July 18, 2009

जीवन के रहस्य तलाशती: रश्मि भल्ला

जीवन के रहस्य तलाशती: रश्मि भल्ला
रंग संसार के कला जगत में अपनी एक अलग पहचान बना चुकी रश्मि के लिए कला परमानंद है। उन्होंने अपने कार्य अपने कौशल से सभी को रिझा दिया है। आर्ट एंड क्राफ्ट की कई विधाओं में कार्य कर चुकी रश्मि के लिए कोई भी विधा कठिन नहीं है, लेकिन चित्रकला में वे सुकून पाती हैं। एब्सट्रेक्ट आर्ट की भाषा उन्हें अपनी बोली सी लगती है।
रश्मि के चित्र जीवन के गहरे रहस्य के साथ सुख दुख को भी अपने अंदर समेटे हुए हैं। रश्मि कहती हैं जीवन के रंग खट्टे-मीठे फल की तरह प्रकृति के भीतर बिखरे पड़े है । यही वजह है कि विभिन्न चटख रंगों से सजे रश्मि के चित्र प्रकृति के सौंदर्य को अपने भीतर समेटे हुए जान पड़ते हैं। गत वर्ष उन्होंने एक कला श्रृंखला में प्रकृति पर केंद्रित लगभग 100 चित्र बनाएं हैं।
रश्मि के अनुसार मानव के हर प्रश्न का जवाब प्रकृति के पास है। समय के फेर में पड़कर व्यक्ति  जीवन के इस रंग को झुठलाने की कोशिश करता है तथा यथाशीघ्र बहुत कुछ पाने की इच्छा जीवन को और अधिक जटिल बना देती है, जीवन की इसी जटिलता को रश्मि अपने चित्रों के माध्यम से बेहद सरलता से समझा देती हैं। वे कहती हैं सरलता जीवन के हर पहलू में है और इसी सरलता में सफलता छिपी है। 
इसी प्रकार जीवन में ढेरों सवाल है और उनके ढेरों अनोखे जवाब। रश्मि के बनाए अमूर्त चित्रों में इन सवाल-जवाब को महसूस किया जा सकता है। रश्मि अपने अमूर्त चित्रकला से बदलती दुनिया को परिचित कराने की कोशिश कर रही हैं।  उनका कहना है कि चत्रकारी में तब तक कोई आनंद नहीं होता जब तक कला एवं कलाकार  के बीच भावनात्मक जुड़ाव नहीं होता। मूर्त और अमूर्त चित्रकला के बारे में उनका कहना है कि मूर्त एक निर्धारित प्रसन्नता पैदा
करने की क्षमता रखता है और अमूर्त अनन्त प्रसन्नता पैदा कर देता है।
अभिव्यक्ति के लिए चित्रकला ही क्यों? वे कहती हैं- मन की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का चित्रकारी एक बेहद आसान माध्यम है। लोग कहते हैं कि हमें चित्रकारी नहीं आती और वे पीछे हट जाते हैं। ऐसे लोगों को गुफाओं में जाकर चित्रकारी का क, ख, ग सीख लेना चाहिए, दरअसल कुछ भी पाने के लिए लगन और जिगर की जरूरत होती है। चित्रकारी सम्पूर्ण ब्रहण्ड की भाषा है जिसे आंखों से पढ़ा जाता है। रश्मि के चित्रों को भी हम कहानी की तरह आसानी से पढ़ सकते हैं।
बचपन में खेलों में रूचि रखने वाली रश्मि अपनी मां को सिलाई-बुनाई, कढ़ाई करते हुए देखा करती थी तभी से कला के प्रति उनका रूझान जागा। 'मेरी रूचि देखकर मां ने मुझे चित्र बनाने के लिए प्रेरित किया। रंगों के लिए मुझे सोचना नहीं पड़ता लेकिन फिर भी मुझे नीला रंग सबसे ज्यादा आकर्षित करता है। पिछले दिनों मैं भिलाई स्टील प्लांट घूमने गई थी अत: आजकल प्लांट को ही अपना विषय बनाकर काम कर रही हूं।' बच्चों के साथ काम करना मुझे बहुत अच्छा लगता है। इसी उम्र में हम बच्चों को सही आकार में ढाल सकते हैं। अपने अमूर्त चित्रों के बारे में उनका कहना है कि हर इंसान के जीवन में तनाव होता है और इस तनाव को एक महिला सबसे ज्यादा अनुभव कर सकती है। मैंने अपने चित्रों में इसी अनुभव को ढालने का प्रयास किया है। 
रश्मि आर्डर पर भी काम करती है। उन्होंने भगवान के चित्र भी आर्डर पर बनाएं है। जैसे लक्ष्मी, गणेश, सरस्वती। शिव पर भी उन्होंने काम किया है। चित्रों का अपने जीवन में महत्व के बारे में रश्मि का कहना है कि जब हम नेचर में जाते हैं तो एक शांति का अनुभव होता है चित्र भी उसी तरह का शांति प्रदान करते हैं। भिलाई के कृष्णा पब्लिक स्कूल में चित्रकला की अध्यापिका रश्मि जिंदगी को रंगों की तरह खुशनुमा बनाना चाहती हैं। (उदंती)
परिचय 
 16 फरवरी 1974 को जन्मी रश्मि भल्ला ने बीएससी (बायो), एमए (अर्थशास्त्र), मल्टीमीडिया कोर्स, इंटरमीडिएट जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट मुम्बई से किया है। भिलाई के नेहरू आर्ट गैलरी में गु्रप प्रदर्शनी के साथ तीन एकल प्रदर्शनी। नेहरू आर्ट गैलरी में पेटिंग और स्कलप्चर का संग्रह। साउथ सेंट्रल जोन कल्चरल सेंटर नागपुर एवं ललित कला अकादमी दिल्ली में भागीदारी। विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित  रश्मि का  ज्यादातर समय अपने हॉबी आर्ट स्कूल में बितता है जिसे वे स्वयं संचालित करती है। पता - हॉबी आर्ट स्कूल, 106, लक्ष्मी कॉम्प्लेक्स, रिसाली, भिलाई। मोबाइल : 9229477679 Email- rashmi16.2009@rediffmail.com

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष