October 22, 2009

धैर्य तो रखिए जनाब


आपका नंबर भी आयेगा
- प्रो.डॉ. मधुसूदन पुरोहित
अपने भाग्य के साथ कार्यक्षमता पर भी विचार करना पड़ता है। सारे विचार जब स्थिर हो जाने हैं तब कहीं जाकर वह लाइन में खड़े होता है, जहां पहले से ही अपनी- अपनी चाहत को पूरा करने वाले लाइन लगाकर खड़े होते हैं।
प्रत्येक आदमी जिंदगी में कुछ करना चाहता है, कुछ पाना चाहता है, परंतु कुछ भी पाने की चाहत रखने का मतलब है उस मंजिल लिए प्रयत्न करना। और मंजिल तक पहुंचने के लिए पढऩा, लिखना जरूरी है। पढऩे- लिखने के लिए विद्यार्जन आवश्यक है। लेकिन यह सब भी तभी संभव है जब उसे यह पता  हो कि उसकी रूचि क्या है, कौन सी इच्छा उसके मन में, दिमाग में है। इसके साथ साथ उसे परिवार में माता- पिता की इच्छा का भी अवलोकन करना पड़ता है।
इस प्रकार अपने रहन सहन व आस- पास की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, इन सभी बातों का मंथन करके आदमी विचार करता है कि उसे क्या करना है। जब वह इस निर्णय तक पहुंच जाता है कि उसे क्या करना है तब फिर उसे इसके लिए कही खड़े होना पड़ता है। या कहीं लाईन लगाना पड़ता है।

भारत की जनसंख्या इतनी अधिक बढ़ गई है कि व्यक्ति को अपनी पसंद का कुछ पाने के लिए हर क्षेत्र में इंतजार करना पड़ता है। फिर आरक्षण की नीति भी उसके सामने मुंह खोले खड़ी हुई हैं, जिसे देखते हुए सोचना पड़ता है कि वहां उसका नम्बर कभी लगेगा भी या नहीं।
इन सबके साथ उसे अपने भाग्य के साथ कार्यक्षमता पर भी विचार करना पड़ता है। सारे विचार जब स्थिर हो जाने हैं तब कहीं जाकर वह लाइन में खड़े होता है, जहां पहले से ही अपनी- अपनी चाहत को पूरा करने वाले लाइन लगाकर खड़े होते हैं।
अपने गंतव्य तक जाने के लिए जिस चौराहे पर सब खड़े हैं वहां से पंगडंडी, बैलगाड़ी, साइकिल, तांगा और रिक्शा से उसे बस स्टैंड, रेल्वे स्टेशन, एयरपोर्ट आदि तक जाना होता है। वहां पंहुच कर वह देखता है कि कौन सा वाहन सबसे पहले छूट रहा है। उसकी आंखों के सामने जो वाहन सबसे पहले छूट रहा होता है उस ओर वह दौडऩा शुरु करता है। दौड़ते- हांफते हुए वह शारीरिक क्षमता कमजोर होने पर गंतव्य स्थान तक पहुंच नहीं पाता और इस तरह वह बस छूट जाती है।
वहां से निराश लौटकर वह  रेलवे स्टेशन रेल पकडऩे के लिए दौड़ता है परंतु वहां पंहुचने में भी देरी होती है और वह दौड़कर भी रेल के डिब्बे में चढ़ नहीं पाता। लेकिन उसकी चाहत तब भी बनी रहती है और वह हवाई जहाज की ओर बढ़ता है, परंतु वहां भी उसे निराशा ही हाथ लगती  है।
 इस प्रकार गन्तव्य स्थान पर अपनी इच्छानुसार कार्य करने पहुंच नहीं पाता। काश वह एक ही लाइन में धैर्य पूर्वक खड़ा होता और अपना नम्बर आने का इंतजार करता तो उसे जीवन में सफलता जरूर मिलती।

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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