November 25, 2016

लोककथा

          एक लोककथा पर आधारित- परिवर्तित रूप में
            चमत्कारी रात
                       - गोवर्धन यादव
शरद पूर्णिमा का दिन था। चाँद अपने पूरे यौवन के साथ आकाश पटल पर चमचमा रहा था। मौसम बड़ा सुहाना हो गया था। रात के बारह बजे सारा जंगल आराम से सो रहा था। चारों ओर शांति का साम्राज्य था।
 पेड़ की एक डाल पर बन्दर और बन्दरिया बैठे जाग रहे थे और दूसरी डाल पर तोता और मैना बैठे हुए थे। यह वह समय था जब पशु-पक्षी एक दूसरे की भाषा समझते थे।
तोता बोला- मैना, रात नहीं कट रही है। कोई ऐसी बात सुनाओ कि वक्त भी कट जाए और मनोरंजन भी हो।
मैना मुस्कुराई और बोली- क्या कहूँ आप बीती या जग बीती। आप बीती में भेद खुलते हैं और जग बीती में भेद मिलते है।
 तोता होशियार था, बोला- तुम तो जगबीती सुनाओ
 मैना ने कह- आज की रात एक चमत्कारी रात है। आज ही के दिन चन्द्रमा से अमृत बरसेगा। अमृत की कुछ बूंदे कमलताल में भी गिरेगी, जिससे इसका पानी चमत्कारी गुण? से युक्त हो जाएगा। यदि कोई प्राणी आधी रात को इस कमलताल में कूद जाए तो आदमी बन जाएगा।।
 तोता बोला, क्या सचमुच में ऐसा हो सकता है।
 मैना ने कहा -जो प्रेम करते हैं, वे सवाल नहीं पूछते, भरोसा करते हैं।
तोते ने मैना से कहा- तो फ़िर देर किस बात की।
चलो हम दोनों तालाब में कूद पते हैं और आदमी बन जाते हैं।
 मैना ने कहा, 'अरे तोता, हम पंछी ही भले। अभी तू आदमी के फेर में नहीं पड़ा है, इसलिए चहक रहा है। हम अपनी ही जात में बहुत खुश हैं।
तोता-मैना की बातें बन्दर और बन्दरिया ने सुनी तो चौंक पड़े। अधीर होकर बन्दरिया ने बन्दर से कहा- साथी आओ। कूद पड़ें।
 बन्दर ने अँगडाई लेते हुए कहा- अरे छोड़ रे सखी, हम ऐसे ही खुश हैं। एक डाल से दूसरी और दूसरी से तीसरी पर छलांग मारते रहते हैं। पेड़ पर लगे मीठे-मीठे फल खाकर अपना गुजर-बसर करते हैं। न घर बनाने की झंझट और न ही किसी बात की चिन्ता। हमें क्या दुख है। अपने दिमाग से आदमी बनने का ख्याल निकाल दे।
 बन्दरिया आह भरकर बोली- ये जीवन भी कोई जीवन है? मैं तो तंग आ गई हूँ इस जीवन से। मुझे यह सब करना अच्छा नहीं लगता। आदमी की योनि में जन्म लेकर मैं दुनिया के सारे सुख उठाना चाहती हूँ। देखो, मैंने अपना मन बना लिया है और मैं अब तालाब में कूदने जा रही हूँ। यदि तुम मुझसे सच्चा प्यार करते हो तो मेरा साथ देना होगा। मैना की  बताई घड़ी बीतने वाली है, सोच क्या रहे हो, आओ पकड़ मेरा हाथ और कूद पड़ें।
 बन्दरिया की बात सुनकर बन्दर हिचकचाने लगा। बोला- तुम भी मैना की बातों में आ गयी।
 पानी में तो कूद पड़ेंगे, लेकिन किसी जहरीले साँप ने काट लिया तो मुफ़्त में जान चली जाएगी।
 बन्दरिया समझ गयी कि बन्दर साथ न देगा। घड़ी बीतने ही वाली थी। बन्दरिया चमत्कार देखने के लिए उत्सुक थी, झम्म से कमलताल में कूद पड़ी।
 आश्चर्य, बन्दरिया की जगह वह सोलह साल की युवती बन गई थी। उसके रुप से चाँदनी रात जगमगा उठी।
 डाल पर बैठे बन्दर ने जब उसका अद्भुत रूप देखा तो पागल हो उठा। उसने तत्काल फ़ैसला लिया कि वह भी कमलताल में कूदकर आदमी बन जाएगा। उसने डाल से छलांग लगाया और तालाब में कूद पड़ा, लेकिन वह शुभ घड़ी कभी की बीत चुकी थी। वह बन्दर का बन्दर ही बना रहा।
दिन निकला।
 थर-थर कांपती युवती, सूरज की गुनगुनी धूप में अपना बदन गर्माने लगी थी।
 तभी संयोग से एक राजकुमार उधर से आ निकला। उसने उस रुपवती युवती को देखा तो बस देखता ही रह गया। उसने अपने जीवन में इतनी खूबसूरत युवती इसके पहले कभी नहीं देखा थी। देर तक अपलक देखते रहने के बाद, वह उसके पास पहुँचा और अपना उत्तरीय उतारकर उसके कंधों पर डाल दिया। फ़िर अपना परिचय देते हुए  कहा हे सुमुखी। सुलोचनी। मैं इस राज्य का राजकुमार हूँ और शिकार खेलने के लिए इस जंगल में आया हूँ। इससे पहले मैंने तुम्हें यहाँ कभी नहीं देखा। तुम्हें देखकर यह नहीं लगता की तुम इस लोक की वासी हो। हे ! त्रिलोकसुन्दरी बतलाओ, तुम किस लोक से इस धरती पर अवतरित हुई हो और तुम्हारा क्या नाम है ?
एक अजनबी और बाँके युवक को सामने पाकर वह शर्म से छुईमुई सी हुई जा रही थी। शरीर में रोमांच हो आया था।
 सोचने- समझने की बुद्धि कुंठित सी हो गई थी। वह यह तय नहीं कर पा रही थी कि प्रत्युत्तर में क्या कहे। क्या उसे यह बतलाए कि कुछ समय पूर्व तक वह बन्दरिया थी और अर्धरात्रि में इस कमलताल में कूदने के बाद एक सुन्दर-सुगढ़ युवती बन गई है? देर तक नजरें नीचे झुकाए वह मौन ओढ़े खड़ी रही थी।
राजकुमार ने दोनों के बीच पसरे मौन को तोड़ते हुए कहा-  मैं भी कितना मूर्ख हूँ, जो ऐसे-वैसे सवाल पूछ बैठा।
 मुझे यह सब नहीं पूछना चाहिए था।
 देवी मा करें। मेरी एक छोटी सी विनती है, उसे सुन लीजिए।
 तुम्हारी यह कमनीय काया जंगल में रहने योग्य नहीं है। तुम्हारे ये नाजुक पैर उबड़-खाबड़ और कठोर धरती पर रखने लायक नहीं है। फ़िर जंगल के हिंसक पशु तुम्हें देखते ही चट कर जाएँगे। मैं नहीं चाहता कि तुम उनका शिकार बनो। तुम्हें तो किसी राजमहल में रहना चाहिए। तुम कब तक इस बियाबान जंगल में यहाँ-वहाँ भटकती रहोगी। मेरा कहा मानो और मेरे साथ राजमहल में चली चलो। मैं दुनिया के सारे वैभव, सुख-सुविधाएँ तुम्हारे कदमों में बिछा दूँगा। तुम्हें अपनी रानी बनाकर रखूँगा। पूरे राजमहल में तुम्हारा ही हुक्म चलेगा। देर न करो और चली चलो मेरे साथ।
शायद सच कह रहे हैं राजकुमार, अब यह कमनीय काया जंगल में रहने लायक रह नहीं गई है। उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि अब वह बन्दरिया नहीं, एक नारी बन गई है और एक नारी को अपना तन कने के लिए कपड़े चाहिए, फ़िर तन सजाने के लिए आभूषण चाहिए। अब वह पेड़ पर नहीं रह सकती। उसे रहने को घर चाहिए और भी वह सब कुछ चाहिए, जिसकी सुखद कल्पना एक नारी करती है। यह ठीक है कि उसका मन अब भी अपने प्रिय में रम रहा है, लेकिन वह उसकी आवश्यक्ता की पूर्ति नहीं कर सकता।
 उसे तो अब चुपचाप राजकुमार का कहा मानकर उसके साथ हो लेना चाहिए इसी में उसकी भलाई है।
यह सोचते हुए उसने राजकुमार के साथ चलने की हामी भर दी थी।
 घोड़े पर सवार होने के पहले उसने अपने प्रिय को अश्रुपूरित नेत्रों से देखा और हाथ हिलाकर बिदाई माँगी।
बन्दर ने देखा कि उसकी प्राणप्रिया राजकुमार के साथ जा रही है, तो उसने उन दोनों का पीछा किया।
 कहाँ घोड़े की रफ़्तार और कहाँ बन्दर की दुड़की चाल।
 भागता भी तो बेचारा कितना भागता।
 दम फूलने लगा था। आँखों के सामने अन्धकार नाचने लगा और अब मुँह से फेन भी गिरने लगा था आखिरकार वह बेहोश होकर गिर पड़ा।
संयोग से उधर से एक महात्मा निकल रहे थे। वे सर्वज्ञानी थे। बन्दर को देखते ही सारा माजरा समझ गए।
उन्होंने अपने कमण्डल से पानी लेकर उसके मुँह पर छींटे मारे।
बन्दर को होश आ गया।
 होश में आते ही बन्दर फफक कर रो पड़ा और उसने महात्माजी से अपना दुखड़ा कह सुनाया।
 महात्मा ने उसे धीरज बँधाते हुए कहा कि तुम्हें अपने साथी पर भरोसा करना चाहिए । यदि तुम भरोसा करते तो ये दिन न देखने पड़ते। खैर जो होना था, सो हो चुका। अब तुम किसी मदारी के साथ हो लो। कुछ दिन बाद तुम्हें तुम्हारी प्रियतमा मिल जाएगी।
संयोग से उधर से एक मदारी निकला। उसने बन्दर को पक लिया। अब वह गाँव-गाँव, शहर-शहर तरह -तरह के करतब दिखलाता घूमने लगा।
इधर, राजकुमार उस युवती से विवाह करने की जिद करने लगा। लेकिन उसका मन तो अब भी अपने प्रिय में ही लगा था।
 राजकुमार के प्रस्ताव को टालने के लिए उसने एक बहाना गढ़ दिया कि उसने कोई एक ऐसा व्रत ले लिया है कि जिसके चलते वह एक साल तक विवाह नहीं कर सकती। साल पूरा होते ही वह  विवाह रचा लेगी।
 राजकुमार मान गया, लेकिन वह हमेशा उदास बनी रहती। उसे उदासी में घिरा देखकर, राजकुमार को बहुत दुख होता, वह अपनी ओर से उसकी उदासी दूर करने का जितना भी प्रयास करता, लेकिन उसके चेहरे पर प्रसन्नता की झलक तक दिखला नहीं देती।
 एक दिन राजकुमार ने उससे कहा कि मैं ऐसा क्या करुं कि तुम खुश हो जाओ।
 बन्दरिया से कमलिनी बनी युवती ने कहा- राजकुमार, यदि आपके राज्य में कोई मदारी-कलावंत अथवा कोई संगीतकार अपनी कला का प्रदर्शन करने आए, तो उसे सबसे पहले मेरे महल में आकर अपनी कला का प्रदर्शन करना होगा।
 युवती की बात मानते हुए उसने पूरे राज्य में डौंडी पिटवा दी कि कोई भी कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करना चाहता है ,तो उसे सबसे पहले कमलिनी के सामने अपनी कला का प्रदर्शन करना होगा।
संयोग से वह मदारी उस राज्य में आ पहुँचा। नियम के मुताबिक उसे उस युवती के सामने अपनी कला का प्रदर्शन करना था। मदारी की रस्सी से बँधे बन्दर को देखते ही उसने पहचान लिया।
 उसने मदारी को कुछ अशर्फ़ियाँ देकर उसे खरीद लिया।
 अब वह दिन भर बन्दर के साथ रहती।
 पुराने दिनों की याद करती और अपना दुखड़ा रोती रहती।
एक दिन, तोता और मैना उड़ते हुए अटारी पर आ बैठे।
 इस समय कमलिनी आराम कर रही थी और बन्दर पास ही बैठा हुआ था।
 तोते ने मैना से कहा-सुनो। इस घड़ी कोई मर जाए और उसे नींबू के पेड़ के नीचे दबा दिया जा तो अगले जनम में वह आदमी बन जाएगा।
 इतना कहकर वे फ़ुर्र से उड गए। बन्दर ने तोते की बात सुन ली थी। उसने उसे जगाते हुए कहा कि मैं अपने प्राण त्यागने जा रहा हूँ।
 तुम मुझे नींबू के पेड़ के नीचे दफ़ना देना। अगले जनम में मैं आदमी बन जाउँगा और तुमसे विवाह रचा, लूँगा। फ़िर हम सदा-सदा के लिए एक दूसरे के हो जाएँगे। इतना कहकर उसने अपने प्राण त्याग दिए।
 राजकुमारी अगली घड़ी का रास्ता देखने लगी।
