September 10, 2011

छत्तीसगढ़ में राम वनवास की कथा


प्रस्तुत ग्रंथ 'छत्तीसगढ़ की राम कथा' छत्तीसगढ़ प्रदेश एवं देश के लिए एक महान उपलब्धि है। जिसमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के दण्डकारण्य आने के प्रामाणिक प्रसंगों को प्रकाश में लाने का प्रयास किया गया है। ग्रंथ में विभिन्न रामायणों से सामग्री एकत्रित की गई है। भगवान श्रीराम ने निरंतर 10 वर्षों तक दण्डकारण्य में न केवल राक्षसों का वध कर ऋषि मुनियों को सुख शांति प्रदान किया बल्कि स्थानीय जन- जातियों को संगठित एवं शिक्षित कर क्षमता एवं नेतृत्व विकास का अभूतपूर्व कार्य किया। ग्रंथ के संपादकीय में लिखा है कि 'छत्तीसगढ़ की प्राचीनतम संस्कृति और इतिहास को जानने समझने का समय आ गया है। छत्तीसगढ़ की सभ्यता और संस्कृति न केवल प्राचीनतम है, अपितु सर्वोपरि भी है, जिसे ऋषि-कृषि संस्कृति के नाम से जाना जाता है। आदिमानव को जन्म देने वाली हमारी मातृभूमि छत्तीसगढ़ है। भगवान श्रीराम के युग से पहले भी छत्तीसगढ़ ज्ञान- विज्ञान का केंद्र था।'
इस गं्रथ में प्रदेश के प्रबुद्ध लेखकों के राम वनगमन से संबंधित 22 आलेख प्रकाशित हैं। विश्वास है कि छत्तीसगढ़ अस्मिता प्रतिष्ठान के इस प्रयास से भगवान श्रीराम की कथा का जो प्रसंग रामायण में स्थान नहीं पा सका था उसकी पूर्ति होगी और यह छत्तीसगढ़ के इतिहास और धरोहर को संग्रहणीय बनाएगा। छत्तीसगढ़ की प्राचीन संस्कृति एवं गौरव को स्थापित करने में यह ग्रंथ मील का पत्थर साबित होगा। ग्रंथ के प्रधान संपादक भाषाविद् डॉ. मन्नू लाल यदु हंै। संपादक मंडल में श्याम बैस, डॉ. हेमू यदु, राधाकृष्णा गुप्ता, इंजी. अमरनाथ त्यागी तथा योगेश यादव शामिल हैं। राम वनगमन शोध संस्थान छत्तीसगढ़ अस्मिता प्रतिष्ठान रायपुर द्वारा प्रकाशित यह प्रथम संस्करण है, जिसका मूल्य 500/- रुपए है।

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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