October 22, 2009

अहमदाबाद में बसने का निर्णय


सबके दाता राम
- मोहन दास करमचंद गांधी
यदि मुझे मात्र सिद्धांतों अर्थात तत्वों का ही वर्णन करना हो तो फिर आत्मकथा लिखने की कोई आवश्यकता ही नहीं। पर मैं तो अपने द्वारा निकाले गये निष्कर्षों के इतिहास से जनसामान्य को अवगत कराना चाहता हूं, इसलिए मैंने अपने इन प्रयोगों का नामकरण किया है- 'सत्य के प्रयोग'। इसमें सत्य के पृथक समझे जाने वाले अहिंसा, ब्रह्मचर्य जैसे तत्व भी स्वत: ही समाहित माने जाएंगे। पर मेरे विचार से सत्य ही सर्वोपरि है और उसमें अनेक वस्तुएं समा सकती हैं। परंतु यह सत्य उस स्थूल वाणी का सत्य नहीं है। यह तो जिस तरह वाणी का है, उसी तरह विचारों का भी है। यह सत्य हमारा कल्पना किया गया सत्य नहीं है, बल्कि यह तो चिरस्थायी सत्य है, अर्थात ईश्वर ही है।
आश्रम की स्थापना
कुंभ की यात्रा मेरी हरद्वार की दूसरी यात्रा थी। 1915 ई. की 25 मई को सत्याग्रहाश्रम की स्थापना हुई। श्रद्धानंदजी चाहते थे कि मैं हरद्वार में बसूं। कलकत्ते के कुछ मित्रों का कहना था कि वैद्यनाथ  में बंसू। कुछ मित्रों का प्रबल आग्रह राजकोट में बसने का था।
पर जब मैं अहमदाबाद से गुजरा तो अनेक मित्रों ने अहमदाबाद में ही बसने पर जोर दिया और आश्रम के खर्च का बीड़ा उन्होंने उठाने का जिम्मा लिया। मकान ढूंढने का भार भी उन्होंने उठा लिया।
अहमदाबाद पर मेरी दृष्टि पहले से गड़ी थी। मैं जानता था कि मैं गुजराती हूं, इससे गुजराती भाषा के द्वारा देश की अधिक-से अधिक सेवा कर सकूंगा। यह भी था कि अहमदाबाद पहले हाथ की बुनाई का केंद्र रहा है, इससे चरखे का काम यहीं ज्यादा अच्छी तरह हो सकेगा। यह भी आशा थी कि गुजरात का प्रधान नगर होने के कारण यहां के धनी लोग धन की अधिक सहायता कर सकेंगे।
अहमदाबाद के मित्रों के साथ हुई बातचीत में अस्पृश्यता के प्रश्न की चर्चा हुई थीं। मैंने साफ कह दिया था कि कोई लायक अंत्यज भाई आश्रम में दाखिल होना चाहेगा तो मैं उसे अवश्य दाखिल कर लूंगा।
'आपकी शर्तों को पाल सकने वाले अंत्यज कहां पड़े मिलते हैं?' यों कहकर एक वैष्णव मित्र ने अपने मन को संतोष कर लिया और अंत में अहमदाबाद में बसने का निश्चय हो गया।
मकान की खोज करते हुए कोचरव में श्री जीवनलाल बरिस्टर जो मुझे अहमदाबाद बसाने में प्रमुख थे, का मकान किराये पर लेना तय हुआ। यह प्रश्न तुरंत उठा कि आश्रम का नाम क्या रखा जाय। मित्रों से विचार- विमर्श किया। कितने ही नाम सामने आये। सेवाश्रम, तपोवन आदि सुझाये गए थे। सेवाश्रम नाम जंच रहा था, पर उसमें सेवा की रीति का परिचय नहीं मिलता था। तपोवन नाम पसंद नहीं किया जा सकता था, क्योंकि यद्यपि तपश्चर्या हमें प्रिय थी, फिर भी यह नाम भारी लगा। हमें तो सत्य की पूजा, सत्य की खोज करनी थी, उसी का आग्रह रखना था और दक्षिण अफ्रीका में जिस पद्धति को मैंने अपनाया था। भारतवर्ष में उसका परिचय कराना था। और शक्ति कितनी व्यापक हो सकती है, यह देखना था। इससे मैंने और साथियों ने सत्याग्रहाश्रम नाम पसंद किया। उससे सेवा और सेवा की पद्धति दोनों का भाव अपने-आप जाता था।

