October 22, 2009

घोंसले में रहने वाला मेंढक

यह तो सभी जानते हैं पंक्षी घोंसला बनाते हैं, लेकिन क्या आपने घोंसला बनाने वाले मेढ़क के बारे में सुना है। भारत के एक वैज्ञानिक ने मेंढकों की तीन ऐसी दुर्लभ प्रजातियां ढूंढने का दावा किया है जो अपने अंडे देने के लिए घोंसले बनाते हैं।
मेंढक की ये प्रजातियां केरल और कर्नाटक की पश्चिमी पहाड़ी श्रंखलाओं के जंगलों में पाई जाती है जहां ख़ूब बारिश होती है।  दिल्ली विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ इनवॉयरोंमेंटल स्ट्डीज के वरिष्ठ वैज्ञानिक एसडी बीजू ने बताया कि पूरी दुनिया से इस तरह की यह पहली रिपोर्ट है और एशिया में इस तरह के मेंढक की यह एकमात्र प्रजाति है, जो कीटों और गर्मी से बचने के लिए घोंसला बनाता है। चमकीला हरा या हल्की लालिमा लिए हुए हरे रंग वाले विलुप्तप्राय प्रजाति के इस मेंढक को एक सदी के बाद फिर से खोज निकाला गया है जो एशिया भर में सिर्फ यहीं पाए जाते हैं
 इनका घोंसला 53 से 80 मिमी लंबा और 28-64 मिमी चौड़ा होता है, जिसमें एक साथ 43 से 72 अंडे समा सकते हंै। इस घोंसले को बनाने में मादा मेढ़क 15 मिनट से आधे घंटे का वक्त लेती है।
वैज्ञानिक को दुर्लभ प्रजाति के इन मेंढकों का पता 20 वर्ष के शोध के बाद चला है। वर्ष 2000 से 2005 के बीच केरल में वयनाड जिले के कलपेट्टा में किए गये इस अध्ययन की रिपोर्ट करेंट साइंस के नए अंक में प्रकाशित हुआ है।
क्या आपने खेले हैं ऐसे अनोखे खेल

जिंदगी में आनंद और उत्साह भरने की कला कोई फिनलैंड वासियों से सीखे। फिनलैंड वासियों ने अपने मनोरंजन के लिए अनेक ऐसे खेल ईजाद किए है जिनके बारे में सुनकर अन्य लोग सोच में पड़ जाते हैं, जैसे मोबाइल फोन थ्रोइंग गेम। पिछले दिनों फिनलैंड में मोबाइल फोन थ्रोइंग वल्र्ड चैम्पियनशिप आयोजित की गई। फिनलैंड में आयोजित की जाने वाली अन्य खेल प्रतियोगिताओं में वाइफ कैरीइंग रेस, बूट थ्रोइंग, सौना एन्ड्योरेस जैसे अनेक खेल शामिल है। खास बात यह है कि फिनलैंड वासियों के लिए ये प्रतियोगिताएं मजाक नहीं है, बल्कि इन खेल आयोजनों को लोग बड़ी गंभीरता से लेते है।
मोबाइल फोन थ्रोइंग प्रतियोगिता की शुरूआत वर्ष 2000 में फिनलैंड में अंतरराष्ट्रीय खेल के रूप में हुई। इसके बाद से हर साल इसके आयोजन का सिलसिला बरकरार है। इस खेल में यह देखा जाता है कि आपने कितनी दूरी से मोबाइल फोन फेंका है या उसे फेंकने की आपकी शैली कैसी है। इस खेल में हर प्रकार के मोबाइल फोन इस्तेमाल किए जा सकते है, बस शर्त यह है कि उनका वजन 220 ग्राम या उससे अधिक होना चाहिए।

वाइफ कैरीइंग चैम्पियनशिप  प्रतियोगिता में पुरूषों को अपनी पार्टनर को कंधे पर लादकर दौड़ लगानी होती है। इस रेस में पानी इत्यादि जैसी कुछ बाधाएं भी होती हैं, जिन्हें सफलतापूर्वक पार करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता।
 बूट थ्रोइंग वल्र्ड चैम्पियनशिप के दो बार आयोजक रहे हैरी किनूनन कहते है कि इस खेल की शुरूआत की कहानी तो ज्ञात नहीं है, पर मैं समझता हूं कि शराब के नशे में चूर कुछ लोगों ने अपने जूते उतार कर फेंके होंगे और जब उन्हें इसमें आनंद मिलने लगा, तो यह एक खेल बन गया। वर्ष 1992 में
फिनलैंड में प्रथम बूट थ्रोइंग वल्र्ड र्चैम्पियनशिप आयोजित की गई थी। धीरे-धीरे यह खेल ब्रिटेन और न्यूजीलैंड जैसे देशों में भी लोकप्रिय हो गया। इस खेल के नियम-कायदे सुनिश्चित करने का कार्य इंटरनेशनल बूट थ्रोइंग एसोसिएशन पर है। बूट थ्रोइंग गेम के लिए इटैलियन मैन्यूफैक्चरर द्वारा खास तौर पर जूते डिजाइन किए जाते है। इस खेल के दौरान इस संबंध में भी कड़ी नजर रखी जाती है कि खिलाडिय़ों ने निषेध वस्तुओं का सेवन तो नहीं किया। फिनलैंड में यह खेल काफी लोकप्रिय है।

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष