October 22, 2009

दीपदान की परंपरा


रोशनी का पर्व दीपावली में मिट्टी के दिए में तेल डालकर  दीपदान देने की परंपरा आज भी विभिन्न स्थानों में कायम है।  लक्ष्मी पूजा के दिन कन्याएं और विवाहित महिलाएं थाली में जलते हुए दीपों को आस- पड़ोस के घरों में बांटती हैं। दीपदान का यह व्यवहारिक रूप एक परिवार से दूसरे परिवार में चलता रहता है। इसके पीछे कारण यह है कि दीपदान को स्नेह और सदाचार की कामना का प्रतीक माना जाता है। अपने आस-पास दीपक को आलोकित करने से प्रसन्नता, समृद्धि तो बढ़ती ही साथ ही साथ सहयोग की भावना का भी विकास होता है। राजस्थान और मालवा में इस प्रकार के दीपदान का विशेष महत्व है। छत्तीसगढ़ के गांवों में भी बच्चे चाहे वह लड़का हो या लड़की मिट्टी अथवा चावल के आटे का दिया बनाकर घर- घर जाते हैं और तुलसी चौरे में रखे दीपक से अपने  साथ लाए दीपक को जलाकर वहीं रख देते हैं। हर घर में प्रकाश फैलाते हुए इन बच्चों को घर मालकिन पैसा, टॉफी या कोई अन्य वस्तु उपहार स्वरुप देती हैं।

गर्म होती धरती और कम होती फसल
तपती धरती के चलते बढ़ता समुद्र स्तर, पिघलते ग्लेशियर, अंटार्टिक का पिघलता बर्फ वगैरह तो
प्राय: समाचारों में छाए रहते हैं। मगर धरती के गर्म होने का फसल उत्पादन पर सीधा क्या असर होगा इसे लेकर अध्ययन अभी शुरू ही हुए हैं। ये अध्ययन बहुत आशाजनक तस्वीर नहीं बताते। उदाहरण के लिए, कोलंबिया विश्वविद्यालय के वोल्फ्राम श्लेंकर और नॉर्थ कैरोलिना राज्य विश्वविद्यालय के माइकल रॉबट्र्स ने हाल ही में 1950 से 2005 तक के मौसम पैटर्न और यूएस की तीन प्रमुख फसलों- मक्का, कपास और सोयाबीन- की उपज के परस्पर सम्बंधों का अध्ययन किया है। वे बताते हैं कि किसी वर्ष में फसल की उपज कितनी रहेगी इसका सबसे स्पष्ट सम्बंध इस बात से नजऱ आता है कि उस वर्ष कितनी बार तापमान 29 डिग्री सेल्सियस से ऊपर गया था और ऐसा ऊंचा तापमान कितने दिनों तक रहा था। तापमान 29 डिग्री सेल्सियस से कम रहे तो जितना गर्म हो उपज उतनी अच्छी होती है। मगर 29 डिग्री से ऊपर यही गर्मी नुकसानदायक साबित होती है। श्लेंकर और रॉबट्र्स ने इस बात का विश्लेषण करने के लिए डिग्री-दिन आंकड़े का उपयोग किया है। इसका मतलब होता है कि तापमान 29 डिग्री से कितना ऊपर गया और कितने समय तक ऊपर रहा। उन्होंने देखा कि फिलहाल यूएस में फसलों को ऐसे कुल 53 डिग्री-दिनों का सामना करना पड़ता है जब तापमान 29 डिग्री से ऊपर रहता है। यदि सब कुछ आज की तरह चलता रहा और वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड वृद्धि को रोकने के कोई उपाय न किए गए तो इस अध्ययन के मुताबिक इस सदी के अंत तक मक्का की उपज में 80 प्रतिशत तक की कमी आएगी। यदि कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन को घटाकर 1991 के स्तर से आधे पर लाया गया, जो लक्षित है, तो भी उपज में 30-46 प्रतिशत की कमी आने की आशंका है। भारत के लिए ऐसे अध्ययन नहीं हुए हैं। मगर गौरतलब बात यह है कि फिलहाल यूएस दुनिया का सबसे बड़ा मक्का व सोयाबीन उत्पादक व निर्यातक है। लिहाज़ा यदि यूएस में इनकी उपज कम होती है तो असर वहीं तक सीमित नहीं रहेगा।

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष