August 20, 2009

खूबसूरत आंखों वाला मोर

बादलों के गरजने की आवाज सुनकर तो वह पागलों की तरह जोर-जोर से पुकारता है। आसमान पर बादल छाए रहने पर मोर नाचता है। मोर का नाचना बड़ा चित्ताकर्षक होता है। उसकी पूंछ पर नीले-सुनहरे रंग के चंद्राकार निशान होते हैं। नाचते समय परों के मेहराब पर ये निशान बड़े मनमोहक लगते हैं।
- बालसुब्रमण्यम
 लगभग सभी लोगों ने मोर को कभी न कभी देखा होगा। मोर यानी खूबसूरत आंखों वाला सुंदर नीला-हरा भारतीय पक्षी। मोर भारत का मूल निवासी है। भारत ने 1963 में इस आकर्षक पक्षी को राष्ट्रीय पक्षी के रूप में गौरवान्वित किया और उसके शिकार पर रोक लगा दी।
मोर बड़े आकार का पक्षी है। इसलिए वह उड़ता कम है और चलता या दौड़ता अधिक। कुछ-कुछ डरपोक स्वभाव का यह पक्षी सर्वभक्षी है और फल, फूल, अनाज, बीज, घास, पत्ती, कीड़े-मकोड़े और छोटे जीवों को खाता है। वह सांपों का बड़ा दुश्मन है। कहावत भी है कि जहां मोर की आवाज सुनाई पड़ती है, वहां नाग नहीं जाता। किसानों का वह अच्छा मित्र है। मोर आसानी से पालतू बन जाता है।
मोर को गरमी और प्यास बहुत सताती है। इसलिए नदी के किनारे के क्षेत्रों में रहना उसे अच्छा लगता है। बर्फीले स्थानों में रहना उसे पसंद नहीं है। भारत में मोर हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और खासकर चित्रकूट और वृंदावन में पाया जाता है। तमिलनाडु में कार्तिकेय भगवान के मंदिरों में मोर रहते हैं क्योंकि कार्तिकेय भगवान का वह वाहन है। वह संसार के अन्य देशों में भी पाया जाता है जैसे बर्मा, पाकिस्तान, वियतनाम तथा अफ्रीका के अनेक देश। वियतनाम में पाए जाने वाले मोर की गर्दन काली होती है।
भगवान ने मोर को सुंदरता और आकर्षण दिया है लेकिन आवाज में मिठास नहीं रखी। वह सुबह-सुबह बड़ी जोर से अपनी कर्कश आवाज में बोलना शुरू करता है। बादलों के गरजने की आवाज सुनकर तो वह पागलों की तरह जोर-जोर से पुकारता है। आसमान पर बादल छाए रहने पर मोर नाचता है। मोर का नाचना बड़ा चित्ताकर्षक होता है। उसकी पूंछ पर नीले-सुनहरे रंग के चंद्राकार निशान होते हैं। नाचते समय परों के मेहराब पर ये निशान बड़े मनमोहक लगते हैं। प्रकृति ने मोर के पर जितने आकर्षक बनाए हैं, उसके पैर उतने ही बदसूरत। कहा जाता है कि नाचते समय अपना पांव दिख जाने पर मोर नाचना बंद कर देता है। मोर की आंखें तेजस्वी होती हैं। मोर को तैरना नहीं आता।
इतिहास में मोर को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। मौर्य वंश का नाम उसी पर पड़ा बताया जाता है। मौर्य सम्राटों की रसोई में रोज दो मोर पकाए जाते थे। इस परंपरा को अहिंसाप्रिय अशोक ने बंद करवा दिया। मौर्यों के सिक्कों पर भी मोर के चिह्न अंकित हैं। विद्यादात्री मां सरस्वती को भी यह पक्षी अति प्रिय है। भगवान कृष्ण के मुकुट पर मोर के पर सदा लगे रहने के कारण उन्हें मोरमुकुटधारी कहा जाता है।
पशु-पक्षियों में मादा की अपेक्षा नर बहुधा अधिक सुंदर होते हैं। मोर के साथ भी यही बात है। आकर्षक रंग, लंबी पूंछ, माथे पर राजमुकुट सी बड़ी कलगी आदि सारी व्यवस्थाएं नरों तक सीमित हैं। मोरनी में सुंदरता के अभाव का एक जबरदस्त प्राकृतिक कारण है। खूबसूरती और आकर्षण के अभाव में वह आसानी से नहीं दिखती है। इस तरह अंडा सेते समय वह दुश्मन की नजर से बची रहती है।
मोर पेड़ों की डालियों पर खड़े-खड़े सोते हैं। मोरनी साल में एक बार जनवरी से अक्टूबर के बीच अंडे देती है। अंडों का रंग सफेद होता है। उनकी संख्या एक बार में चार से आठ तक होती है। अंडा सेने की जिम्मेदारी अकेले मोरनी को पूरी करनी पड़ती है। पालतू मोर के अंडों को सेने का काम मुर्गियों से भी कराया जाता है। बचपन में नर और मादा मोर की अलग-अलग पहचान नहीं हो सकती। एक साल का होने पर नर की पूंछ लंबी होने लगती है। बच्चों के कुछ बड़े होने पर उनके सिर पर कलगी आती है।
मोर का दवा के रूप में भी उपयोग किया जाता है। मोर के मरने के उपरांत मोर तेल तैयार किया जाता है। मोर के परों को जलाकर प्राप्त की गई भस्म को शहद के साथ खाने से खांसी बंद हो जाती है। दुनिया के सुंदर पक्षियों में मोर का अपना एक अलग स्थान है। सुंदरता केवल परों या रंगों की ही नहीं होती। मोर के आचरण और व्यक्तित्व में भी सुंदरता पाई जाती है।

1 Comment:

सहज साहित्य said...

लेख उत्तम है। रचनाओं का चयन सराहनीय है ।
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

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