October 24, 2009

तरी नरी नहाना री नहना रे सुआ ना...

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में दीपावली के समय घर- घर जा कर नृत्य करते हुए सुआ गीत गाने की लोक- परंपरा है। इसमें महिलाएं गोल घेरा बनाकर खड़ी हो जाती है और संवाद, सवाल-जवाब शैली में दो दल में विभक्त हो ताली बजा कर सुआ गीत  गाती है। घेरे के बीच में बांस की टोकनी में धान भर कर प्रतीक के रूप में सुआ अर्थात मिट्टी से बने दो तोते (मिट्ठू) रखती हैं। ये सुए शिव और पार्वती के प्रतीक माने जाते है। सुआ गीतों में वे नारी मन की व्यथा को अभिव्यक्त करती हैं-
तिरिया जनम झन देव
तिरिया जनम मोर गऊ के बरोबर
रे सुअना, तिरिया जनम झन देव
बिनती करंव मय चन्दा सुरुज के
रे सुअना, तिरिया जनम झन देव
चोंच तो दिखत हवय लाले ला कुदंरु
रे सुअना, आंखी मसूर कस दार...
सास मोला मारय, ननद गारी देवय
रे सुअना, मोर पिया गिये परदेस
तरी नरी नहना मोर नहना री ....
रे सुअना, तिरिया जनम झन देव....
इस गीत के माध्यम से वह चांद सूरज से विनती करती है कि अगले जनम में वह स्त्री बनकर जनम नहीं लेना चाहती, उसका प्रिय परदेश चला गया है। प्रिय के परदेश जाने के बाद सास उसे मारती है, ननद गाली देती है। इस तरह की जिन्दगी से वह तंग आ गई  है इसलिए अब वह नारी का जन्म नहीं लेना चाहती।
सुआ गीत मूलत: गोंड आदिवासी नारियों का नृत्य गीत है जिसे सिर्फ स्त्रियां ही गाती हैं। यह गीत महिलाएं एवं लड़कियां दीपावली के पूर्व से लेकर देवोत्थान एकादशी तक घर- घर जा कर गाती हैं।  सुवा गीत गाने की यह अवधि धान के फसल के खलिहानों में आ जाने से लेकर उन्हारी फसलों के परिपक्वता के बीच का ऐसा समय होता है जहां कृषि कार्य से कृषि प्रधान प्रदेश की जनता को किंचित विश्राम मिलता है।

भारतीय परम्परा व संस्कृत- हिन्दी साहित्य में प्रेमी-प्रेमिका के बीच संदेश लाने ले जाने वाले वाहक के रूप में जिस प्रकार कबूतर का महत्वपूर्ण स्थान रहा है उसी तरह छत्तीसगढ़ में शुक का स्थान  है।  बोलियों का हूबहू नकल करने के गुण के कारण एवं सदियों से घर में पाले जाने के कारण शुक यहां की नारियों का भी प्रिय पक्षी है। तभी तो वे इस पक्षी को साक्षी मानकर उसे अपने दिल की बात बताती हैं।
'तरी नरी नहा ना री
नहना रे सुवा ना,
कहि आते पिया ला संदेस'
कहकर वियोगिनी नारी यह संतोष करती है कि उनका संदेसा उनके पति, उनके प्रेमी तक पहुंच रहा है।
नृत्य और गीत के समाप्ति पर  तब घर- मालकिन रूपया-पैसा अथवा चावल, दाल आदि भेंट स्वरुप देकर विदा करती है। जाते जाते वे परिवार वालों को धन्य धान्य से भरा- पूरा रहने का आशीर्वाद देती हैं। इसे भी वे गीत के माध्यम से व्यक्त करती है-
जइसे ओ मइया लिहे दिहे
आना रे सुअना।
तइसे तैं लेइले असीस
अन धन लक्ष्मी म तोरे घर भरै रे सुअना।
जिये जग लाख बरीस...।
(उदंती फीचर्स)

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
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