September 10, 2011

झील पर तैरती बस्तियां

- पा.ना. सुब्रमणियन
दक्षिण अमरीका की सबसे ऊंची और लम्बी पर्वत श्रंृखला 'एंदेस (हिमालय के बाद यही पृथ्वी पर सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला है) उस महाद्वीप के उत्तर से दक्षिण तक लगभग 7000 किलोमीटर लम्बी है। इसी पर्वत के ऊपर दुनिया का सबसे ऊँचाई में स्थित (समुद्र तल से 3810 मीटर- 12580 फीट) नौचालन योग्य झील 'टिटिकाका' भी है जो लगभग 180 किलोमीटर लम्बा है। इस झील का बड़ा हिस्सा पेरू में समाहित है जबकि एक हिस्सा बोलीविया के अन्र्तगत भी आता है। 13 वीं से लेकर 16 वीं शताब्दी तक इस क्षेत्र में 'इनका' सभ्यता फल फूल रही थी।
इस झील में एक विस्मयकारी बात जो दिखाई देती है वह है वहां के तैरते हुए टापू। उस इलाके में एक जनजाति 'उरो' हुआ करती थी जो इन्काओं से भी पहले की थी। बाहरी आक्रमण से अपने आपको बचाने के लिए उन्होंने एक नायाब तरीका ढूँढ निकाला। इसके लिए सहायक हुई वहां झील के किनारे उगने वाली एक जलीय वनस्पति (रीड-मुश्कबेंत) avsscv अंग्रेजी में Scirpus totora कहा गया है। एक प्रकार से यह हमारे भर्रू वाला पौधा ही है जो लगभग 8/10 फीट तक ऊंचा होता है। अन्दर से पोला। समझने के लिए कह सकते हैं कि पतला सा बांस जिसे बेंत सरीखे मोड़ा भी जा सकता हो। इन लोगों ने इस तोतोरा को काट- काट कर एक के ऊपर एक जमाया जिससे एक बहुत ही मोटी परत या प्लेटफोर्म बन जाए। आपस में उन्हें जोड़ कर वाँछित लम्बा चौड़ा भी बना दिया। यह पानी पर तैरने लगी। इसे इतना बड़ा बना दिया कि उस पर अपनी एक झोपड़ी भी बना सकें। अब उनकी झोपड़ी पानी पर तैरने लगी। तोतोरा की एक खूबी यह भी है कि पानी में रहते हुए उनकी जड़ें निकल कर आपस में एक दूसरे को गूँथ भी लेती हैं। जब नीचे का भाग सडऩे लग जाता तो ऊपर से एक और परत तोतोरा की बिछा दी जाती। इस तरह यह प्लेटफोर्म कम से कम 30 वर्षों तक काम में आता है। वैसे वे लोग इन झोपडिय़ों में किनारे ही रहा करते थे और अपने प्लेटफोर्म को किनारे से बांधे रखते थे परन्तु जब भी उन्हें बाहरी लोगों के आक्रमण का डर सताता तो वे किनारा छोड़ कर झील में आगे निकल जाते थे जैसे हम अपनी नावों को करते हैं। हाँ ये लोग तोतोरा की डंठलों से अपने नाव का भी निर्माण करते हैं। समुद्र में जाने योग्य बड़े- बड़े नाव इस तोतोरा से बनाये जाने का भी उल्लेख मिलता है। तोतोरा केवल उरो लोगों की ही नहीं बल्कि झील के किनारे रहने वालों के जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। जिस प्रकार बांस से हम दैनिक उपयोग की वस्तुएं, कलात्मक सामग्रियां आदि बनाते हैं, वैसे ही तोतोरा का भी प्रयोग होता है।

तोतोरा की एक खूबी यह भी है कि पानी में रहते हुए उनकी जड़ें निकल कर आपस में एक दूसरे को गूँथ भी लेती हैं। जब नीचे का भाग सडऩे लग जाता तो ऊपर से एक और परत तोतोरा की बिछा दी जाती।

इसी तकनीक को आधार बनाकर टिटिकाका झील में बड़े- बड़े द्वीप बना दिए गए हैं जिनमें कई झोंपडिय़ाँ बनी हुई हैं। उरो जनजाति के तो लगभग 1000 लोग ही जीवित हैं परन्तु इन द्वीपों में बसने वाले उनमें से आधे ही हैं। कहा जाता है कि उरो जनजाति के लोगों का खून काला होता था (शायद हमारे काले गुलाब की तरह) जो उन्हें वहां उस जानलेवा ठंडे पानी के ऊपर जीने के लिए सहायक हुआ करता था। शुद्ध उरो मूल की अंतिम महिला का निधन 1959 में हो गया था और आज जो वहां बसते हैं वे 'ऐमारा' और 'इनका' से मिश्रित वर्ण के हैं। फिर भी वे उरो परंपरा को संजोये हुए हैं। उनकी भाषा भी अब बदल कर ऐमारा लोगों की हो गयी है।
मूलत: उरो लोग तो बड़े ही शर्मीले प्रकृति के रहे हैं परन्तु आज जो उनके वंशज तितिकाका के बड़े- बड़े द्वीपों जैसे तोरानिपाता, हुआका, हुअकानि, सांता मारिया आदि में रह रहे हैं वे वास्तव में एकदम आधुनिक हैं। आलू और बार्ली की खेती करते है, मछलियों और पक्षियों का शिकार भी करते हैं। उन्हें मालूम है कि कैसे उनकी जीवन शैली को देखने के लिए बाहरी लोगों को जुटाया जाए। उन्होंने अपने द्वीपों में पर्यटकों के रहने के लिए भी कमरे बना रखे हैं। सर्वसुविधायुक्त। उनके स्वयं के घरों में भी सभी आधुनिक संसाधन उपलब्ध हैं जैसे फ्रीज, डिश टीवी वगैरह। बिजली के लिए इन्होंने सौर ऊर्जा के संयंत्र लगा रखे हैं। पर्यटक वहां रहें, उनके साथ नाचे गाएं, उनका खाना खाएं। लेकिन एवज में अपनी गाँठ भी ढीली करें।
इन लोगों की तैरती बस्तियों तक पहुँचने के लिए हमें पूनो जाना होगा जिसे टिटिकाका का प्रवेश द्वार कहते हैं। यहाँ से मोटर बोट मिलते हैं जिनमें आगे की यात्रा की जाती है। पूनो जाने के लिए पेरू की राजधानी लीमा से नियमित उड़ाने उपलब्ध हैं। पूनो के पास वाला हवाई अड्डा जुलियाका कहलाता है। अब जब पेरू जा ही रहे हैं तो वहां 'माचू पिच्चु' भी देख आना चाहिए। पहाड़ों पर 'इनका' लोगों के द्वारा बसाया गया प्राचीन नगर जो विश्व के सात नए आश्चर्यों में से एक है। यदि ऐसा कार्यक्रम बनता है तो लीमा से 'कुज्को' की उड़ान भरनी होगी। कुज्को से रेलगाड़ी चलती है और पूनो तक आती भी है। इस तरह एक पंथ दो काज। माचू पिच्चु भी देख लेंगे। आप धोखे में न रहे। हम यहाँ कभी नहीं गए परन्तु सपना तो देख ही सकते हैं।
संपर्क: 23, यशोदा परिसर, कोलार रोड, भोपाल (मप्र) मो. 09303106753


0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष