March 21, 2011

निखर गए हैं गुलाब सारे जो तेरी यादों से...

फैज अहमद ' फैज'
- मनीष कुमार
फैज अहमद 'फैज' आधुनिक उर्दू शायरी के वो आधारस्तम्भ है, जिन्होंने अपने लेखन से इसे एक नई ऊंचाई दी। 1911 में सियालकोट में जन्मे फैज ने अपनी शायरी में सिर्फ इश्क और सौंदर्य की ही चर्चा नहीं की, बल्कि देश और आवाम की दशा और दिशा पर भी लिखते रहे। शायरी की जुबान तो उनकी उर्दू रही पर गौर करने की बात है कि अंग्रेजी और अरबी में भी उन्होंने 30 के दशक में प्रथम श्रेणी से एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। शायद यही वजह रही कि उनकी गजलें और नज्मों में अरबी फारसी के शब्दों का बहुतायत इस्तेमाल हुआ है।
पढ़ाई लिखाई खत्म हुई तो पहले अमृतसर और बाद में लाहौर में अंग्रेजी के प्राध्यापक नियुक्त हुए। 1941 में इन्होंने एक अंग्रेज लड़की एलिस जार्ज से निकाह किया। और मजेदार बात ये रही कि ये निकाह और किसी ने नहीं बल्कि शेख अब्दुल्ला ने पढ़वाया था। 1941 में फैज का पहला कविता संग्रह नक्शे फरियादी प्रकाशित हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान फैज सेना में शामिल हो गए। आजादी के बाद कम्युनिस्ट विचारधारा का अपने देश में प्रचार प्रसार करते रहे। लियाकत अली खां की सरकार के तख्तापलट की साजिश रचने के जुर्म में 1951- 55 तक कैद में रहे। जिंदगी के इस मोड़ में जो कष्ट, अकेलापन और उदासी उन्होंने झेली वो इस वक्त लिखी गई उनकी नज्मों में साफ झलकती है। ये नज्में बाद में बेहद लोकप्रिय हुईं और 'दस्ते सबा' और 'जिंदानामा' नाम से प्रकाशित हुईं।
जैसा की अमूमन होता है, अन्य शायरों की तरह शुरुआती दौर में हुस्न और इश्क ही फैज की शायरी का सबसे बड़ा प्रेरक रहा। नक्शे फरियादी की शुरुआती नज्म में वो कहते हैं-
रात यूं दिल में खोई हुई याद आई
जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए
जैसे सहराओं में हौले से चले बाद ए नसीम1
जैसे बीमार को बेवजह करार आ जाए
1. हल्की हवा
अपने हमराज के बदलते अंदाज के बारे में फैज का
ये शेर देखें-
यूं सजा चांद कि झलका तेरे अंदाज का रंग
यूं फजा महकी कि बदला मेरे हमराज का रंग
फैज ने अपनी कविता के विषय यानी मौजूं-ए-सुखन
पर यहां तक कह दिया था -
लेकिन उस शोख के आहिस्ता से खुलते हुए होठ
हाए उस जिस्म के कमबख्त दिलावेज खुतूत
आप ही कहिए कहीं ऐसे भी अफसूं (जादू) होंगे
अपना मौजूए सुखन इनके सिवा और नहीं
तब ए शायर1 का वतन इनके सिवा और नहीं
1. शायरी की प्रवृति
पर बाद में फैज देश और अपने आस पास के हालातों
से इस कदर प्रभावित हुए कि कह बैठे-
इन दमकते हुए शहरों की फरावां मखलूक (विशाल जनता)
क्यों फकत मरने की हसरत में जिया करती है
ये हसीं खेत, फटा पड़ता है जोबन जिनका
किसलिए इन में फकत (सिर्फ) भूख उगा करती है
फैज की शायरी के बारे में नामी समीक्षक प्रकाश पंडित कहते हैं कि उनकी अद्वितीयता आधारित है उनकी शैली के लोच और मंदगति पर , कोमल. मृदुल और सौ -सौ जादू जगाने वाले शब्दों के चयन पर, तरसी हुई नाकाम निगाहें और आवाज में सोई हुई शीरीनियां ऐसी अलंकृत परिभाषाओं और रूपकों पर, और इन समस्त विशेषताओं के साथ गूढ़ से गूढ़ बात कहने के सलीके पर।
अगर फैज की उपमाओं की खूबसूरती का आपको रसास्वादन करना हो तो उनकी नज्म 'गर मुझे इसका यकीं हो, मेरे हमदम मेरे दोस्त' की इन पंक्तियों पर गौर फरमाएं... आपका मन उनकी कल्पनाशीलता को दाद दिए बिना नहीं रह पाएगा।
कैसे मगरूर1 हसीनाओं के बर्फाब से जिस्म
