September 18, 2016

पुरातन

लव-कुश की जन्म स्थली

तुरतुरिया

छत्तीसगढ़ अपनी पुरातात्तिक सम्पदा के कारण आज भारत ही नही विश्व में भी अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। यहाँ के १५००० गाँवों में से १००० ग्रामों में कहींीं न कहीं प्राचीन इतिहास के साक्ष्य आज भी विध्यमान हैं, जो कि छत्तीसगढ़ के लिये एक गौरव की बात है।
इसी प्रकार का एक प्राकृतिक एवं धार्मिक स्थल रायपुर जिला से ८४ किमी एवं बलौदाबाजार जिला से २९ किमी दूर कसडोल तहसील से १२ किमी दूर प.ह.न. ४ बोरसी से ५ किमी दूर और सिरपुर से २३ किमी की दूरी पर स्थित है जिसे तुरतुरिया के नाम से जाना जाता है। उक्त स्थल को सुरसुरी गंगा के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थल प्राकृतिक दृश्यों से भरा हुआ एक मनोरम स्थान है जो कि पहाडिय़ों से घिरा हुआ है। इसके समीप ही बारनवापारा अभ्यारण भी स्थित है।
तुरतुरिया बहरिया नामक गाँव के समीप बलभद्री नाले पर स्थित है। जनश्रुति है कि त्रेतायुग मे महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यही पर था और लवकुश का जन्मस्थली यही है।
इस स्थल का नाम तुरतुरिया पडऩे का कारण यह है कि बलभद्री नाले का जलप्रवाह चट्टानों के माध्यम से होकर निकलता है तो उसमे से उठने वाले बुलबुलों के कारण तुरतुर की ध्वनि निकलती है। (छत्तीसगढ़ी में कहते है तुरतुर- तुरतुर पानी बोहावत हे) जिसके कारण उसे तुरतुरिया नाम दिया गया है। इसका जलप्रवाह एक लम्बी संकरी सुरंग से होता हुआ आगे जाकर एक जलकुंड मे गिरता है जिसका निर्माण प्राचीन ईटों से हुआ है। जिस स्थान पर कुंड मे यह जल गिरता है वहाँ पर एक गाय
का मुख बना दिया गया है जिसके कारण जल उसके मुख से गिरता हुआ दृष्टिगोचर होता है। गोमुख के दोनों ओर दो प्राचीन प्रस्तर की विष्णु जी की प्रतिमाएँ स्थापित हैं । इनमें से एक प्रतिमा खड़ी हुई स्थिति मे है तथा दूसरी प्रतिमा मे विष्णुजी को शेषनाग पर बैठे हुए दिखाया गया है। कुंड के समीप ही दो वीरों की प्राचीन पाषाण प्रतिमाएँ बनी हुई है,जिनमे क्रमश: एक वीर एक सिंह को तलवार से मारते हुए प्रदर्शित किया गया है तथा दूसरी प्रतिमा मे एक अन्य वीर को एक जानवर की गर्दन मरोड़ते हुए दिखाया गया है। इस स्थान पर शिवलिंग काफी संख्या में पाए गए है।  इसके अतिरिक्त प्राचीन पाषाण स्तंभ भी सर्वत्र बिखरे पड़े हैं, जिनमें कलात्मक खुदाई कि गई है। इसके अतिरिक्त कुछ शिलालेख भी एवं कुछ प्राचीन बुद्ध की प्रतिमाएँ भी यहाँ स्थापित है। यहाँ  भग्न मंदिरों के अवशेष भी मिलते हैं। इस स्थल पर बौद्ध, वैष्णव तथा शैव धर्म से सम्बन्धित मूर्तियों का पाया जाना भी इस तथ्य को बल देता है कि यहाँ कभी इन तीनों सम्प्रदायो की मिलीजुली संस्कृति रही होगी। ऐसा माना जाता है कि यहाँ बौद्ध विहार थे जिनमे बौद्ध भिक्षुणियों का निवास था। सिरपुर के समीप होने के कारण इस बात को अधिक बल मिलता है कि यह स्थल कभी बौद्ध संस्कृति का केन्द्र रहा होगा। यहाँ से प्राप्त शिलालेखों की लिपि से ऐसा अनुमान लगाया गया है कि यहाँ से प्राप्त प्रतिमाओं का समय ८-९ वी शताब्दी है। आज भी यहाँ स्त्री पुजारिनों की नियुक्ति होती है, जो कि प्राचीन काल से चली आ रही परम्परा है। पूष माह में यहाँ तीन दिवसीय मेला लगता है तथा बड़ी संख्या मे श्रद्धालु आते है। धार्मिक एवं पुरातात्त्विक स्थल होने के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी यह स्थल पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष