Saturday, June 13, 2009

चींटियां

एक साल में 400 किलो 
पत्तियां काटकर फफूंद को खिलाती हैं
प्रत्येक 'खेतिहर' चींटी किसी विशिष्ट फफूंद की खेती करती हैं। शेष फफूदों को अपने खेतों में आने से रोकने के लिए चींटियां फफूंद-रोधी पदार्थों का उपयोग करती हैं। ये फफूंद-रोधी पदार्थ चींटियां स्वयं नहीं बनाती बल्कि चींटियों के शरीर पर रहने वाले जीवाणु बनाते हैं।
शायद आप न जानते हों कि चींटियां पिछले 5 करोड़ सालों से खेती करती आ रही हैं। वे अपने 'खेतो' में फफूंद उगाती हैं और उन्हें खाती हैं। इन फफूंदों को उगाने के लिए ये चींटियां पत्तियां काट-काटकर लाती हैं और उन्हें क्यारियों में बिछा देती हैं ताकि फफूंद इनका उपयोग अपने भोजन के रूप में कर सकें। लेकिन पत्तियों को पचाना आसान काम नहीं होता।
 वैज्ञानिक मानते थे कि ये फफूंदें जरूर पत्तियों में पाए जाने वाले मुख्य पदार्थ सेल्यूलो$ज को पचा सकती होंगी मगर जब इन फफूंदों को प्रयोगशाला में उगाया जाता, तो ये सेल्यूलो$ज को पचाने में असमर्थ रहती थीं। अब लगता है कि इस रहस्य का खुलासा होने को है। प्रत्येक 'खेतिहर'  चींटी किसी विशिष्ट फफूं द की खेती करती हैं। शेष फफूंदों को अपने खेतों में आने से रोकने के लिए चींटियां फफूंद-रोधी पदार्थों का उपयोग करती हैं। ये फफूंद-रोधी पदार्थ चींटियां स्वयं नहीं बनाती बल्कि चींटियों के शरीर पर रहने वाले जीवाणु बनाते हैं।
यह बात तो केमरॉन क्यूरी ने 10 साल पहले ही पता कर ली थी कि इन 'खेतिहर ' चींटियों के शरीर पर एक्टिनोमायसीट समूह के जीवाणु पाए जाते हैं। अब क्यूरी ने हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, बोस्टन के जॉन क्लार्डी और अन्य साथियों के साथ मिलकर ऐसा एक फफूंद-रोधी पदार्थ शुद्घ रूप में प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की है। इसे उन्होंने 
डेंटीजेरुमायसीन नाम दिया है और यह कैन्डिडा अल्बीकेन्स नामक खमीर के खिलाफ कारगर साबित हुआ है। इस आधार पर केमरॉन का मत है कि ये चींटियां तो दवाइयों के चलते फिरते कारखाने हैं। मगर सेल्यूलोज की बात तो रह ही गई। और क्यूरी ने इस महत्वपूर्ण मामले पर भी प्रकाश डाला है। क्यूरी का कहना है कि चींटियों की एक बस्ती की चींटियां प्रति वर्ष करीब 400 किलोग्राम पत्तियां काटकर फफूंदों को खिलाती हैं। फफूंद इन पत्तियों को पचाती हैं मगर चींटियों द्वारा पाले गए जीवाणुओं की मदद से ही वे यह काम कर पाती हैं। यानी जहां पहले दो जीवों (चींटी और फफूंद) के परस्पर सम्बंधों की बात हो रही थी, वहां लगता है कि वास्तव में तीन जीव शामिल हैं।
चींटियों की बस्तियों में जीवाणुओं की मदद से फफूंद द्वारा सेल्यूलोज को पचाया जाना इन्सानों के लिए जैव ईंधन का बढि़या स्रोत साबित हो सकता है। वैज्ञानिक जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं कि सेल्यूलोज को तोडऩे का कोई कारगर तरीका हाथ लग जाए। क्यूरी का मत है कि यही वह तरीका है।

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