गर्म हाथों की हरारत से पिघल जाते हैं
कैसे इक चेहरे के ठहरे हुए मानूस नुकूश2
देखते देखते यकलख्त3 बदल जाते हैं
1. दंभी 2. परिचित नैन नक्श 3. एकाएक
1978 में फैज मास्को में थे। उन्हीं दिनों उन्होंने तेलंगाना आंदोलन में शिरकत करने वाले प्रगतिशील शायर मोइनुद्दीन मखलूम की गजल से प्रेरि होकर एक गजल लिखी थी आपकी याद आती रही रात भर...। शायद वो यादे ही थीं जिसने फैज के जेल में बिताये हुए चार सालों में हमेशा से साथ दिया था।
पर पुरानी यादों ने हमेशा फैज की शायरी में मधुर स्मृतियां ही जगाईं ऐसा भी नहीं है। वसंत आया तो बहार भी आई। पर अपनी खुशबू के साथ उन बिखरे रिश्तों, अधूरे ख्वाबों और उन अनसुलझे सवालों के पुलिंदे भी ले आई जिनका जवाब अतीत से लेकर वर्तमान के पन्नों में कहीं भी नजर नहीं आता।
बहार आई तो जैसे इक बार
लौट आए हैं फिर अदम1 से
वो ख्वाब सारे, शबाब सारे
जो तेरे होठों पर मर मिटे थे
जो मिट के हर बार फिर जिए थे
निखर गए हैं गुलाब सारे
जो तेरी यादों से मुश्क- बू 2 हैं
जो तेरे उश्शाक3 का लहू हैं
1. जमे हुए, मृत 2. कस्तूरी की तरह सुगंधित 3. आशिकों
पर फैज ने अपनी शायरी को सिर्फ रूमानियत भरे अहसासों में कैद नहीं किया। वक्त बीतने के साथ उन्होंने ये महसूस किया कि शायरी को प्यार मोहब्बत की भावनाओं तक सीमित रखना उसके उद्देश्य को संकुचित करना था। उनकी नज्म- मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना मांग... उनके इसी विचार को पुख्ता करती है। जब फैज साहब ने नूरजहां की आवाज में इस नज्म को सुना तो इतने प्रभावित हुए कि उसके बाद सबसे यही कहा कि आज से ये नज्म नूरजहां की हुई।
फैज कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थक थे। अपनी शायरी में सामाजिक हालातों के साथ साथ फैज की ये कोशिश भी रही कि कि अपनी लेखनी से आम जनमानस व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए प्रेरित कर सकें।
फैज की इक खासियत थी कि जब भी वो अपना शेर पढ़ते उनकी आवाज कभी ऊंची नहीं होती थी। दोस्तों की झड़प और आपसी तकरार उनके शायरी के मूड को बिगाडऩे के लिए पर्याप्त हुआ करती थी। पर उनके स्वभाव की ये नर्मी कभी भी तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक हालातों पर अपनी लेखनी के माध्यम से चोट करने में आड़े नहीं आई। 1947 में विभाजन से मिली आजादी के स्वरूप से वो ज्यादा खुश नहीं थे। उनकी ये मायूसी
इन पंक्तियों से साफ जाहिर है-
ये दाग दाग उजाला , ये शब-गजीदा1 सहर
वो इंतजार था जिसका वो सहर तो नहीं
ये वो सहर तो नहीं जिस की आरजू लेकर
चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं ना कहीं
फलक2 के दश्त में तारों की आखिरी मंजिल
1. कष्टभरी 2. आसमान
फैज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे। पाकिस्तान में सर्वहारा वर्ग के शासन के लिए वो हमेशा अपनी नज्मों से आवाज उठाते रहे। बोल की लब आजाद हैं तेरे....उनकी एक ऐसी नज्म है जो आज भी जुल्म से लडऩे के लिए आम जनमानस को प्रेरित करने की ताकत रखती है। इसीलिए पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में ये उतनी ही लोकप्रिय है जितनी की पाक में।
लियाकत अली खां की सरकार का तख्ता पलट करने की कम्युनिस्ट साजिश रचने के जुर्म में 1951 में फैज पहली बार जेल गए। जेल की बंद चारदीवारी के पीछे से मन में आशा का दीपक उन्होंने जलाए रखा ये कहते हुए कि जुल्मो-सितम हमेशा नहीं रह सकता।
चन्द रोज और मेरी जान! फकत1 चन्द ही रोज!
जुल्म की छांव में दम लेने पे मजबूर हैं हम
