July 18, 2009

डलहौजी कुदरत का सुन्दर नजारा

- अशोक सरीन
जिस प्रकार हिमाचल प्रदेश के शिमला नगर को बसाने का श्रेय लेफ्टिनेंट रास (1819) व ले. कैंडी 1821 को जाता है। उसी तरह डलहौजी जैसे जंगली क्षेत्र को लार्ड डलहौजी (1854) ने बसाकर अंग्रेजों की ठण्डे पहाड़ और एकांत स्थल में रहने की इच्छा को पूरा किया।
सन् 1850 में चंबा नरेश और ब्रिटिश शासकों के बीच डलहौजी के लिए एक पट्टे पर हस्ताक्षर हुए थे। लार्ड डलहौजी यहां रहने वाले पहले व्यक्ति थे। उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम डलहौजी रखा गया।
समुद्रतल से 2039 मीटर ऊंचाई पर स्थित डलहौजी 13 किमी में फैला एक ऐसा हरयावल टापू है जहां कुछ दिन गुजारना स्वयं में अनोखा अनुभव है। पांच पहाडिय़ों बेलम, काठगोल, पोटरेन, टिहरी और बकरोता से घिरा डलहौजी सुन्दर और स्वच्छ शहर है। यहां हिन्दी, पंजाबी, तिब्बती और अंग्रेजी भाषी लोग रहते हैं।
डलहौजी देवदार के घने जंगलों में घिरा हिमाचल का प्रमुख पर्यटक स्थल है। यहां की ऊंची-नीची पहाडिय़ों पर घूमते हुए पर्यटक रोमांचित हो उठता है। पहाडिय़ों के बीच कल-कल बहती चिनाब, ब्यास और राबी नदियां, दूर-दूर तक फैली बर्फीली चोटियां डलहौजी की रमणीयता को चार चांद लगा देती है। पंडित जवाहर लाल नेहरू को डलहौजी बहुत पसंद था। वे इसे हिमाचल की गुलमर्ग कहते थे।
सत्तधारा - डलहौजी से डेढ़ किलोमीटर दूर सतधारा नाम का चश्मा है। पहले यहां सात धाराएं बहती थीं पर अब एक मोटी दार ही रह गई है। यह जल कई रोगों को निवारण करता है। यहां पर्यटक विभाग का कैफेटेरिया है जहां पर्यटक चाय नाश्ता कर तरोताजा होते है।
पंचपुला - यहां के बड़े डाकघर से दो किमी की दूरी पर स्थित पंचपुला एक सुंंदर सैरगाह है। पंचपुला का अर्थ है पांच पुल। इन छोटे-छोटे पांच पुलों के नीचे से कल-कल बहती जलधारा देखने योग्य है। यहां एक प्राकृतिक जलकुंड भी है, जिसके निर्मल जल में चमकते पत्थर बहुत आकर्षक लगते हैं।
अजीत सिंह की समाधि - डलहौजी का विशेष आकर्षण बीसवी शताब्दी के पितामह अजीत सिंह की समाधि है। सन् 1905 में जब सारे पंजाब की पुलिस उनके पीछे लगी थी तब अजीत सिंह, जो शहीद भगत सिंह के चाचा थे, मुसलमान के वेष में यहां पहुंचे थे। यहीं के काबुल के रास्ते ईरान, इटली, ब्राजील में देश की सेवा करते रहे। चालीस वर्षों तक देश के बाहर रहने के बाद 1946 में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें स्वदेश बुला लिया। 14 अगस्त 1947 को अजीत सिंह डलहौजी में थे। उन्होंने रात 12 बजे भारत के स्वतंत्र होने की घोषणा सुनी और सुबह पांच बजे शरीर त्याग दिया। अजीत सिंह की समाधि आज भी देश प्रेमियों को उस बहादुर सपूत की याद दिलाती है।
कालाटोप - पर्यटकों के लिए डलहौजी से आठ किमी दूर और समुद्रतल से 2440 मीटर ऊंचाई पर स्थित कालाटोप सर्वोत्तम पिकनिक स्थल है। कालाटोप के प्राकृतिक दुश्य बड़े मनोरम लगते हैं। यहां भौंकने वाला हिरण और काले भालू देखने को मिलते हैं। कालाटोप तक पहुंचने के लिए सड़क मार्ग और रहने के लिए वन विभाग का विश्राम गृह है।
बकरोता की पहाडिय़ां - डलहौजी से पांच किमी दूर 2085 मी ऊंचाई पर बकरोता पहाडिय़ों से हिमाच्छादित चांदी से चमकते पहाड़ देखने में बड़े सुन्दर लगते हैं। प्रकृति प्रेमी इन्हें देख रोमांचित हो उठते है।
डायन कुंड - डलहौजी से दस किलोमीटर दूर 2750 मीटर ऊंचाई पर डायन कुंड स्थित है। यहां चिनाब, ब्यास और रावी नदियां पास-पास बहती है। तीनों नदियों का सांप की तरह बलखाकर बहना सैलानियों को आश्चर्य चकित कर देता है। कुदरत का ऐसा सुन्दर नजारा शायद ही कहीं अन्यत्र देखने को मिले।
सुभाष बावली - आजाद हिन्द फौज के कर्मठ नेता सुभाष चन्द्र बोस के खिलाफ कलकत्ता की प्रेसीडेंसी जेल में विष देकर उन्हेें मार देने का अंग्रेजों द्वारा सुनियोजित षडय़ंत्र चलाया जा रहा था। जब ब्रिटिश सरकार को उनकी बीमारी की सूचना मिली। तब उन्हें कुछ समय के लिए पैरोल पर रिहा किया गया। डलहौजी में नेता सुभाष बावली है। इसके पास ही नेता जी की याद में सुभाष चौक बनाया गया है। डलहौजी से यह स्थान एक किलोमीटर दूर है।
खजियार - पर्यटक डलहौजी घूमने आए और खजियार न जाए तो यात्रा अधूरी रहेगी। समुद्रतल से 1890 मीटर ऊंचाई पर स्थित खजियार पर्यटकों के लिए प्रकृति का अनुपम उपहार है। देवदार के घने ऊंचे वृक्षों के बीच डेढ़ किलोमीटर लंबा और एक किलोमीटर चौड़ा तश्तरीनुमा हरा-भरा मखमली घास का मैदान और बीच में छोटी सी झील के सौंदर्य को पर्यटक निर्मिमेष सा देखता रह जाता है।
इन्हीं विशेषताओं के कारण 7 जुलाई 1992 के दिन स्विटजरलैंड के राज प्रतिनिधि टी बलेजर ने खजियार को मिनी स्विटजरलैंड के रूप में नामांकित किया था। खजियार को विश्व का 160 वां मिनी स्विटजरलैंड होने का गौरव प्राप्त है। डलहौजी से खजियार 27 किमी दूर है। यहां रात ठहरने और खाने पीने के लिए भव्य होटल और पर्ण कुटीरें हैं।
डलहौजी में जहां कई दर्शनीय स्थल है वहीं यहां देस के जाने-माने लोगों की यादें रची बसी है। सन् 1883 में देश के महान कवि एवं शिक्षक गुरुवर रविन्द्रनाथ टैगोर यहां रहे थे और उन्होंने डलहौजी के नैसर्गिक सौंदर्य पर मुग्ध होकर एक कविता लिखी थी।
सन् 1925 में स्व. जवाहर लाल नेहरू अपने परिवार के साथ यहां रायजादा हंस राज की कोठी में ठहरे थे। पंजाबी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक नानक सिंह ने अपनी जीवन का काफी साहित्य इस शांत पहाड़ी शहर
में लिखा।
पता-सिटी लाईट प्रिंट3र्ज, पालमपुर-176061, कांगड़ा (हि.प्र.)
कैसे पहुंचे
निकटतम हवाई अड्डा- कागंरा से 140 किमी, अमृतसर से 192 व जम्मू से 190 किमी। रेल्वे स्टेशन- पठानकोट से 80 किमी। सड़क मार्ग- दिल्ली चंडीगढ़, पठानकोट, शिमला आदि स्थानों से नियमित बसें उपलब्ध। डलहौजी में कहां ठहरें-डलहौजी में समस्त सुविधाओं से युक्त डीलक्स पांच सितारे होटलों से लेकर मध्यम श्रेणी वाले होटलों तथा गेस्ट हाउसों की श्रृंखला उपलब्ध है। 
डलहौजी कब जायें- उपयुक्त समय - अप्रैल से नवंबर तक।
प्रदेश के पर्यटन विभाग से क्षेत्र का नक्शा व ब्रोशर
प्राप्त कर सकते हैं।

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
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