July 18, 2009

बूढ़ादेव काकोप

- डॉ. बलदेव
छत्तीसगढ़ के आदिवासियों में पनपता असंतोष, विद्रोह, अन्याय के खिलाफत करने का एक उदाहरण, सही घटना पर आधारित कहानी।
 सरपंच ने दूर से ही देख लिया था, साईकिल से वह उतरा। उसे सामने खड़े देखकर मैंने भी गाड़ी रोक दी। हालचाल पूछने पर उसने बताया साहब सरकार ने जनहित में मुकदमा वापस ले लिया हम सब लोग बरी हो गये। बधाई देते हुए मैंने कहा अब सुख शांति से रहो भाई।
सुख शांति अब कहां साहब लड़ाई तो अब शुरु होगी। पिछली बार तो अंजोर की चूक के कारण साला जिंदा बच निकला था... अब ...
मैंने टोकते हुए कहा- देख भाई पाले का गलना तो तय है, लेकिन उससे खड़ी फसल बरबाद हो
जाती है।
 रुआंसे स्वर में उसने कहा-खेती बारी तो इन तीन महीनों में चौपट हो ही गयी साहब।
अब भाई धीरज धरो, गांव के तुम्हीं मुखिया हो, अगर तुम ही बहक गए तो बेचारों मजदूर किसानों  का क्या होगा? उसकी आंखे छलछला गयी बोला - साहब चुनाव है न इसीलिए केस वापिस ले लिया गया, उदार नेता जी ने सेठ के नुकसान का एक का दो भर दिया। जनता का पइसा है न? इस चुनाव में देखते हैं, ये गांव में कैसे घुसते हैं। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। बूढ़ादेव के कोप से इन कुत्तों को कौन बचाएगा साहब?
मैंने हामी भरते हुए कहा- भाई जब भगवान का नाम लेते हो तो उसके न्याय पर भी विश्वास करो।
घनघोर जंगल के बीच की सूनी सड़क। अंधेरा बढ़ता ही जा रहा था। इसलिए जल्दी ही हम अपनी दिशाओं में बढ़ गए।

