September 10, 2011

दम तोड़ता सच

- संजय जनागल
गुलाम को गिरफ्तार कर लिया गया, क्योंकि बस स्टेण्ड पर बम फटने से पहले वह वहाँ पर खड़ा था। बस स्टेण्ड पर उस समय केवल वह एक ही मुसलमान था। इसलिए शक उस पर गया। अंधेरे कमरे में गुलाम को घेरे पुलिस अधिकारी बोले, 'बता इस घटना के पीछे किसका हाथ है?'
'साब मैं सच कह रहा हूँ। मुझे इस बम के बारे में कुछ भी पता नहीं?'
आंखे तरेरकर साहब बोला, 'तो फिर ये बता कि तू पाँच बजकर पाँच मिनट पर बस स्टेण्ड पर कैसे खड़ा था?'
'साहब मैं तो वहाँ पर अपने बच्चे रहमान की स्कूल बस का इंतजार कर रहा था।' गुलाम ने रोते हुए कहा।
'तड़ाक- तड़ाक, धम- धम' सभी पुलिस अधिकारियों ने हाथ साफ किये। 'साले झूठ बोलता है' कहते हुए सभी अफसरों ने मार-मार कर उससे गुनाह कबूल करवाया। गुनाह कबूल करने के बाद उसे जेल में एक तरफ पटक दिया गया।
एक कोने में सिसकता गुलाम जेल की छत की तरफ देखते हुए मन में सोचने लगा, 'मेरे खुदा, यह कौन से गुनाह की सजा है जो तू मुझे दे रहा है।' फिर जोर-जोर से रोने लगा। उसकी आवाज जेल की दीवारों में ही दब कर रह गई।
दूसरे दिन अखबार के मुख्य पृष्ठ पर पुलिस अधिकारियों के बहादुरी के किस्से और इनाम की घोषणाएँ छपी- कि उन्होंने एक खूंखार आतंकवादी को पकडऩे में सफलता प्राप्त की है।

मजबूरी

मैंने पीएचडी करने की सोची। दिनों-दिन पीएचडी करने की तृष्णा बढऩे लगी थी। हर किसी से इसके बारे में चर्चा करता, लेकिन कोई राह दिखाई नहीं दी। काफी मशक्कत के बाद एक सर ने हाँ भर दी। फोन पर बात की तो कहा घर आ जाना बात कर लेंगे। दो दिन बाद घर आने को कहा।
दो दिन बाद घर के आगे खड़ा डोर बेल बजा रहा था। अन्दर से एक लड़के ने दरवाजा खोला। मुझे ड्राइंग रूम में बिठाया। मैं वहाँ बैठकर प्रतीक्षा करने लगा। कुछ देर के बाद वो लड़का पानी लेकर आया और फिर मेरा नाम पूछा और काम भी।
फिर वह पुन: अंदर चला गया। करीब आधे घण्टे बाद उस लड़के ने बताया कि सर किसी काम में उलझे हुए हैं इसलिए आज नहीं मिल सकेंगे, मुझे कल आने को कहा गया। मैंने जाने से पहले उस लड़के से पूछा, 'आप कौन है?'
लड़के ने कहा, 'मैं सर के गाइडेन्स में पीएचडी कर रहा हूँ।' लड़के का उत्तर सुनकर मेरे पांव वहीं जम गये। चाहते हुए भी मैं चल नहीं पाया।
असमंजस में पड़ गया कि पीएचडी के लिए दोबारा पूछने आऊँ या नहीं।

छोटा परिवार

लड़की के लिए लड़का तलाश रहे राधे ने दोस्त को अपनी व्यथा बतायी-'मोनू यार क्या बताऊँ? लड़की का रिश्ता कहीं तय हो तो लड़के के बारे में सोचूं?'
'आखिर किस तरह का लड़का चाहिये तुझे?' मोनू ने पूछा।
'मैं चाहता हूँ कि मेरी बेटी को छोटा परिवार मिले। जहां तक हो लड़का एक ही हो और ज्यादा से ज्यादा, बस दो। जो भी लड़का नजर में आता है उसका परिवार बड़ा ही होता है। माँ-बाप, दादा-दादी, दो भाई, दो बहिनें। पूरा संयुक्त परिवार ही मिलता है। आखिर करूँ तो क्या करूँ?'
मोनू ने अपना हाथ राधे के कंधे पर रखते हुए कहा, 'देख यार जिस तरह तू अपनी लड़की के लिए छोटे परिवार की तलाश कर रहा है, उसी प्रकार दूसरे लोग भी अपनी- अपनी लड़कियों के लिये छोटे-छोटे परिवार ढूँढ रहे हैं। परन्तु तू मुझे बस एक बात बता, अगर बच्चे माता-पिता को अपने साथ नहीं रखेंगे तो आखिर बूढ़े माँ-बाप कहाँ जायेंगे? परिवार तो बढ़ेगा ही। तुझे तो बल्कि संयुक्त परिवार में ही अपनी बेटी देनी चाहिए।'
मोनू की बात सुनकर राधे को अपने बूढ़े माँ-बाप का ख्याल आया जिन्हें पिछले सप्ताह ही वृद्धाश्रम में छोडऩा पड़ा था क्योंकि लड़की के पिता की शर्त थी कि परिवार छोटा होना चाहिए और उनका लड़का-लड़की से प्यार भी करता था।

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
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