August 20, 2009

विविध रंगी पत्रिका

उदंती का मई-जून 2009 अंक मिला। प्रथम स्पर्श में ही  यह प्रकाशन बहुत रोचक व महत्वपूर्ण लगा। साहित्य के अलावा आपने जीवन और समाज से जुड़े अनेक बहुपयोगी विषयों को समाहित करके इस पत्रिका को पठनीय बनाया है। नितिन देसाई का यूनीकोड संबंधी लेख और मुकुंद कौशल के गीत बहुत अच्छे लगे। संपादकीय पारिवारिक संबंधों में जहर! बहुत चिंतनीय है। नए जीवनमूल्यों ने पारिवारिक विघटन की गति को शोचनीय स्थिति में ला खड़ा किया है। इस संदर्भ में समाज को सकारात्मक दिशा में उत्प्रेरित करने वाले लोगों तथा परिस्थितियों को तैयार करने की जरूरत है। विनोद साव का व्यंग्य पर केंद्रित स्तंभ बहुत रोचक है। आपको इतनी विविधरंगी पत्रिका निकालने के लिए बधाई और साधुवाद।               
- कैलाश मण्डेलकर, खण्डवा (मप्र)
मनोरंजक झरोखा 
पत्रिका अपने नाम के अनुरूप साहित्य-संस्कृति के अनेक पहलुओं को मनोरंजक झरोखा प्रस्तुत करती है। इलेक्ट्रानिक मीडिया और प्रिंट मीडिया पर समान रूप से पत्रिका का भविष्य उज्जवल हो यही शुभकामना है।
- राघव चेतन राय,पटपडग़ंज, दिल्ली
यूनीकोड ने दी पहचान 
उदंती के पिछले अंक में प्रकाशित नीतिन जे देसाई के लेख 'यूनीकोड से भारतीय भाषा को मिली विश्व स्तर पर पहचान' को पढ़कर पता चला कि यूनीकोड के प्रयोग से भारतीय भाषाओं की इंटरनेशनल लेवल पर पहचान बनने लगी है। लेख अच्छा लगा और भी ऐसे लेख दें।
- डॉ. जयजयराम आनंद, भोपाल
जहां रैगिंग नहीं होती 
अप्रैल अंक में अनकही के अंतर्गत आपने सही समय पर सही मुद्दा उठाया है। पिछले दिनों एक पुराने मित्र लाल्टू से, जो जाने माने कवि भी हैं, मुलाकात हुई। वे हैदराबाद में ट्रिपल आई टी प्रोफसर हैं। मेरे छोटा बेटा आई आई टी की तैयारी कर रहा है। इस संदर्भ में बात निकली तो उन्होंने बताया कि उनके संस्थान में रैगिंग जैसा कुछ नहीं होता। बल्कि छात्रों को पहले ही साल जीवनविद्या नामक एक कोर्स करवाया जाता है। जिसमें जीवन के विभिन्न तत्वों तथा जीवन मूल्यों का परिचय करवाया जाता है। मुझे लगता है अन्य संस्थानों को इस संस्थान से कुछ सबक लेना चाहिए।
- राजेश उत्साही, बैंगलोर
जूता डे भी मनाएंगे 
अविनाश वाचस्पति के 'जूते की जंग' पर प्रतिक्रिया
फिर देखना, जूते हर महफि़ल की शान बनेगें,
जूतो पर इम्तिहान में प्रश्न भी पूछें जाएंगें,
और साल में एक दिन सब जूता डे भी मनाएंगे।
    - विनोद कुमार पांडेय, बनारस (उत्तर प्रदेश)
खौफ का प्रतीक  
बुराई के खिलाफ अमर्यादित जंग का प्रतीक यह जूता सचमुच आज खौफ का प्रतीक बनता जा रहा है, पर कहीं ना कहीं हमें संयम की आवश्यकता है। और शायद नेताओं को संकेत में अब समझने की भी जरुरत है अन्यथा सवेदनहीनता किसी और स्वरूप में जनता के गुस्से के रूप में प्रगट हो सकती है। बधाई, बेहद शानदार, गद्य के साथ पद्य सा आनन्द।
- राकेश कुमार, rakesh.hirrimine@gmail.com
सदस्यता शुल्क  
उदंती का अंक देखकर खुशी हुई। उसका ठहराव और लिखावट बहुत अच्छी है। फोटोग्राफ भी चुनचुनकर लिये हैं। छत का पानी सालभर रासायनिक या सौर ऊर्जा से संयोजित रखने का तरीका आपको मिला तो जरूर बताना। सदस्यता शुल्क की जानकारी ऐसी जगह दे जहां सबकी नजर पड़ सकें और पत्रिका की सदस्यता लेने की संभावना बढ़ेगी।
- नन्दू अभ्यंकर, sanskrit@cheerful.com

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लेखकों से अनुरोध...

उदंती. com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी,कविता, गीत,गजल, व्यंग्य,निबंध,लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है।आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही साथी समाज सेवी संस्थाद्वारा संचालित स्कूलसाथी राऊंड टेबल गुरूकुल में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है।
शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से साथी राऊंड टेबल गुरूकुलके बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है।
अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर,तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में),क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर,पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर,जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ।
सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी,रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबाइल नं.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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