आश्रम चलाने को नियमावली की आवश्यकता थी। इससे नियमावली का मसविदा बनाकर उस पर राय मांगी। बहुसंख्यक सम्पतियों में से सर गुरुदास बनर्जी की सम्मति मुझे याद रह गई है। उन्हें नियमावली पसंद आई, पर उन्होंने सुझाव दिया कि व्रतों में ये नम्रता की कमी है। यद्यपि नम्रता के अभाव का अनुभव मुझे जगह-जगह हो रहा था, फिर भी नम्रता को व्रत में स्थान देने से नम्रता के नम्रता न रह जाने का आभास होता था। नम्रता का पूरा तात्पर्य तो शून्यता की प्राप्ति के लिए दूसरे व्रत करने होते हैं। शून्यता मोक्ष की स्थिति है। मुमुक्ष या सेवक के प्रत्येक कार्य में यदि नम्रता, निरभिमानता न हो तो यह मुमुक्ष नहीं है, सेवक नहीं है। वह स्वार्थी है, अहंकारी है। बालक आये थे। वे और यहां के लगभग पच्चीस स्त्री पुरुषों से आश्रम का शुभारंभ हुआ था। सब एक रसोई में भोजन करते थे और इस तरह रहने की कोशिश करते थे मानो सब एक ही कुटुम्ब के हों।
कसौटी पर चढ़े
आश्रम की स्थापना को अभी कुछ ही महीने हुए थे, इतने में हमारी ऐसी अग्नि-परीक्षा हो गई जिसकी मुझे कभी आशंका नहीं थी। भाई अमृतलाल ठक्कर का पत्र आया, 'एक गरीब और ईमानदार अंत्यज कुटुम्ब है। वह आपके आश्रम में आकर रहना चाहता है। उसे लेंगे?'
मैं चौंका तो जरूर। ठक्कर बापा जैसे पुरुष की सिफारिश लेकर आने वाला अंत्यज कुटुम्ब इतना शीघ्र आयेगा, इसकी मुझे बिल्कुल उम्मीद न थी। साथियों को चिट्ठी दिखाई। उन्होंने उसका स्वागत किया। भाई अमृतलाल ठक्कर को लिख दिया कि वह कुटुम्ब आश्रम में नियमों का पालन करने को तैयार हो तो उसे लेने को हम तैयार हैं।
दूदाभाई, उनकी पत्नी, दानी बहन और बैयां-बैयां चलती दूध पीती लक्ष्मी आये। दूदाभाई बम्बई में शिक्षक का काम करते थे। नियमों का पालन करने को तैयार थे। उन्हें आश्रम में लिया।
सहायक मित्र मंडल में खलबली मच गई। जिस कुएं में बंगले के मालिक का हिस्सा था, उस कुएं के पानी भरने में ही अड़चन आने लगी। चरस वाले पर हमारे पानी के छींटे पड़ जाए तो वह अपवित्र हो जाए। उसने गालियां देना और दूदाभाई को परेशान करना शुरु कर दिया। मैंने सबसे कह दिया कि गालियां सहते जाओ और दृढ़तापूर्वक पानी भरते जाओ। हमें चुपचाप गालियां सुनते देखकर चरस वाले को शर्म आई और उसने गालियां बंद कर दीं, पर पैसे की मदद तो बंद हो गई। जिस भाई ने आश्रम के नियमों का पालन करने वाले अंत्यजों के प्रवेश के संबंध में पहले से ही संदेह जताया था, उसे तो आश्रम में अंत्यज के दाखिल होने की उम्मीद ही न थी। पैसे की मदद बंद हुई। बहिष्कार की अफवाहें मेरे कानों में पडऩे लगीं। मैंने साथियों के साथ विचार कर कहा था - 'यदि हमारा बहिष्कार हो और हमें कहीं से सहायता न मिले तो भी अब हम अहमदाबाद न छोड़ेंगे। भंगी टोले में जाकर उन्हीं के साथ रहेंगे और जो कुछ मिलता रहेगा उस पर या मजदूरी करके गुजर करेंगे।'
अंत में मगनलाल ने मुझे नोटिस दिया - 'अगले महीने में हमारे पास आश्रम का खर्च चलाने को रूपए नहीं है।' मैंने धीरज से जवाब दिया। 'तो हम भंगी टोले में चलकर रहेंगे।' मुझ पर ऐसा संकट आने का यह पहला अवसर न था। हर बार आखिरी घड़ी में 'सबके दाता राम' ने सहायता कर दी थी।

मगनलाल को नोटिस देने के कुछ ही दिन बाद एक दिन सवेरे किसी लड़के ने आकर बताया, 'बाहर मोटर खड़ी है और सेठ आपको बुला रहे हैं।' मैं मोटर के नजदीक गया। सेठ ने मुझसे पूछा- 'मेरी इच्छा आश्रम को कुछ मदद देने की है, आप स्वीकार करेंगे?'
मैंने जवाब दिया- 'कुछ दीजिएगा तो जरूर लूंगा। मुझे उसे स्वीकार करना चाहिए क्योंकि इस समय मैं संकट में भी हूं।'
'मैं कल इसी समय आऊंगा, उस वक्त आप आश्रम में होंगे?' मैंने जवाब में हां कहा और सेठ चले गये। दूसरे दिन नियत समय पर मोटर का भोंपू बजा। लड़कों ने खबर दी। सेठजी अंदर नहीं आये। मैं मिलने गया। वह मेरे हाथ पर 1300 रुपए रखकर चलते बने।
मैंने इस मदद की कभी उम्मीद नहीं थी। मदद करने का यह तरीका भी मेरे लिए नया था। उन्होंने आश्रम में पहले कभी कदम नहीं रखा था। मुझे याद आता है कि उनसे मैं एक बार ही मिला था। न आश्रम में आना, न कुछ पूछना, बाहर ही बाहर पैसे देकर चलते बनना, मेरा यह पहला ही अनुभव था। इस सहायता से भंगी टोले में जाने की नौबत नहीं आई। लगभग एक साल का खर्चा मुझे मिल गया।
जैसे बाहर खलबली मची वैसे ही आश्रम में भी मची। यद्यपि दक्षिण अफ्रीका में मेरे यहां अंत्यज आदि आते रहते, खाते थे, पर यहां अंत्यज-कुटुम्ब का आना पत्नी को और आश्रम की दूसरी स्त्रियों को पसंद आया हो, यह नहीं कहा जा सकता। दानी बहन के प्रति नफरत तो नहीं, पर उसके प्रति उदासीनता की बात मेरी सूक्ष्म आंखे देख लेतीं और तेज कान सुन लेते थे। पैसे की मदद बंद हो जाने के भय ने मुझे तनिक भी चिंता में नहीं डाला था। पर यह भीतर के क्षोभ का सामना करना कठिन लगा। दानी बहन उनका धीरज मुझे अच्छा लगा। उन्हें कभी-कभी क्रोध आता था, पर कुल मिलाकर  उनकी सहन-शक्ति की मुझ पर अच्छी छाप पड़ी थी और वह समझ जाते थे और दानी बहन से सहन करवाते थे।
इस कुटुम्ब को आश्रम में रखने को बहुत से सबक मिले हैं, और अस्पृश्यता की आश्रम में गुंजाइश नहीं है, यह शुरु में ही स्पष्ट हो जाने से आश्रम की मर्यादा निश्चित हो गई तथा इस दिशा में उसका काम बहुत सरल हो गया। यह होते हुए भी और आश्रम को उसका खर्च बढ़ते जाते हुए भी, वह मुख्यत: कट्टर समझे जाने वाले हिन्दुओं की ओर से ही मिलता आया है। यह शायद इस बात की स्पष्ट सूचना है कि अस्पृश्यता की जड़ अच्छी तरह हिल गई है। इसके और प्रमाण तो बहुत हैं ही पर अंत्यज के साथ जहां रोटी तक का व्यवहार रखा जाता हो, वहां भी अपने को सनातनी मनाने वाले हिन्दू मदद दें, यह कोई छोटा प्रमाण नहीं माना जायेगा।
इसी मसले को लेकर आश्रम में हुए एक और सफाई, उसके बारे में उठे हुए नाजुक सवालों का निर्णय, कुछ अकल्पिक अड़चनों का स्वागत करना इत्यादि सत्य की खोज के सिलसिले में हुए प्रयोगों का वर्णन प्रस्तुत होने पर भी मुझे छोड़ देना पड़ रहा है, इसका मुझे दु:ख है। पर अब आगे के प्रकरणों में यह त्रुटि तो रहा ही करेगी। आवश्यक तथ्य मुझे छोडऩे पड़ेगे, क्योंकि उनमें हिस्सा लेने वाले पात्रों में से बहुतेरे आज मौजूद हैं और रजामंदी के बिना, उनके नामों का और उनके साथ घटित प्रसंगों का स्वतंत्रतापूर्वक उपयोग करना अनुचित जान पड़ता है। सबकी सम्मति समय-समय पर मंगवाना और उनसे संबंध रखने वाली बातों को उनके पास भेजकर सुधरवाना, यह हो सकने वाली बात नहीं है और यह आत्मकथा की मर्यादा के बाहर की बात है। इससे आगे की कथा, यद्यपि मेरी दृष्टि से सत्य के शोध के लिए जानने लायक है, फिर भी मुझे भय है कि अधूरी दी जाया करेगी। इतने पर भी असहयोग के युग तक ईश्वर पहुंचने दे तो पहुंच जाऊं, यह मेरी कामना और आशा है।

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