August 20, 2009

अहो देवी गंगा

देवी गंगा, देवी गंगा, लहर तुरंगा
 - प्रो. अश्विनी केशरवानी
छत्तीसगढ़ में मनाया जाने वाला भोजली का त्योहार मित्रता का वह पर्व है जिसे जीवन भर निभाने का संकल्प लिया जाता है। अपनी लहलहाती फसल को देखकर किसान एक ओर जहां प्रकृति के प्रति कृतज्ञयता ज्ञापन करता हैं तो दूसरी ओर गांव की बालाएं इस हरियाली को देखकर गीत गाती हैं, उसकी सेवा करती हैं।
श्रावण मास में जब प्रकृति अपने हरे परिधान में चारों ओर हरियाली बिखेरने लगती है तब कृषक अपने खेतों में बीज बोने के पश्चात् गांव के चौपाल में आल्हा के गीत गाने में मगन हो जाते हैं। इस समय अनेक लोक पर्वो का आगमन होता है और लोग उसे खुशी- खुशी मनाने में व्यस्त हो जाते हैं। इन्हीं त्योहारों में भोजली भी एक है। कृषक बालाएं प्रकृति देवी की आराधना करते हुए भोजली त्योहार मनाती हैं। अपने अपने घरों में वे टोकनी में मिट्टी भरकर भोजली उगाती हैं।  जिस प्रकार भोजली एक सप्ताह के भीतर खूब बढ़ जाती है, उसी प्रकार हमारे खेतों में फसल दिन दूनी रात चौगुनी हो जाये... कहते हुए जैसे वे भविष्यवाणी करती हैं कि इस बार फसल लहलहायेगी। और वे सुरीले स्वर में गा उठती हैं - 
अहो देवी गंगा ! देवी गंगा, देवी गंगा, लहर तुरंगा,
हमर भोजली दाई के भीजे आठों अंगा।
अर्थात् हमारे प्रदेश में कभी सूखा न पड़े। वे आगे कहती हैं-
आई गईस पूरा, बोहाइ गइस कचरा।
हमरो भोजली दाई के, सोन सोन के अचरा।।
 गंगा माई के आगमन से उनकी भोजली देवी का आंचल स्वर्ण रूपी हो गया। अर्थात् खेत में फसल तैयार हो रही है और धान के खेतों में लहलहाते हुए पीले-पीले बाली आंखों के सामने नाचने लगती है। कृषक बालाएं कल्पना करने लगती हैं-
आई गईस पूरा, बोहाइ गइस मलगी।
हमरो भोजली दाई के सोन सोन के कलगी।।
यहां पर धान के पके हुए गुच्छों से युक्त फसल की तुलना स्वर्ण की कलगी से की गई है। उनकी कल्पना सौष्ठव की पराकाष्ठा पर पहुंच जाती है। फसल पकने के बाद क्या होता है देखिये उसकी एक बानगी -
कुटी डारेन धाने, छरी डारेन भूसा।
लइके लइके हवन भोजली झनि होहा गुस्सा।।
अर्थात् खेत से धान लाकर कूट लिए, इससे हरहर चांवल और भूसा अलग अलग कर लिए हैं। चंूकि यह नन्ही-नन्ही बालिकाओं के द्वारा किया गया है, अत: संभव है कुछ भूल हो गई हो? इसलिए नम्रता पूर्वक वे क्षमा मांग रही हैं। 'झनि होहा गुस्सा' (गुस्सा मत होना) और यह भी कि बांस के कोठे में रखा हुआ अनाज कैसा है इसके बारे में वे कहती हैं-
बांसे के टोढ़ी मा धरि पारेन चांउर,
महर महर करे भोजली के राउर।
समस्त फसलों के राजा धान को बालिका ने बांस के कोठे में रख दिया है जिसके कारण उनकी सुंदर महक चारों ओर फैल रही है। छत्तीसगढ़ में कृषकों का जीवन धान की खेती पर ही अवलंबित होता है अत: यदि फसल अच्छी हो जाये तो वर्ष भर आनंद ही आनंद होगा अन्यथा दुख के सिवाय उनको कुछ नहीं मिलेगा। फिर धान केवल वस्तु मात्र तो नहीं है, वह तो उनके जीवन में देवी के रूप में भी है। इसीलिए तो भोजली देवी के रूप में उसका स्वागत हो रहा है -
सोने के कलसा, गंगा जल पानी,
