August 18, 2018

अनकही

सबकी नज़रें युवाओं पर...
-डॉ.रत्ना वर्मा
युवा देश का भविष्य हैं, देश की आन-बान शान युवाओं के कंधों पर है, देश का विकास भी युवाओं के हाथ में हैं, कहते हुए हमारे महापुरुष युवा शक्ति को एक ऐसा दर्जा देते हैं कि भारत की जनता इस युवा शक्ति के आगे नतमस्तक हो जाती है और हो भी क्यों न; क्योंकि इन्हीं युवाओं के कंधों पर तो भारत की सीमाओं की रक्षा का भार है, जो अपने वतन की रक्षा के लिए अपनी जान की परवाह न करते हुए हँसते-हँसते सीने पर गोली खाते हैं और देशवासियों की सुख- शांति के लिए शहीद हो जाते हैं।
 एक ओर तो हमारे वे युवा हैं, जिनपर हमें गर्व है; दूसरी ओर वे युवा भी हैं, जो अपनी ताकत का दुरुपयोग करते हुए अपने ही देश का नुकसान करने पर उतारू हो जाते हैंआखिर ऐसी कौ-सी शक्ति है, जो इन युवाओं को हिंसा और अपराध की दुनिया में ढकेल देती है?किसके सिखाए मार्ग पर चलते हुए वे कुमार्ग पर चल पड़ते हैं? माता- पिता तो अपने हर बच्चे का पालन पोषण उसे एक अच्छा इंसान बनाने के लिए ही करते हैं: फिर कहाँ गड़बड़ी हो जाती है? कहीं ऐसा तो नहीं ,जो दुनिया हम बना रहे हैं, हमारे बच्चों को अतिमहत्त्वाकांक्षी बना रही है, वे बहुत अधिक पाने की चाह में गलत रास्तों पर चल पड़ते हैं और धीरे- धीरे उनकी यह महत्त्वाकांक्षा एक आदत बन जाती है? इन सबका परिणाम यह होता है कि ऐसे माता-पिता अपने बच्चों का पालन- पोषण अपनी उसी महत्त्वाकांक्षा के अनुसार करते हैं और वह बच्चा बड़ा होकर उन रास्तों पर चल पड़ता है, जिसका पता उनके माता- पिता को भी नहीं चल पाता।
 इन सबके लिए सिर्फ पालन- पोषण को जिम्मेदारनहीं ठहराया जा सकता। हमारी समूची व्यवस्था ही इसके लिए जिम्मेदार है। सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक परिवेश एक युवा को अच्छे और बुरे साँचे में ढालने का जिम्मेदार होता है। सबसे पहले तो शिक्षा व्यवस्था को लें- एक तो प्राथमिक स्तर से ही बच्चों के पढ़ाने में इतना अंतर होता है कि भेदभाव की भावना उसी समय से भरनी शुरू हो जाती है। एक ओर जहाँ शासकीय और निजी स्कूलों में शिक्षा के स्तर में जमीन- आसमान के अंतर ने हमारे देश के बच्चों को को दो भागों में बाट दिया है , तो दूसरी ओर बच्चों पर इंजीनियर, डॉक्टर, आईएस या किसी मल्टीनेशनल कम्पनी में नौकरी पाने का मानसिक दबाव इतना अधिक होता है कि बच्चा उस दबाव को झेल नहीं पाता और गलत रास्तों पर चल पड़ता है।
भले ही आज की शिक्षा व्यवस्था में स्कूलों (निजी) में एक सलाहकार की नियुक्ति होती है, जो बच्चों की अभिरुचि को समझकर उसे दिशा देते हैं। इन सबके बाद भी देखा तो यही गया है कि बच्चे को स्कूल की पढ़ाई के साथ साथकोचिंग सेंटर में जाकर भी पढ़ाई करनी पड़ती हैं; क्योंकि उसके सामने एक गोल निर्धारित होता है, जहाँ उसे पँहुचना ही होता है। जाहिर है स्कूल और कॉलेज़ की पढ़ाई वहाँ तक पहुँचने में सहायक नहीं होती, तभी वह दूसरे गुरु के पास जाता है ,जो उसे वहाँ तक पहुँचने का मार्ग बताता है। आज बड़े- बड़े कोचिंग सेंटर अपना विज्ञापन करते हुए शान से यह बताते हैं कि इतने बच्चे उनके यहाँ से पढ़ाई करने के बाद देश के सबसे बड़े संस्थान में नौकरी कर रहे हैं या टॉप के दस शिक्षा संस्थानों में जगह बना पाए हैं।
आखिर ऐसी शिक्षा व्यवस्था क्या संकेत देती है ? यही ना कि हम हमारे स्कूल और कॉलेजों में बच्चों को उस स्तर की पढ़ाई नहीं करवा पाते ,जो उन्हें इन कोचिंग सेंटर्स में मिलती है। यह हमारी शिक्षा- व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। दरअसल हमारे यहाँ बच्चों की विभिन्न रूचि को ध्यान में रखते हुए शिक्षा देने की कोई व्यवस्था ही नहीं है। शिक्षा-व्यवस्था एक भेड़चाल की तरह है बस एक के पीछे एक चलते रहो। नया मार्ग चुनने का कोई विकल्प ही नहीं होता। नतीजा -युवा गलत रास्तों पर चल पड़ता है। यही कारण है कि बेकारी- बेरोजगारी भी वृहत् स्तर तक पहुँच गई है। 
आज की राजनीति में युवाओं को आगे आने के लिए प्रोत्साहित तो किया जाता है ,पर यहाँ भी उनका इस्तेमाल सिर्फ कुर्सी पाने के लिए ही होता है। भटकाव के रास्तों की मीन यहाँ भी तैयार होती है। सही रास्ता दिखाने का मार्ग किसी एक संस्था, किसी एक स्कूल या कॉलेज में तैयार नहीं होता और न सिर्फ परिवार में होता है। यह सब सबकी मिली-जुली व्यवस्था से संचालित होता है। आज की अराजक परिस्थितियों में कोई भी संस्था युवा शक्ति को सही दिशा दिखाने की इच्छुक नहीं लगती।
आखिर सेना में जाकर एक जवान अपनी जान हथेली पर रखकर देश के लिए कुर्बान होने को कैसे तैयार हो जाता है, परिवार में माता- पिता द्वारा दिया गया संस्कार, स्कूल में मिली शिक्षा, फिर सेना का शिक्षण- प्रशिक्षण। जो एक साधारण युवा का असाधारण बना देता है कि वह बिना एक पल भी सोचे देश के लिए मरने को तैयार रहता है। उसका लक्ष्य सच्चा और सीधा होता है। वहाँ वह सिर्फ अपने लिए नहीं लड़ता देश के लिए लड़ता है। देश के लिए कुछ करने का यही जज़्बा हर युवा के दिल में जगाना होगा चाहे वह किसी भी क्षेत्र में काम करता हो। यदि मैं की भावना छोड़कर सबके लिए की भावना प्रबल होगी ,तभी देश के युवा देश को आगे बढ़ाने में सक्षम हो पाएँगे। 

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