July 12, 2011

लघुकथाएँ

दुआ

वह दफ्तर में था। शहर में दंगा हो गया है, यह खबर ढाई बजे मिली। वह भागा और जिन्दगी में पहली बार शाम का अखबार खरीद लिया। दंगा उसी इलाके में हुआ था, जहाँ उसका घर था। यह जानते हुए भी कि उसके पास पैसे नहीं हैं, वह स्कूटर रिक्शा में बैठ गया। पिछली बार वह स्कूटर में कब बैठा था, उसे याद नहीं। वह हमेशा बस में सफर करता है।
दफ्तर पहुँचने में देर हो रही हो या कोई कितना भी जरूरी काम हो, न तो उसे उस बस की प्रतीक्षा से ऊब ही होती है और न लाइन तोडऩे में जिन्दगी का कोई आदर्श टूटता नजर आता है। यानी तब वह सोचता नहीं था और आज उसके पास सोचने की फुर्सत नहीं थी। वह घर पहुँचकर सबकी खैर- कुशल पाने को चिन्तित हो रहा था। बीवी तो घर पर ही होगी, लेकिन बच्चे स्कूल जाते हैं और इसी वक्त लौटते हैं। कहीं...वह सोचता जा रहा था।
स्कूटरवाले ने दंगाग्रस्त इलाके से कुछ इधर ही ब्रेक लगा दी, 'बस, इससे आगे नहीं जाऊँगा।'
'चलो, चलो यार, मैं जरा जल्दी में हूँ।'
'मुझे अपनी जान से कोई बैर नहीं है जी !' वह मीटर
देखकर बोला, 'पाँच रुपए सत्तर पैसे।'
'तुम्हें पैसों की पड़ी है और मेरी जान पर बनी हुई है।' वह जेब में हाथ डालकर बोला, 'सवारियों से बदतमीजी करते हो, तुम्हें शर्म आनी चाहिए...यह तो कोई तरीका नहीं।' वह गुस्साता हुआ उतरा और उतरते ही जेब में हाथ डाले- डाले, स्कूटरवाले की तरफ से आँख मूँदकर भागने लगा।
'ओए, तेरी तो...बे।' स्कूटरवाला कुछ देर तक उसके पीछे भागा, मगर उसे गोली की तरह दंगाग्रस्त इलाके में पहुँचता पाकर हाँफता हुआ खुद ही से बड़बड़ाने लगा, 'साला हिन्दू है तो मुसलमानों के हाथ लगे और मुसलमान है तो हिन्दुओं में जा फँसे!'
नींद

वे हो- हल्ला करते एक पुरानी हवेली में जा पहुँचे। हवेली के हाते में सभी घरों के दरवाजे बंद थे। सिर्फ एक कमरे का दरवाजा खुला था। सब दो- दो, तीन- तीन में बँटकर दरवाजे तोडऩे लगे और उनमें से दो जने उस खुले कमरे में घुस गए।
कमरे में एक ट्रांजिस्टर हौले- हौले बज रहा था और एक आदमी खाट पर सोया हुआ था।
'यह कौन है?' एक ने दूसरे से पूछा।
'मालूम नहीं,' दूसरा बोला, ''कभी दिखाई नहीं दिया मुहल्ले में।'
'कोई भी हो,' पहला ट्रांजिस्टर समेटता हुआ बोला, 'टीप दो गला!'
'अबे, कहीं अपनी जाति का न हो?'
'पूछ लेते हैं इसी से।' कहते- कहते उसने उसे जगा दिया।
'कौन हो तुम?'
वह आँखें मलता नींद में ही बोला, 'तुम कौन हो?'
'सवाल- जवाब मत करो। जल्दी बताओ वरना मारे जाओगे।'
'क्यों मारा जाऊँगा?'
'शहर में दंगा हो गया है।'
'क्यों.. कैसे?'
'मस्जिद में सूअर घुस आया।'
'तो नींद क्यों खराब करते हो भाई ! रात की पाली में कारखाने जाना है।' वह करवट लेकर फिर से सोता हुआ बोला, 'यहाँ क्या कर रहे हो?...जाकर सूअर को मारो न !'

लेखक के बारे में: 23 नवम्बर, 1950 जालन्धर (पंजाब) में जन्में स्वर्गीय श्री रमेश बतरा दीपशिखा, साहित्य निर्झर, सारिका, नवभारत टाइम्स और सन्डे मेल में सम्पादन से सम्बद्ध रहे। उन्होंने लघुकथा को सही दिशा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। नंग- मनंग, पीढिय़ों का खून, फाटक उनके कहानी संग्रह है। फखर जमान के उपन्यास 'बन्दीवानÓ का अनुवाद किया। 15 मार्च,1999 को दिल्ली में उनका असामयिक निधन हो गया।

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