हमरों भोजली दाई के पैया पखारी।
सोने के दिया कपूर के बाती,
हमरो
भोजली दाई
के उतारी 
आरती।।
अर्थात सोने के कलश और गंगा के जल से ही कृषक बाला उनके पांव पखारेंगी। जब जल कलश सोने का है तो आरती उतारने का दीपक भी सोने का होंना चाहिए। कल्पना और भाव की उत्कृष्टता पग पग पर छलछला रही है... देखिये उनका भाव -
जल बिन मछरी, पवन बिन धान,
सेवा बिन भोजली के तरथते प्रान।
जब भोली देवी की सेवा-अर्चना की है तो वरदान भी चाहिये लेकिन अपने लिए नहीं बल्कि अपने भाई और भतीजों के लिए, देखिये एक बानगी -
गंगा गोसाई गजब झनि करिहा,
भइया अऊ भतीजा ला अमर देके जइहा।
भारतीय संस्कृति का निचोड़ मानों यह कृषक बाला है,    
भाई के प्रति सहज, स्वाभाविक, त्यागमय अनुराग की प्रत्यक्ष मूर्ति! 'देवी गंगा देवी गंगाÓ की टेक मानों वह कल्याणमयी पुकार हो जो जन-जन, ग्राम ग्राम को नित 'लहर तुरंगाÓ से ओतप्रोत कर दे। सब ओर अच्छी वर्षा हो, फसल अच्छी हो और चारों ओर खुशहाली ही खुशहाली हो...!
छत्तीसगढ़ में भोजली का त्योहार रक्षा बंधन के दूसरे दिन मनाया जाता है। इस दिन संध्या 4 बजे भोजली लेकर गांव की बालिकाएं गांव के चौपाल में इकट्ठा होती हैं और बाजे गाजे के साथ वे भोजली लेकर जुलूस की शक्ल में पूरे गांव में घूमती हैं।
वे गांव का भ्रमण करते हुए गांव के गौंटिया/ मालगुजार के घर जाते हैं जहां उसकी आरती उतारी जाती है फिर भोजली का जुलूस नदी अथवा तालाब में विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। नदी अथवा तालाब के घाट को पानी से भिगोकर धोया जाता है  फिर भोजली को वहां रखकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है और तब उसका जल में विसर्जन किया जाता है। इस अवसर पर ग्रामीण बालाएं नये-नये परिधान धारण कर भोजली को हाथ  अथवा सिर में टोकनी में रख कर लाती हैं। वे मधुर कंठ से भोजली गीत गाते हुए आगे बढ़ती हैं। भोजली की बालियों को मंदिरों में चढ़ाया जाता है।
 इस दिन की खास बात यह है कि वे अपनी समवयस्क बालाओं के कान में भोजली की बाली (खोंचकर) लगाकर 'भोजली' अथवा 'गींया' (मित्र) बदने की प्राचीन परंपरा है। जिनसे भोजली अथवा गींया बदा जाता है उसका नाम वे जीवन भर अपनी जुबान से नहीं लेते और उन्हें भोजली अथवा गींया संबोधित करके पुकारते हं। माता-पिता भी उन्हें अपने बच्चों से बढ़कर मानते हैं। उन्हें हर पर्व और त्योहार में आमंत्रित कर सम्मान देते हैं।
मित्रता के इस महत्व के अलावा वे घर और गांव में अपने से बड़ों को भोजली की बाली देकर उनका आशीर्वाद लेती हैं तथा अपने से छोटों के प्रति अपना स्नेह प्रकट करती हैं। भोजली, छत्तीसगढ़ में मैत्री का ऐसा सुंदर और पारंपरिक त्योहार है, जिसे आज के युवाओं द्वारा मनाए जाने वाले फ्रेंडशिप डे के मुकाबले कई सौ गुना बेहतर कहा जा सकता है। भोजली बदकर की गई दोस्ती मरते दम तक नहीं टूटती जबकि फ्रेंडशिप डे मात्र एक दिन के लिए मौज- मस्ती करने वाली दिखावे की दोस्ती होती है।
संपर्क- प्रो. अश्विनी केशरवानी, राघव, डागा कालोनी,
चांपा-495671(छग)

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