और कुछ देर सितम सह लें, तड़प लें, रो लें
अपने अजदाद की मीरास2 है माजूर3 हैं हम
1. सिर्फ 2. पुरखों की बपौती 3. विवश
जेल से ही वो शासन के खिलाफ आवाज उठाते रहे। वो चाहते थे पाकिस्तान में एक ऐसी सरकार बने जो आम लोगों की आंकाक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती हो। बगावत करने को उकसाती उनकी ये नज्म पाक में काफी मशहूर हुई। कहते हैं जब भी किसी मंच पर इकबाल बानो उनकी इस नज्म को गाते हुए जब ये कहतीं सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्त गिराए जाएंगे, दर्शक दीर्घा से समवेत स्वर में आवाजें आतीं....'हम देखेंगे'
हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लौह-ए-अजल में लिखा है
फैज को विश्वास था कि गर आम जनता को अपनी ताकत का गुमान हो जाए तो वो बहुत कुछ कर सकती है। पर उनका ये स्वप्न, स्वप्न ही रह गया। कम्युनिस्ट विचारधारा को वो अपने ही मुल्क में प्रतिपादित नहीं कर पाए। अपने जीवन के अंतिम दशक में वो बहुत कुछ इस असफलता को स्वीकार कर चुके थे। 1976 की उनकी ये रचना बहुत कुछ उसी का संकेत करती है।
वो लोग बहुत खुशकिस्मत थे
जो इश्क को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते जी मशरूफ1 रहे
कुछ इश्क किया कुछ काम किया
काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
फिर आखिर तंग आकर हमने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया
1. व्यस्त
फैज ने अपनी शायरी में रूमानी कल्पनाओं का जाल बिछाया पर अपने इर्द गिर्द के राजनीतिक और सामाजिक माहौल को भी उतना ही महत्व दिया। एक ओर बगावत का बिगुल बजाया तो दूसरी ओर प्रेयसी की याद के घेरे में उपमाओं का हसीन जाल भी बुना। इसलिए समीक्षकों की राय में रूप और रस प्रेम और राजनीति, कला और विचार का जैसा सराहनीय समन्वय आधुनिक उर्दू शायरी में फैज का है उसकी मिसाल खोज पाना संभव नहीं है।

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब
ना मांग
मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब ना मांग
मैंने समझा था कि तू है तो दरख्शा1 है हयात 2
तेरा ग़म है तो ग़मे- दहर3 का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात 4
तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है

तू जो मिल जाये तो तकदीर निगूं 5 हो जाए
यूं न था, मैंने फकत चाहा था यूं हो जाए
और भी दुख हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म 6
रेशमों-अतलसो-कमख्वाब में बुनवाये हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाजार में जिस्म
खाक में लिथड़े 7 हुए, ख़ून में नहलाए हुए

जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हु गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नजर क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुख हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना मांग !

1.प्रकाशमान 2.जिंदगी 3. सांसारिक चिंता 4. स्थायित्व
5.
सिर झुका ले 6.सदियों से चला रहा अंधकारमय तिलिस्म
7.
धूल से सना हुआ

मेरे बारे में ...
रांची में थर्मल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में परामर्शदाता। 2004 से चिट्ठाकारिता में संगीत, कविता, गजल, यात्रा और किताबों से अपने लगाव को अभिव्यक्त करता हूं। पिछले पांच वर्षों से अपने चिट्ठों एक शाम मेरे नाम और मुसाफिर हूं यारों पर नियमित लेखन।
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