October 22, 2009

समय की धूरी पर घूमता चाक


- गोपाल सिंह
जहां बाजार की हर दुकान पर बेतहाशा भीड़ दीपावली की हर खुशी को अपने आंचल में समेट लेना चाह रही हो वहीं इस बाजार का एक कोना दर्दनाक सन्नाटे का अहसास करवाता है। हम इस देश में मनाये जाने वाले त्योहारों के पीछे की ग्रामीण या स्थानीय अर्थव्यवस्था को तो भूल ही चुके हैं और यही कारण है कि भीड़ भरे बाजार में कुम्हार की दुकान का कोना अब सुनसान रहने लगा है। जिन कुम्हारों के बनाये दीयों से हर घर में रोशनी हुआ करती थी अब उन्हीं घरों के दीये बुझने लगे हैं।
बाजारों में दीपावली की रौनक अपने चरम पर है। बाजार की हर गली नुक्कड़ पर खरीददारों की भीड़ हर साल की तरह इस बार भी लक्ष्मी जी को अपने घर के आंगन तक लाने के लिए या यूं कहें उन्हें रिझाने के सारे साजो सामान को खरीदने में जुटी है। एक तरफ औरतें नये बर्तनों की खरीद में दुकानदार से भाव-ताव में मशगूल हैं तो दूसरी तरफ छठे वेतन आयोग की खुशी में बच्चों की फरमाइश को पूरा करते सरकारी कर्मचारी। ऐसे में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ऐसी मंहगी खरीददारी तो नहीं कर सकते लेकिन हां, कईं हफ्तों की मेहनत के बाद रंगे और साफ-सुथरे घरों में देवी-देवताओं या हीरो-हिरोईनों के कुछ नये पोस्टर तो लगा ही सकते हैं।
जहां बाजार की हर दुकान पर बेतहाशा भीड़ दीपावली की हर खुशी को अपने आंचल में समेट लेना चाह रही हो वहीं इस बाजार का एक कोना दर्दनाक सन्नाटे का अहसास करवाता है। 60 साल की एक बुढिय़ा के साथ 15 साल की बच्ची दीयों के बीच ऐसे बैठी है जैसे उसके घर में कोई मातम छाया हो। उनके पास अपने बनाये दीयों, कुल्हड़ और मटकियों के अलावा और कोई नहीं। ऐसा कोई ग्राहक नहीं जो उससे दस दिये तो खरीद सके और इतना नहीं, तो कम से कम मोल भाव तो करने वाला आये। यह कैसी दीपावली जिसमें दीये खरीदने वाले नहीं। जिस त्योहार का नाम ही दीप से शुरू होता हो, जिस त्योहार का पर्याय ही दीप हो, जिस त्योंहार में रोशनी ही दीपों से होती हो, उन्हीं दीयों का खरीददार आज इस समाज से कहीं दूर किसी बाजार खो सा गया है।
पिछले कुछ सालों में बाजार के एक कोने का यह सन्नाटा शहर के हर बाजार से होता हुआ गांव के हर कुम्हार के घर तक पहुंच गया है। जिन कुम्हारों के बनाये दीयों से हर घर में रोशनी हुआ करती थी अब उन्हीं घरों के दीये बुझने लगे हैं। आधुनिकता के इस दौर में दीपावली जैसे त्योहार बाजारों की भेंट इस तरह चढ़ चुके हैं कि आज इन दीये बनाने वालों को अपने चूल्हे की रोशनी जलाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इस आधुनिकता ने न केवल इन त्योंहारों के अर्थ को समाप्त किया है बल्कि अपने ही गांव-समाज के कारीगरों के प्रति हमें इतना असंवेदनशील भी बना दिया है कि हम हमारे पैसों से देशी-विदेशी बड़ी कंपनियों का तो पेट भर रहे हैं लेकिन गांव के कारीगरों को भूखे मारने में हमें कोई संकोच नहीं। हम इस देश में मनाये जाने वाले त्योहारों के पीछे की ग्रामीण या स्थानीय अर्थव्यवस्था को तो भूल ही चुके हैं और यही कारण है कि भीड़ भरे बाजार में कुम्हार की दुकान का कोना अब सुनसान रहने लगा है। ऐसी बात नहीं है कि लोगों ने दीपावली पर दीये जलाना बंद कर दिया है बल्कि हाथ से बने दियों को छोड़कर मशीन से बने दियों की दुकानों पर दिखने वाली भीड़ से आप मनुष्य के भीतर दिन-ब-दिन घुसने वाली कृत्रिमता का अंदाजा तो आप लगा ही सकते हैं।

पहले के समाज में इस बात पर अधिक बल था कि गांव के कारीगरों को अधिक से अधिक काम कैसे मिले। इसी को देखते हुए यहां हर त्योहार को किसी न किसी कला से जोड़ा है जिसमें एक, दो, तीन या अनेक प्रकार की हाथ से बनी चीजों का इस्तेमाल होता हो। आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद जिले में दशहरे पर अभी भी कुछ युवा पूरे गांव का चक्कर निकालते हैं और हर घर की छत पर दो-चार पत्थर फेंकते हैं ताकि छत में इस्तेमाल की जाने वाली मिट्टी की कुछ खपरेल टूट जाये। इन खपरेल के टूटने पर गांव के कुम्हार को हर साल काम मिलना तय था। इस प्रकार से ऐसे अनेक आयोजन हर तरह की कारीगरी और उनकी रोजी- रोटी को सुरक्षित करने के लिए किए जाते रहे हैं।
18 वीं शताब्दी तक भारत के हर गांव में कम से कम अठारह तरह की कारीगरी का मिलना कोई साधारण बात नहीं थी लेकिन आज हमारे लिए यह कोई महत्व का विषय नहीं बचा।
आज कुम्हार की आवाज इस आधुनिक चकाचौंध वाले बाजारनुमा नक्कारखाने में तूती की आवाज जरूर लगती है लेकिन उसका चाक समय की धुरी पर चलता है। इस समय से हम इतने आगे ना निकल जाएं कि लोग पीछे रह जायें।
यदि आप अपने समाज के प्रति संवेदनशील हैं तो कृपया इस दीपावली पर हाथ से बने दीये या मिट्टी के अन्य सामान खरीदें। संभव हो तो आप अपने मित्रों को भी इसके लिए प्रेरित करें। बहुत ज्यादा नहीं इस दीपावली पर आप पारंपरिक मिट्टी का बस इतना ही सामान खरीदें-
छोटे दीपक- 101 (तीन दिनों के लिए)
बड़ा दीपक-1, कुल्हड़- 4, चार खानों वाले कुल्हड़- 2, आकाश दीप- 1
सजावट के लिए स्थानीय कारीगरों द्वारा अन्य सामान भी बनाया जाता है जो स्थानीय जरूरत और कारीगरों पर निर्भर करता है।



0 Comments:

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष