July 12, 2011

नागरिक या प्रजा?

4-5 जून की रात में 1.30 बजे रामलीला मैदान में शांतिपूर्ण अनशन से निढाल थके- मांदे होने के कारण गहरी नींद में सोए हजारों निहत्थे स्त्री- पुरुषों और बच्चों पर केंद्रीय सरकार ने पांच हजार से अधिक पुलिस कर्मियों द्वारा अश्रुगैस के गोलों और लाठियों द्वारा हमला करवाकर अपना निर्दयी बर्बर चेहरा दिखा दिया। स्त्रियों और बच्चों को भी नहीं बख्शा। एक महिला श्रीमती राजबाला की तो पुलिस ने रीढ़ की हड्डी ही तोड़ दी जिससे गरदन के नीचे का उनका पूरा शरीर ही जीवन भर के लिए निष्क्रिय हो गया है। सत्ता से मदांध केंद्रीय सरकार के किसी मंत्री या प्रधानमंत्री ने अस्पताल में पड़े तड़पते आहत स्त्री पुरुषों को जाकर देखने की भी तकलीफ कई दिन तक नहीं की।
स्वतंत्र भारत में अभी तक की सबसे ज्यादा भ्रष्ट सरकार का तमगा पा चुका केंद्र सरकार की इस बर्बर कृत्य के लिए सभी देशवासियों ने निंदा की और कहा कि इससे जलियावाला बाग और 1975 के आपातकाल की याद आती है। इतना ही नहीं नींद में डूबे निहत्थे नागरिकों पर सरकार द्वारा इस नृशंस हमले के समाचारों को देख- पढ़कर सर्वोच्च न्यायालय ने स्वत: ही इस अक्षम्य अपराध का संज्ञान ले लिया और केंद्रीय गृह मंत्रालय तथा दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। मुकदमे की सुनवाई अगले महीने में होगी।
इस मामले का स्वत: ही संज्ञान लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने नागरिकों को स्पष्ट संदेश दिया है कि सरकार द्वारा नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचलने के कुकृत्यों को वह बर्दाश्त नहीं करेगा। यही कारण है कि आम नागरिक के मन में सर्वोच्च न्यायालय के प्रति अटूट विश्वास और श्रद्धा है।
आइए जरा इस बात पर भी ध्यान दे कि क्या कारण है कि गणतंत्र होने के बावजूद भी चाल- चरित्र और चेहरे में सरकारी मंत्री अधिकारी और कर्मचारी सामन्ती व्यवस्था में निष्ठा रखने का प्रमाण देते रहते हैं?
15 अगस्त 1947 को आजादी के नाम पर यूनियन जैक के स्थान पर तिरंगा झंडा लहराने लगा और अंग्रेज पदाधिकारी व सरकारी अधिकारी (जो थोड़ी संख्या में थे) चले गए। अधिकांश नियम कानून और कार्यप्रणाली ब्रिटिश राजवाली ही बनी रही। अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी भी पहले वाले ही बने रहे। पुलिस भी ब्रिटिश राज के कानून के तहत ही काम करती चली आ रही है। स्वतंत्रता के बाद जो टोपीधारी मंत्री बनकर सत्तासीन हुए उन्हें प्रशासनिक अनुभव नहीं था। अत: उन्हें भी प्रशासन के गुर उनके मातहत अधिकारियों द्वारा सिखाए गए। ब्रिटिश राज की शासन प्रणाली में भारतीय जनता नागरिक का दर्जा नहीं रखती थी बल्कि सिर्फ प्रजा होती थी। प्रजा के मौलिक अधिकार नहीं होते हैं। प्रजा का धर्म सदैव आज्ञाकारी बने हुए सरकार से दया की याचना करते रहना होता है। संगठित होकर अंदोलन करने से प्रजा दुश्मन बन जाती है जिसे सरकार सख्ती से दमनकारी हथियार (पुलिस) द्वारा कुचलती है।
आज भी मंत्री से लेकर संतरी तक प्रशासनिक व्यवस्था का प्रत्येक सदस्य सामन्तशाही मानसिकता से ग्रस्त है। सामन्तशाही प्रशासनिक व्यवस्था में प्रशासन का अर्थ होता है प्रजा का शोषण। प्रजा द्वारा मुंह खोलकर अपनी व्यथा व्यक्त करने को राजद्रोह मानना। सामन्तशाही प्रशासनिक व्यवस्था में पुलिस सिर्फ मंत्रियों और अधिकारियों की सुरक्षा के लिए एक घातक हथियार के रूप में संगठित की जाती है। जहां कहीं प्रजा सरकार के अत्याचार के खिलाफ मुंह खोलने की धृष्टता करती है तो मंत्री और अधिकारी भयभीत हो जाते हैं। ऐसे में भयभीत मंत्रियों और अधिकारियों को सुरक्षा का आश्वासन देने के कर्त्तव्य का पालन करते हुए सशस्त्र पुलिस निर्ममता से निरीह प्रजा, बच्चे, बूढ़े, स्त्री-पुरुष पर घातक प्रहार करके उनका मुंह बंद करने को तत्पर रहती है।
सरकार के भ्रष्टाचार और विदेशी बैंकों में जमा कालाधन के प्रति सरकारी निष्क्रियता के खिलाफ देशव्यापी जन आंदोलन से भयभीत मंत्रियों और अधिकारियों को सुरक्षा का आश्वासन देने के लिए दिल्ली पुलिस ने रामलीला मैदान में रात में सोते हुए बच्चों, स्त्रियों और पुरुषों की हड्डी- पसली तोडऩे का शौर्य दिखाया। ऐसे ही माहौल में फैज़ अहमद फैज़ ने कहा था -
'निसार मैं तेरी गलियों पे ऐ वतन,
कि जहां चली है रस्म कि कोई न सर उठाके चले
जो कोई चाहने वाला तवाफ को निकले
नज़र चुरा के चले जिस्मो जां बचा के चले। '
आवश्यकता है कि सरकार को मजबूर किया जाए कि 'सत्यमेव जयते' की तरह गणतंत्र भी सिर्फ कागजों पर छपे शब्दों तक ही सीमित न रह जाए बल्कि सरकारी प्रशासनिक व्यवस्था यथार्थ में गणतंत्र के अनुरूप हो जाए। गणतंत्र में सामन्ती मानसिकता के लिए कोई स्थान नहीं होता। गणतंत्र में सरकारी मंत्री और अधिकारी राजा नहीं होते और जनता प्रजा नहीं होती। गणतंत्र में सरकारी मंत्री और अधिकारी जनता की सेवा के लिए होते हैं। पुलिस भी जनता की सेवा के लिए होती है। स्पष्ट है कि इसके लिए वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन करना होगा। ऐसा आसानी से नहीं होगा। इसके लिए भी अन्ना हजारे जैसा एक अंदोलन चलाकर ही सफलता प्राप्त होगी।

- डॉ. रत्ना वर्मा

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