July 17, 2009

महंगाई का अभिशाप

 आपकी पत्रिका में कला संस्कृति, साहित्य एवं अन्य सामाजिक -राजनीतिक मुद्दों पर समावेश होता है जो प्रशंसनीय है। इसी तरह कभी-कभी आर्थिक मुद्दों पर भी बात करें तो पत्रिका में पूर्णता आएगी। मंदी का दौर कब तक रहेगा यह कहना जरा मुश्किल है। मूल्य की अधिकता के लिए केवल सर्वोत्तम को कोसना उचित नहीं वस्तुत: आज महंगाई का अभिशाप समूचे समाज को व्याप्त कर अपाहिज बना रहा है।
- आशा शर्मा, रायपुर
संग्रहणीय अंक
बहुत ही आकर्षक कलेवर , पठनीय रचनाओं और श्री खेम वैष्णव के रेखा चित्रों से सुसज्जित उदंती का अप्रैल अंक मिला। मुझे ख़ुशी है की इस अंक में मेरी रचना प्रकाशित हुई है। परिंदों की गुनगुनाहट को सत्यनारायण भटनागर ने बहुत ही सुन्दर तरीके से चित्रित किया है। स्कूल और कालेजों में रैगिंग का नहीं रुकना चिंतनीय है। भाई अनुपम मिश्र  ने पानी के मोल को अच्छे से समझाने का प्रयास किया है। लिंकन वर्सेस केनेडी रोचक जानकारी से युक्त है। वाइल्ड लाइफ के अन्र्तगत जंगली भैसों तथा मंदी और महिलाएं लेख तथा माटी समाज सेवी संस्था की पहल पसंद आई। कुल मिलकर पूरा अंक संग्रहणीय है।
 - प्रो. अश्विनी केशरवानी, डागा कालोनी, चांपा
सुघड़ मुद्रण ...
उदंती का अंक प्राप्त हुआ। सुघड़ मुद्रण, चुस्त-दुरुस्त संपादन हेतु बधाई व सुंदर भविष्य की शुभकामना।
                        - डॉ. कुसुम खेमानी, कोलकाता
सही मुद्दा
अप्रैल के अंक में अनकही के अंतर्गत  रैगिंग को लेकर सही मुद्दा उठाया गया है, लेख प्रभावशाली है... आशा है कि आने वाले समय मे निश्चित तौर पर रैगिंग पर अंकुश लगेगा, यह एक तरह से घोर निन्दनीय कृत्य है, अमानवीय हरकत करने वाले छात्रों को कठोर दण्ड मिलना चाहिये। संग्रह प्रसंशनीय हैं जिसमें अभिव्यक्तियां प्रभावशाली हैं। सारगर्भित विषयों पर लेख निश्चिततौर पर पत्रिका को चार-चांद लगा रहे हैं। शुभकामनाएं।
- श्याम कोरी 'उदय', बिलासपुर
         श्रेष्ठ होने की ...
ईश्वर के समक्ष पहली उद्घोषणा है भाषा, मनुष्य के नियंता और रचयिता होने की, समूची सृष्टि में अपने श्रेष्ठ होने की ... कवि ने अपनी कविता में भाषा को लेकर बहुत बढिय़ा लिखा है।
                -प्रदीप कांत, kantv®®}@yahoo.co.in
सुधार की उम्मीद 
नदी एक भाषा है बहुत सुंदर कविता है, बिल्कुल महानदी की तरह छलछलाती हुयी। शिक्षण संस्थानों में रैगिंग का वाइरस यह एक विचारणीय सत्य है। इसके साथ ही हमने अपनी धरती को कचरे का डब्बा बना दिया है में लेखक ने एक सही बात कही है अक्सर रेल्वे स्टेशन में बहुत लोगों को कबाड़ इधर-उधर फ़ेकते मैं भी देखता हूं। कभी मैं भी फ़ेंका करता था, मगर अब नहीं फेंकता इसलिये दूसरो से भी सुधार की उम्मीद की जा सकती है।
- दीपक शर्मा, कुवैत
ताजा हवा के झोंके की तरह ...
नदियों से रवानी, पहाड़ों से ऊंचाई, परिन्दों से उड़ान और आसमान से आजादी की ललक समेटती, जंगल-जंगल पगडंडियां बजाती रूप की आदिम तृष्णा का सम्मान करती, झरनों के महीन रव में अपनी आवाज मिलाती हुई उदंती ने मुझे ताजा हवा के झोंके की तरह छुआ। मैं रूई से हल्की हो गई।  उदन्ती वो प्यास है जो पानी की रचना करती है। 44' वनक्षेत्र से सजे छत्तीसगढ़ का दर्पण है एक गीत है जो आठों पहर गुनगुनाया जा सकता है। मुझे पूरा विश्वास है कि बाजारवादी ताकतों की गिरफ्त में छटपटाता, उत्तोत्तर हाशिए पर जाता हुआ साहित्य उदंती जैसी पत्रिकाओं के जरिए ही संरक्षित हो सकेगा। मुझे भी आता है गुस्सा जन सारोकारों की तीव्र अभिव्यक्ति है। मुझे महिलाओं के हक में सोचने की आदत है मैं चाहूंगी कि उदंती छत्तीसगढ़ की महिला शख्सियतों के बारे में धारावाहिक रूप से प्रस्तुति दे। नागपुर के 47 डिग्री तापमान में उदंती पढ़कर लगा कि किसी छतनार के नीचे हूं।
 - इंदिरा किसलय, नागपुर

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