरी को किसी अनुभूत सत्य को समय और तिथि के साथ जीने की कला भी कहा जा सकता है। इसे लिखते हुए अरस्तू के विरेचन (कैथार्सिस) की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। डायरी को यदि  विरेचन के सिद्धांत की व्यावहारिक व्याख्या कहा जाए तो भी गलत न होगा। संस्मरण से अधिक ईमानदारी की दरकार डायरी में होती है। एक बहुत अच्छी डायरी समय और तिथि आदि से कभी भी बँधी नहीं रहती है। वह इन्हें भावों और विचारों के उड़ान भरने और उतरने के समय के अलावा कभी भी और कहीं भी किनारे कर सकती है।
       डायरी  के लिए कोशों में कैलेंडर, जंत्री, दैनिकी, रोजनामचा, दैनंदिनी, दिनचर्या पत्रिका, दैनिक विवरणिका, दैनिक वृत्त की पुस्तिका, पाकेट बुक, ब्राडकास्ट, दिनपत्रिका, तिथि-पत्रक और दैनिक वृत्त की पुस्तक आदि शब्द भी मिलते हैं जो सभी यही दर्शाते हैं कि हमारे दैनिक जीवन की घटनाओं और ब्योरों के लिपिबद्धीकरण का नाम डायरी है; लेकिन इन सबमें सूचनापरकता का शुष्कता बोध है, जिनसे साहित्यिक डायरी का बोध नहीं होता। जब यही डायरी अपनी सूचनात्मक शैली को त्यागते हुए जीवन में घटित -अघटित का वस्तु से व्यक्तिनिष्ठ होकर वर्णन करती है,  अपनी भाषा- शैली में सरस हो जाती है और कथ्य में भावों का तीव्र आलोडन- विलोडन होता है तो यही डायरी साहित्यिक हो जाती है।
     साहित्यिक डायरी सूचना से संवेदना की ओर प्रस्थान करती है जबकि अन्य डायरियाँ संवेदना से सूचना की ओर यात्रा करती हैं।
डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर
(प्रोफेसर (हिंदी) एवं संपादक 'इंदु संचेतना’ कुआंगतोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालयकुआंगचौकुआंगतोंग प्रांतचीन)

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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