March 21, 2011

आपके पत्र

दिल का दिल से लेन-देन
उदंती का मैं नियमित पाठक हूँ। प्रारंभ से ही उदंती का हर अंक अपने कलात्मक संपादन से जगमगाता रहता है। हार्दिक बधाई स्वीकार करें। फरवरी अंक में राधाकांत चतुर्वेदी जैसे रसिया कद्रदान ने उनकी अदा पर जो कसीदे काढ़े हैं उस पर चिरनिद्रा से भी जागकर गुलाबजान ने ठुमका लगाकर उन्हें शुक्रिया अदा किया होगा।
इसी अंक में अपर्णा त्रिपाठी ने 'फूल तुम्हें भेजा है खत में...' से एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय की दर्द भरी चर्चा की है। वास्तव में तो संगीत के क्षेत्र में जो महत्व और अनिवार्यता रियाज की होती है वही साहित्य के क्षेत्र में पत्र लेखन की होती है। साहित्यकारों के पत्र हीरे- जवाहरातों की तरह संजोए, संकलित और प्रकाशित किए जाते हैं और उत्कृष्ट साहित्य के रुप में सम्मानित होते हैं। नैपोलियन द्वारा जोसेफाइन को लिखे प्रेम पत्र विश्व के उच्चतम साहित्य की श्रेणी में आते हैं। इसी प्रकार हमारे यहां $गालिब, टैगोर और प्रेमचंद के पत्र साहित्य की अनमोल निधि हैं। दुख की बात ये है कि व्याकरण की भ्रूण हत्या करने वाली मोबाइल की एसएमएस भाषा और इंटरनेट ने पत्र लेखन को दकियानूसी प्रथा मानकर त्याग दिया है। इतना ही नहीं सबसे शर्मनाक बात तो ये है कि सरकार ने भी पत्रों के संचार में अपने उत्तरदायित्व को भुला दिया है। 2जी- 3जी घोटालों से होने वाली रिश्वत की आमदनी के नशे में डाक- तार विभाग ने डाक और तार से ही पल्ला छुड़ा लिया है। यही कारण है कि आज स्थानीय पत्र भी डाक विभाग यदि दो या तीन हफ्ते में पंहुचा दे तो इसे साधारण बात माना जाता है। वास्तव में हाथ से लिखे पत्रों से दिल का दिल से लेन- देन होता है।
- प्रताप सिंह राठौर, अहमदाबाद
सैंया भये कोतवाल...
आज की राजनीति पर जितना कम कहा जाए उतना अच्छा। आपके सम्पादकीय में उत्तर प्रदेश के हालात का जायजा लिया गया है। जहां भ्रष्टाचार, बलात्कार आदि पर चिंता व्यक्त की गई है। यह स्थिति लगभग सारे देश में व्याप्त है क्योंकि नेता खुद इन मामलों में गिरफ्तार भी किए गए हैं। जब बाहुबली और गुंडे नेता बन गए हों तो कानून का डर किसे हो। यह तो वही कहावत हो गई- सैंया भये कोतवाल तो अब डर किस का ...
-चंद्रमौलेश्वर प्रसाद, हैदराबाद
cmpershad@gmail.com
गरिमापूर्ण अंक
गरिमा पूर्ण है फरवरी अंक। बहुआयामी रचनाओं ने जहाँ सार्थक साहित्य को विस्तार दिया है वहीं सजगता पूर्ण और निष्पक्ष चयन ने इसे महत्वपूर्ण बनाया है। उदंती परिवार तथा रचनाकारों को बधाई। 'फूल तुम्हें भेजा है खत में...' अपर्णा जी ने चिट्ठियों में सहज रूप से छुपे दर्द को बहुत ही खूबसूरती से व्यक्त किया है। रिश्तों की संवेदना पत्रों में गहराई से समाई थी इसीलिए हमारे मन में उनका स्थान था और रहेगा। एसएमएस तो तकनीकी व्यवस्था मात्र है। कृष्ण कुमार ने हवाई मेल की अद्भुत जानकारी दी है।
अनकही के अंतर्गत महिलाओं की सुरक्षा का ज्वलंत प्रश्न उठाया गया है। यह गंभीर समस्या है और इसकी जड़ें सामजिक, आर्थिक एवं राजनितिक व्यवस्था में निहित हैं। उत्तर प्रदेश की स्थिति बहुत खराब है जहाँ महिलाएं देश में सर्वाधिक और शर्मनाक स्थिति तक बलात्कार की शिकार होती हैं... क्या आपने कभी सोचा है कि लड़कियों का सबसे अधिक सम्मान इसी उत्तर प्रदेश में होता है, लड़की से बड़ी उम्र के भाई, चाचा, ताऊ और पिता भी छोटी- छोटी लड़कियों के पैर बड़े आदर से साक्षात देवी मानते हुए छूते हैं। इसके विपरीत जिन प्रदेशों में लड़कियां अपने से बड़ों के पैर छूती हैं, वहां उत्तर प्रदेश के मुकाबले बलात्कार की कम शिकार होती हैं। इससे ऐसा लगता है उत्तर प्रदेश में बेटियों का बनावटी सम्मान किया जाता है! मेरा मानना है कि आर्थिक, सामजिक बराबरी पर खड़ी होकर महिलाएं इसी शासन व्यवस्था के भीतर अपनी रक्षा और अपना सम्मान प्राप्त कर सकेंगी। आपके इस सार्थक प्रश्न की गहन चिंता के लिए हार्दिक बधाई।
-सुरेश यादव,नई दिल्ली
sureshyadav55@gmail.com

चिट्ठियों में छुपा दर्द
'फूल तुम्हें भेजा है खत में...' अपर्णा जी ने चिट्ठियों में सहज रूप से छुपे दर्द को बहुत ही खूबसूरती से पाठकों के सामने लाया है। सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई।
- आशीष, कानपुर
समाज की दुखती रग
उदंती नियमित पढ़ता रहता हूँ। इस बार राजनीति के संदर्भ में जार्ज आरवेल के विचार अच्छे लगे। आपकी अनकही ने भी समाज की दुखती रग पर हाथ रखा है। इसके लिये आपको साधुवाद।
- दीपक शर्मा, कुवैत
deepakrajim@gmail.com
सुंदर एवं मनमोहक पत्रिका
'उदंती' का जनवरी अंक प्राप्त हुआ। सामग्री संग्रहणीय व प्रेरणास्पद है। बधाई। बिली अर्जन सिंह के बारे में कई नई जानकारी मिली। बेबी दिव्या जैन का प्रयास सराहणीय व अनुकरणीय है। सुंदरवन की समस्या तथा सूचना माध्यमों के दुष्प्रभावों से बच्चों को बचाने की चुनौतियां हमारा तुरंत ध्यान चाहती हैं। कहानी, कविता, लघुकथा तथा अन्य स्तंभ रोचक एवं ज्ञानवर्धक हंै। 'हाय मेरी प्याज' एक सामाजिक समस्या पर रोचक व्यंग्य है। पत्रिका की साज- सज्जा एवं चिंत्राकन बहुत सुंदर व मनमोहक है।
- द्वारिका प्रसाद शुक्ल, अलीगंज, लखनऊ

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