September 10, 2011

वे हंसना सीख रहें हैं!


खुश और सेहतमंद रहने के लिए किसी विज्ञान की जरूरत नहीं होती, बस हंसना ही काफी होता है। हंसी मजाक को जर्मनी के साथ जोड़ कर कभी नहीं देखा जाता। जर्मन लोगों को बेहद संजीदा और कम बोलने वाला माना जाता है। जर्मन मेहनती होते हैं, मजाकिया नहीं।

क्या हंसना सिखाया भी जा सकता है? जी हां, जर्मन कम्पनियां खास तौर से अपने कर्मचारियों को ऐसी ट्रेनिंग में हिस्सा लेने के लिए भेज रही हैं जहां वे हंसना सीख सकें और काम के समय मजाक कर पाएं।
खुश और सेहतमंद रहने के लिए किसी विज्ञान की जरूरत नहीं होती, बस हंसना ही काफी होता है। हंसी मजाक को जर्मनी के साथ जोड़ कर कभी नहीं देखा जाता। जर्मन लोगों को बेहद संजीदा और कम बोलने वाला माना जाता है। जर्मन मेहनती होते हैं, मजाकिया नहीं। वे अपने काम को लेकर इतने दीवाने होते हैं कि काम के समय केवल काम ही करते हैं।
लेकिन लाइपजिग शहर के एक होटल के कांफें्रस हॉल में जर्मन हंसना सीख रहे हैं। यहां एक ट्रेनिंग चल रही है, जहां लोगों को हंसना सिखाया जा रहा है। ट्रेनर एफा उल्मन कातरिन हांसमायर के साथ मिल कर ट्रेनिंग के लिए आए लोगों के काम का मजाक उड़ाती हैं और उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। ट्रेनिंग के बारे में एफा बताती हैं, 'हम यहां ट्रेनर या टीचर की तरह नहीं, बल्कि दो मसखरों की तरह खड़े होते हैं। हम लोगों से बातें करते हैं, उन्हें प्रोत्साहित करते हैं और उन्हें आइना दिखाते हैं।'
अब समझ आया
आइना देखने के लिए 17 लोग देश के अलग- अलग कोनों से आए हैं। हैम्बर्ग, बर्लिन और बॉन जैसे शहरों से आए लोगों में कोई डॉक्टर है, कोई मैनेजर तो कोई टीचर। जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमर इस विचारधारा को बदल देना चाहता है कि जर्मन हंसना नहीं जानते। जर्मन कंपनियों को यह समझ में आ गया है कि यदि काम के समय माहौल अच्छा हो और लोग आपस में हंस खेल लें तो इससे काम बेहतर तरीके से हो सकता है। लोग तनाव से भी आसानी से निपट पाते हैं।
रोजविथा राम डेफरींट यहां ट्रेनिंग के लिए आई हैं। वह बताती हैं, 'मैं बहुत हंसमुख इंसान हूं। मेरी पहली शादी इंग्लैंड में हुई। वहां के लोग बेहद हाजिरजवाब होते हैं, वे शब्दों के साथ खेलते हैं। मुझे यह देख कर बहुत अच्छा लगा और बुरा भी कि जर्मनी में कितने कम लोग हैं जो इस तरह से बात करते हों। अब जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमर की मदद से जर्मनी में भी लोग खुल रहे हैं।'
कार्निवल पर तो हंसते हैं
एफा उल्मन ने 2005 में इस इंस्टीट्यूट को बनाया। पिछले छह साल से वह लोगों को हंसना सिखा रही हैं। वह भी रोजविथा की बात से सहमत हैं, 'ऐसा नहीं है कि जर्मन लोगों को हंसना नहीं आता, लेकिन काम करते समय वे नहीं हंसते। यदि आप उन्हें फुर्सत में मिलेंगे, जैसे कि कार्निवल के समय, वहां तो लोग एक दूसरे के साथ मिल कर खूब हंसना पसंद करते हैं। मेरा ख्याल है कि अब लोगों का ध्यान इस तरफ जा रहा है, क्योंकि कई लोग कहते हैं- मैं अपने दफ्तर में भी मस्ती- मजाक करना चाहता हूं, वह भी इस तरह से कि मेरे काम पर बुरा असर ना पड़े।'
60 वर्षीय हौर्सट गोएलडर बॉन की एक कंपनी में टीम लीडर हैं। वह भी यहां हंसना सीखने आए हैं। अपने अनुभव के बारे में वह कहते हैं, 'मुझे यहां बहुत कुछ सीखने को मिला। यहां इस ग्रुप के साथ काम करने में बहुत मजा आया। इस कमरे में मौजूद सभी लोगों के पास इतने अलग- अलग किस्म के आइडिया हैं। इस तरह के माहौल में चीजें मैनेज करने के कई नए ख्याल आपके दिमाग में आते हैं।

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष