March 21, 2011

महिला- विशेष

बेटी की कमाई के हकदार?
- रेखा श्रीवास्तव
बेटे को आपने पढ़ाया तो उसकी कमाई पर आपका पूरा- पूरा हक बनाता है और बेटी को पढ़ाया तो उसकी कमाई पर आपका हक नहीं है। आखिर क्यों?
भारतीय समाज की सामाजिक व्यवस्था के अनुसार बेटी विदा होकर पति के घर ही जाती है। उसके माता- पिता उसके लालन- पालन शिक्षा- दीक्षा में उतना ही खर्च करते हैं जितने की लड़के की शिक्षा में।
शादी के बाद बेटी परायी हो जाती हैं- ये हमारी मानसिक अवधारणा है और बहू हमारी हो जाती है। हमारी आर्थिक सोच भी यही रहती है कि कमाने वाली बहू आएगी तो घर में दोहरी कमाई आएगी और उनका जीवन स्तर अच्छा रहेगा। होना भी ऐसा ही चाहिए और शायद माता- पिता बेटी को इसीलिए आत्मनिर्भर होने वाली शिक्षा दिलाने का प्रयास करते हैं। वे अपनी बेटी से कोई आशा भी नहीं रखते।
लेकिन कभी- कभी इस तरह के मिलने वाले तानें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देते है-
'तुम्हारे बेटा तो कोई है नहीं तो क्या बेटी के घर की रोटियां तोड़ोगी?'
'तुमने जीवन में कुछ सोचा ही नहीं, सारा कुछ घर के लिए लुटा दिया, अब बुढ़ापे में कौन तुमको पेंशन मिलनी है कि गुजारा कर लोगे।'
'मैं तो सोचता हूँ कि ऐसे लोगों का क्या होगा, जीवन भर भाग- भाग कर कमाया और बेटी को पढ़ाया अब कहाँ से शादी करेंगे और कैसे कटेगा इनका बुढ़ापा।'
इस तरह के बहुत सारे प्रश्न उठते हैं, जब चार लोग बैठ कर सामाजिकता पर बात करते हैं।
कुछ ऐसी ही एक कहानी सुनिए- मेहनतकश माता- पिता की एक बेटी थी। माता- पिता अपने पर ही ताना कसते कि कौन सा हमारे बेटा बैठा है जो हमें कमाकर खिलायेगा।
तब बेटी शादी का प्रस्ताव लाने वालों से पहला सवाल यही करती कि क्या मेरी शादी के बाद मैं अपनी कमाई से इतना पैसा माता- पिता को दे सकूंगी ताकि वे आराम से रह सकें ?
लड़के वालों के लिए यह एक अजीब सा प्रश्न होता और वे उसके निर्णय से सहमत नहीं होते क्योंकि उनके अनुसार तो शादी के बाद उसकी पूरी कमाई के हकदार लड़के वाले ही होते हैं न।
एक सवाल मैं उन सभी लोगों से पूछती हूँ कि अगर माता- पिता ने अपनी बेटी को इस काबिल बना दिया है कि वह कमा कर अपने पैरों पर खड़ी हो सके तो फिर शादी के बाद वह अपने माता- पिता का भरण पोषण का अधिकार क्यों नहीं रख सकती? ऐसे मामले में ससुराल वालों को आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए। आखिर जिस शिक्षा के बल पर वह आत्मनिर्भर बन पाई है वह उसके माता पिता ने ही उसे दिलाई है न? फिर उनके आर्थिक रूप से कमजोर होने पर या उनके बुढ़ापे में वह अपनी कमाई का हिस्सा माता- पिता को क्यों नहीं दे सकती?
बेटे को आपने पढ़ाया तो उसकी कमाई पर आपका पूरा- पूरा हक बनाता है और बेटी को पढ़ाया तो उसकी कमाई पर आपका हक नहीं है।
आखिर क्यों?
हम अपनी इस मानसिकता से कब मुक्त होंगे कि बेटी विवाह होने तक ही माता पिता की देखभाल कर सकती है और उसके बाद वह पराई हो जाती है।
मेरे बारे में ...
मैं आई आई टी, कानपूर में मशीन अनुवाद प्रोजेक्ट में कार्य कर रही हूँ। इस दिशा में हिंदी के लिए किये जा रहे प्रयासों से वर्षों से जुड़ी हूँ। लेखन मेरा सबसे प्रिय और पुरानी आदत है। आदर्श और सिद्धांत मुझे सबसे मूल्यवान लगते हैं, इनके साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता है। सच को लिखने में कलम संकोच नहीं करती।
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1 Comments:

At 28 March , Blogger दीपक 'मशाल' said...

samajik sandarbh me likhe gaye aapke aalekh kamaal ke hote hain..

 

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