रास्ते भर सरपंच का वह तमतमाया चेहरा याद आता रहा। गंगी सेठ की करतूतें याद आने लगी। उसी ने अपने स्वार्थ से भोले-भाले इन वनवासियों को लठैत बनाया था। याद आया पल्टूसिंग के इस नवाबजादे का घिनौना चेहरा काली करतूतें... इन्हीं भोले भाले लोगों को ठगकर, फुसलाकर, डरा धमकाकर वह करोड़पति बना हुआ है। याद आया बाजार का वह दिन ...।
महुए, सरईबीज, लाख, चिरौंजी की टोकरी उठाए बनवासी महिलाएं ही-ही बक-बक करती बाजार की ओर जा रही हैं। बातचीत शुरु है -
'सभी सावचेत हो जाओ गंगी सेठ को कुछ भी नहीं बेचना है।'
'क्यों तू तो पहले उस पर मरती थी क्या हुआ।'
'चुप्प भउजी, कौन उस बुड्ढे पर मरेगा हां बताए देती हूं उसकी दुकान के पास तक नहीं जाना है।'
'क्यों कुछ बतलाएगी भी?'
'अरे नहीं जानती। उसके लड़के ने गांव के दो अनाथ बच्चों को ट्रक से कुचला है। गांव में एका हो गयी है, जो कोई भी उसके यहां लेनदेन करेगा उसे जुर्माना हो जाएगा।' उसके टेक्टर में भी नहीं चढऩा है। 'टेक्टर रहेगी तब ना। पहले तो जब्त हो गयी है।'
'अरे तुम किस दुनिया में रहती हो, वह तो कब का छुड़ाकर ले आया है, और उसके लड़के का क्या हुआ, उसे तो जेल में बंद कर दिये थे न?'
'अरे पगली सेठ की पहुंच मंत्री तक है, दो ही दिन में उसे जमानत मिल गयी अब वह गुलछर्रे उड़ा रहा है।' अब तो सरदार के टेक्टर में चढऩा है, वह हफ्ता पांच रुपए अधिक देगा, सड़क काम फिर शुरु होने वाला है।
मैं कल अस्पताल गई थी दीदी। बेचारे लड़के के दोनों पैर कट गए हैं, लड़की के हाथ पैर में प्लास्टर चढ़े हैं, चेहरा कुरुप हो गया है, इससे तो अच्छा था बूढ़ादेव उसे अपने पास बुला लेता। 'भले ही थाना-कचहरी सेठ का कुछ भी न बिगाड़ सके। बेचारा सिदार लोकलाज के भय से रिपोट तक नहीं लिखा सका। डागडर बाबू को गला दबाकर किसने मारा? उसकी नर्स बाई को कौन रखा है? हमारे बूढ़ादेव ने क्या किया?
'अरे पगली वह सब देख रहा है, देख लेना एक दिन बूढ़ादेव का क्रोध उसे भस्म कर देगा।' बातचीत करते-करते वे महिलाएं बाजार पहुंच गई और इधर-उधर बिखर गयीं। इस दिन बाजार गर्म था। तरह-तरह की बातें हो रही थी। बाजार का दिन और छेरछेरा का पर्व। जवान लटलट ले पिये हुए थे। कोई भजिया खा रहा था तो कोई मूंगफली छील रहा था। कोई गाली गलौज कर रहा था। लेनदेन करने वाले अपने कामों में लगे थे। शोर के ऊपर शोर। बाजार में घूमने हुए चेलिकों ने दरोगा को फटफटी में गांव के भीतर जाते हुए देख लिया। अब एक जगह जुडिय़ाने लगे।
उधर गुड़ी चौक में पूछताछ शुरु हुई भारी भरकम शरीर वाले दरोगा ने रौब ने पूछा 'क्या नाम है?'
'पुसु महाराज'
'ये पुसु क्या है रे?'
'फोसवा महाराज, फोसवा माने पुसु।'
'साले ठीक-ठीक बता पुसु उसू क्या बोलता है।'
दूर खड़ा अंजोर सिंह पास आया। गांव का सयाना था बोल पड़ा।
 'पुसु नाम हय साहब इसका फोसवा भी इसे ही कहते हैं।' 'चुप्प बे साले बुड्ढ़ा हमको समझाता है, भाग साले यहां से नहीं तो तेरी गौटिआई घुसेड़ दूंगा।'
अंजोर सिंह डर गया और गुड़ी से बाजार की ओर बढ़ गया। आगे दरोगा ने पूछा - 'हां तो नाम क्या बताया रे।' पुसु महाराज पुसु।
'अच्छा ठीक है, अब ये बता, सेठ की टे्रक्टर कौन चलाता है।'
'मैं'
'साले तेरे पास लाइसेंस है? '
'हां साहेब'
'दिखा'
'सेठ रखा है साहेब?'
'अच्छा उस दिन टे्रक्टर तू ही चला रहा था।'
'न ही महाराज '
'तो कौन चला रहा था?'
'बंटी'
'बंटी कौन'
'सेठ का लड़का है साहेब, उस दिन मुझे ढकेल कर उसी ने स्टेरिंग घुमाई और बच्चों को कुचल दिया।Ó
'साला झूठ बोलता है?'
'नहीं बंटी ही चला रहा था साहेब।'
सहसा ही दरोगा की नशा चढ़ी आंखे लाल हुई और तीन झापड़ पुसु की कनपटी में दे मारा। पिस्तौल तानते हुए दरोगा ने धमकाया बोल साले गाड़ी तू ही चला रहा था ना?
'ना हो।'
'मुन्शी जी कागज में इसका अंगूठा लो।'
'साहब मैं पढ़ा लिखा हूं।'
'अच्छा है, अंगूठा नहीं देता तो दस्तखत कर...'
'साहब ये तो कोरा है।'
 'तो क्या हुआ, कानून मत बघार सीधे दस्तखत कर, नहीं तो, पिस्तौल देख रहा है न उड़ा दूंगा-'
कांपते हुथ से पुसु ने दस्तखत कर दिया फिर मुन्शी ने पास खड़े कई लोगों से अंगूठे का निशान ले लिया... और बस्ता बांधने लगा। दरोगा उठने ही वाला था कि इतने में चेलिकों के झुंड ने उसे घेर लिया।
उत्तेजित युवकों को देखकर दरोगा सहम सा गया। चन्दन सिंह, अंजोर सिंह, सिदार का बेटा गबरू जवान आवाज को दबाकर बोला-क्यों साहब, कागज में क्या लिखा है, हम बयान पढऩा चाहते हैं। दरोगा धूर्त और चालाक तो था ही अनुभवी भी कम नहीं था। उसने नरम स्वर में कहा- 'सरकारी कागजात है भाई, इसे आप लोग देखकर क्या करोगे?' साहब रिपोर्ट हमने की थी, तो कागज तो हम देखेंगे ही, कहता हुआ वह मुंशी के हाथों से कागज झपट लिया। कोरे कागज में दस्तखत और अंगूठों के निशान देखकर चंदन आग बबूला हो गया, उसे फाड़ता हुआ एक झन्नाटेदार झापड़ मुन्शी के गाल में जड़ दिया।
दरोगा जी बताइए क्या चाहते हैं आप?
अरे भई कागज में क्या रखा है मैं तो सेठ को समझाने ही आया था।
'तो भेंट हुई?'
'हां'
'आपने क्या बोला।'
'मैंने कहा देख सेठ मामला संगीन है। अनाथ बच्चे हैं उनकी जिंदगी तो बरबाद हो गयी है, अच्छा है एक-एक लाख रुपए देकर मना ले।'
'सेठ ने क्या कहा?'
सेठ ने कहा 'इन भेड़ गंवारों को एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा।
आगे दरोगा ने क्या बताया चेलिकों ने नहीं सुना। वे बाजार की ओर दौड़े। भगदड़ मच गयी-तेल और मिट्टी तेल झपट लिए गए... मिनटों में आग की लपटें आकाश को छूने लगी।'

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