 रात आ तो उसने राजकुमार से कहा कि मेरा भी अंत समय आ गया है।
 मेरे मरने के बाद तुम मेरे शरीर को नींबू के पेड़ के नीचे दफ़ना देना।
कुछ दिनों बाद दोनों का जन्म हुआ।
 युवती ने एक ब्राह्मण के घर और बन्दर ने एक निम्न जाति के घर मे जन्म लिया।
 दोनों को अपने पूर्व जन्म का पूरा-पूरा ज्ञान था
  पड़ोस के सारे बच्चे मिलकर खेल खेलते और वह बालक अपनी देहरी पर बैठा उनके खेल देखता रहता।
 उसका भी मन होता कि वह भी बच्चों के संग खेले, लेकिन कोई उसे साथ खिलाने को तैयार नहीं होता।
 बच्चों के बीच खेलती कमलिनी उसका दर्द समझती थी, लेकिन समाज के बनाए नियमों को तोडऩे की हिम्मत उसमे न थी।
 एक दिन सारे बच्चे छिपा-छिपल्ली का खेल खेल रहे थे।
 कमलिनी को कहीं छिप जाना था और शेष बच्चों को उसे ढूँढना था।
 यह उसके लिए सुनहरा मौका था।
 उसने देहरी पर बैठे बालक का हाथ पकड़ा और पास के जंगल में जा छिपी।
 सारे बच्चे उसे दिन भर ढूँढते रहे ;लेकिन उसे कोई खोज नहीं पाया।
 वह दिन भर उसके साथ यहाँ-घूमती रही।
 ढेरों सारी बातें करती रही और अपना दुख व्यक्त करने से नहीं चूकती कि निष्ठुर समाज उन्हें कभी एक नहीं होने देगा।
शाम ढलने से पहले वह बच्चों के बीच आ पहुँची।
 सारे बच्चों को इस बात पर आश्चर्य हुआ कि आखिर वह कौनसी जगह पर जा छिपी थी।
- इस तरह दिन पर दिन बीतते रहे और वह लोगों की नजरों से छिपती-छिपाती अपने प्रिय से मिलती रही।
 लेकिन यह खेल ज्यादा दिन तक नहीं चल सका था।
 अब वह जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी थी।
 उसके माता-पिता ने अब उस पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे।
 उसका घर से बाहर निकलना तक बंद कर दिया था।
 वह दिन भर अपने घर के भीतर कैदी की भाँति रह रही थी, लेकिन उसका बावरा मन उसके अपने प्रिय के इर्द-गिर्द घूमता रहता था।
 एक दिन, मौका पाकर वह घर से भाग निकली और अपने प्रिय को लेकर जंगल की ओर निकल पड़ी।
 जंगल का एकांत उसे बड़ा प्रिय लग रहा था।
 वह उसके साथ यहाँ-वहाँ विचरती रही, ढेरों सारी बातें करती रही कि किस तरह उनका मिलन हो सकता है, पर गंभीरता से विचार-विमर्श करती रही।
 वे अच्छी तरह जानते थे कि घर से भाग जाने के बाद भी उन्हें खोज निकाला जाएगा और फ़िर उसका निर्दय समाज उनकी किस तरह की दुर्गत बनाएगा, जिसकी कल्पना मात्र से शरीर में सिहरनें होने लगती थी।
 यहाँ-वहाँ विचरते रहने के बाद वे बुरी तरह से थक गए थे और एक विशाल पेड़ के नीचे सो गए थे।
 संयोग से उधर से एक आदमी निकला जो दोनों के माता-पिता को जानता था।
 उसने उन दोनों को कई-कई बार साथ-साथ विचरते देखा था।
 दोनों को साथ सोता देखकर उसका माथा घूमने लगा था।
 उसे तो आश्चर्य इस बात पर हो रहा था कि उच्च कुल ब्राह्मण के घर पैदा हुई लड़की, एक चांडाल के लड़के के साथ आराम फ़रमा रही है।
 उसे क्रोध हो आया और वह सीधे उस ब्राह्मण के घर जा पहुँचा और जोर-जोर से चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगा- अरे सुनते हो पंडित।
घोर कलियुग आ गया है घोर कलियुग। 
घर से बाहर निकलकर पंडितजी ने पूछा- अरे यूँ ही चिल्लाते रहोगे या कुछ बतलाओगे भी।हम भी तो सुने कि आखिर माजरा क्या है?
 उस आदमी ने सारा किस्सा एक साँस में कह सुनाया और कहा कि  तुम अभी और इसी समय मेरे साथ चलो और अपनी आँखों से देखो कि तुम्हारी लड़की उस नीच के साथ क्या गुल खिला रही है।
 सुनते ही पंडित का चेहरा क्रोध में तमतमाने लगा था।
 वह उस आदमी के साथ हो लिया।
 वहाँ जाकर उसने देखा कि उस लड़के ने अपनी बाहें फैला रखी थी और उसकी बेटी उसकी बाहों पर अपना सिर रखकर आराम से सो रही थी।
 अब पंडितजी के क्रोध का पारावार देखने लायक था।
 उसने पेड़ से एक टहनी तोड़ी और दोनों को जगाते हुए बेरहमी से पीटने लगा।
 फ़िर लड़के को हिदायत देते हुए कहा कि अगर तुम दोबारा साथ दिखे तो तुम्हारे पूरे परिवार को बस्ती से बाहर निकलवा दूँगा।
दाँत पीसते हुए उसने लड़की की बाहें पकड़ीं और लगभग घसीटता हुआ उसे लेकर अपने घर की ओर चल पड़ा।
 उस दिन के बाद से दोनों का मिलना न हो सका। बावजूद इसके वे इस प्रयास में रहते कि किसी तरह उनका मिलना संभव हो सके।
अचानक एक दिन दोनों की मुलाकात हो गई। दोनों ने तय किया कि जंगल की ओर भाग चलें और वहाँ बैठकर जी भर के बातें करेंगे। बातों ही बातों में दिन कब ढल गया और रात हो आयी, उन्हें पता ही नहीं चल पाया।
 संयोग से उस दिन शरद पूर्णिमा थी। चाँद अपने पूरे यौवन के साथ आकाश पटल पर चमचमा रहा था। तभी तोता और मैंने कहीं से उडते हुए आए और एक डाल पर बैठ गए।
 तोता बोला- मैना, कितनी सुहावनी रात है। ऐसी अद्भुत रात में भला किसे नींद आती है।
 तुम कोई ऐसी बात सुनाओ कि वक्त भी कट जाए और मनोरंजन भी हो।
 मैना मुस्कुराई और बोली- क्या कहूँ। आप बीती या जगबीती।
 आप बीती में भेद खुलते हैं और जगबीती में भेद मिलते हैं।
 तोता होशियार था, बोला - तुम तो जगबीती सुनाओ।
 मैना ने तोते से कहा- तुम्हें याद है कभी इसी पेड़ पर एक बन्दर और बन्दरिया रहा करते थे। उस दिन भी ऐसे ही अद्भुत रात थी।
 उस दिन बन्दरिया मनुष्य योनि में जन्म लेने के चक्कर में कमलताल में कूद पड़ी थी और एक सुन्दर युवती बन गई थी।
 जब  बन्दर ने देखा कि उसकी प्रियतमा नारी बन गई है, तो वह भी आदमी बनने के लालच में कमलताल में कूद पड़ा, लेकिन तब तक वह शुभ घड़ी बीत चुकी थी। वह बन्दर का बन्दर ही बना रहा।
 किसी तरह दोनों की मुलाकात तो हो गई लेकिन अलग-अलग योनियों में जन्म लेने के कारण उनका मिलन नहीं हो सकता था।
 अगले जनम में वे मनुष्य योनि में जनमे तो सही, लेकिन जात-पात के चलते उनका दुबारा मिलना असंभव सा प्रतीत होता है।
 और भविष्य में कभी हो सकेगी, इस बात की संभावना भी दिखाई नहीं देती।
 हाँ, यदि वे अपनी पुरानी योनि में फ़िर से जनम लेना चाहते हैं , तो आधी रात के वक्त कमलताल में कूद पड़ें। यदि ऐसा वे कर सके तो उनका मिलन संभव हो सकता है।
इतना कहकर तोता और मैना फ़ुर्र से उड़ गए।
सुना। सुना तुमने, मैना क्या कह रही थी ? कह रही थी कि यदि हम आधी रात के वक्त कमलताल में कूद पड़ें तो फिर से अपनी पुरानी योनि प्राप्त कर सकते है। क्या तुम मेरे साथ देने को तैयार हो?
पिछली बार तुमने मुझसे कमलताल में कूदने की जिद की थी और मैंने तुम्हारा साथ नहीं दिया था, जिसकी सजा मैं अब तक भुगत रहा हूँ।
 अब मैं तुमसे कह रहा हूँ कि चलो कमलताल में कूद पड़ते है और फ़िर से बन्दर-बन्दरिया बन जाते हैं।अधीर होकर उस युवक ने कमलिनी से कहा।
 कमलिनी इस समय गंभीरता से कुछ और ही सोच रही थी।
 शायद इसलिए उसने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया था।
 वह तो इस समय, पिछले जनम की बातों को लेकर सोच रही थी कि कितनी स्वछन्दता के साथ वह अपने प्रिय के साथ रहा करती थी, जहाँ न तो जात-पात के बन्धन थे और न ही किसी बात पर टोका-टाकी। न मन में कोई चाहना और न ही कोई अभिलाषा। जब जी चाहा, वहाँ चले गए, और जब जी चाहा, वापिस हो लिये
 नाहक ही उसने मैंना की बातों में आकर मनुष्य बनने की चाहत पाल ली थी और कूद पड़ी थी ताल में।
 क्या मिला उसे मनुष्य योनि में जनम लेकर? सिवाय दुख और परेशानी के वह कुछ भी तो हासिल नहीं कर पा है अब तक।
 कमलिनी अब तक अपनी सोच के घेरे से बाहर नहीं आ पा थी, उधर युवक का दिल जोरों से धड़क रहा था।
 उसे पक्का यकीन हो चला था कि वह उसका साथ नहीं देगी।
 उसने भी तो उस समय उसका साथ देने में हिचकचाहट दिखला थी,
 यदि वह बदला लेना चाह रही है तो ठीक ही कर रही है।
 उसने किसी तरह अपने आप पर काबू रखते हुए, उसके अन्तिम फ़ैसले के बारे में जानना चाहा और उसे लगभग झझकोरते हुए पूछा- तुम कहाँ खोई हुई हो।
तुम्हें कुछ पता भी है कि मैना के द्वारा बतला गई घड़ी बीतने जा रही है और तुम हो कि अब तक फ़ैसला नहीं कर पायी।
 बोलो।  कुछ तो बोलो, आखिर क्या चाहती हो तुम।
 तुम मेरा साथ दोगी या नहीं? एक गहरी उदास भरी नजरें उसके चेहरे पर डालते हुए उसने पूछा और उसके उत्तर का इंतजार करने लगा था।
कुछ चैतन्य होते हुए उसने उस युवक का हाथ पकड़ा और तेजी से दौड़ लगाते हुए उस चट्टान पर जा खड़ी हुई, जहाँ से उसे कमलताल में छलांग लगानी थी।
सम्पर्क: 103, कावेरीनगर, छिन्दवाड़ा (मप्र) 480001
mo. 07162-246651, 09424356400

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बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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