June 13, 2009

बचपन

इन्हें टीवी देखने से कैसे रोकें?
दो साल से कम उम्र के बच्चों को टेलीविजन बिल्कुल भी नहीं देखने देना चाहिए जबकि दो साल से बड़े बच्चों को भी दो घंटे से ज्यादा टीवी देखने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

टेलीविजन अच्छी बातों के साथ-साथ बुराई का भी स्रोत हो सकता है। कई अनुसंधानों से खुलासा हुआ है कि टीवी पर दिखाई जाने वाली हिंसा से बच्चों के व्यवहार में आक्रामकता बढ़ी है, वे समाज-विरोधी कार्यों में प्रवृत्त हुए हैं। दुर्भाग्य से भारत में ऐसी कोई गाइडलाइन नहीं है जो यह तय कर सके कि विभिन्न उम्र के बच्चों के लिए कितना टीवी देखना अच्छा है और कितना बुरा। नवंबर 2008 में मुंबई के ताज व ओबेराय होटलों और सीएस टर्मिनल पर हुआ आतंकी हमला शारीरिक त्रासदी से भी कहीं बढ़कर था। इसका उन बच्चों की मानसिकता पर गंभीर असर पड़ा जिन्होंने इससे सम्बंधित प्रसारण को टीवी पर देखा।
इस घटना के बाद मनोचिकित्सकों के पास लाए जाने वाले ऐसे बच्चों की संख्या में 25 फीसदी इजाफा हुआ है जो चिंता और अनिद्रा की समस्या से ग्रस्त हैं। आम तौर पर ये बीमारियां स्कूली उम्र के बच्चों में नहीं पाई जाती हैं। दक्षिण मुंबई के वे बच्चे जिन्होंने अपनी खिड़कियों से इन आतंकी वारदातों को देखा था, अब सेना में जाने की तमन्ना रखने लगे हैं।
अभिभावकों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि उनके बच्चों के लिए टीवी कितना सुरक्षित है। इसको लेकर हमारे यहां कोई गाइडलाइन भी नहीं है। इसीलिए अभिभावकों ने टीवी पर मुंबई त्रासदी के दृश्यों को अपने बच्चों को देखने दिया जिनका लाइव प्रसारण टीवी चैनलों पर लगातार किया जा रहा था। यहां तक कि आतंकियों के सफाए के बाद भी बच्चे आतंकी हमले के टीवी फुटेज से चिपके रहे।
आम तौर पर टीवी के आदी बच्चों की शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती हैं और वे मोटापे, उच्च रक्तचाप व मधुमेह जैसी बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं। दिल्ली स्थित अपोलो हॉस्पिटल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अनुपम सिबल कहते हैं, 'भारतीय बच्चों के लिए टीवी देखने के मानदंड बनाने का वक्त आ चुका है।' कई पश्चिमी देशों में इस तरह के नियम लागू किए गए हैं। दी अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स ने वर्ष 2004 में अपनी सिफारिश में कहा था कि दो साल से कम उम्र के बच्चों को टेलीविजन बिल्कुल भी नहीं देखने देना चाहिए जबकि दो साल से बड़े बच्चों को भी दो घंटे से ज्यादा टीवी देखने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। चंडीगढ़ की एक गैर सरकारी संस्था हेल्थ एंड मेडिसीन ने उच्च व उच्च मध्यम वर्ग के करीब 500 बच्चों का सर्वेक्षण किया था।
इस सर्वेक्षण में उसने पाया कि बच्चे दिन-प्रतिदिन तनावग्रस्त होते जा रहे हैं और इसकी सबसे बड़ी वजह है टेलीविजन। इससे बच्चों के व्यवहार में आक्रामकता और गुस्सा बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2002 में जारी विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट 'हिंसा एवं स्वास्थ्य' में पहली बार वैश्विक स्तर पर हिंसा के कारण और हिंसा के असर को कम करने के उपाय पेश किए गए थे। हिंसा में रोजाना 1424  लोग मारे जाते हैं यानी लगभग हर एक मिनट में एक व्यक्ति जानलेवा हिंसा का शिकार होता है। इस हिंसा का एक स्रोत यानी टेलीविजन कई घरों में मौजूद है। अमरीका में बच्चे एक सप्ताह में औसतन 23 से 28 घंटे टीवी देखते हैं। एक अनुमान के अनुसार 18 साल की उम्र तक आते-आते एक बच्चा टीवी पर हिंसा के 20 हजार कारनामे देख चुका होगा जिनमें 48 हजार हत्याएं शामिल होंगी। कई अध्ययनों में साबित हो चुका है कि बच्चों के हिंसात्मक व्यवहार के लिए जिम्मेदार कई तत्वों में से टीवी एक बड़ा स्रोत है और इसका असर जिदंगी भर रह सकता है। मसलन, न्यूयार्क में 16 साल का एक किशोर एक शराबखाने का ताला तोड़कर अंदर घुस गया। उसने हाथों में दस्ताने पहन रखे थे। उस किशोर ने बाद में पुलिस को बताया कि उसे टीवी पर देखकर पता चला था कि इस तरह से मौका-ए-वारदात पर उंगलियों के निशान से बचा जा सकता है। इसी प्रकार अलाबामा में एक शिक्षक ने एक नौ साल के लड़के को अच्छे अंक नहीं दिए तो लड़के ने शिक्षक से बदला लेने के लिए जहरीले कार्ड भेजने की योजना बना ली। लड़के ने बाद में बताया कि ऐसा उसने एक रात पहले ही टीवी पर देखा था।
इस्राइल में शोधकर्ताओं ने तेल अवीव और ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों पर अध्ययन किया तो पाया कि दोनों ही इलाकों के बच्चे टीवी पर हिंसात्मक कार्यक्रमों को देखना पसंद करते हैं, लेकिन शहरी बच्चों ने न केवल कार्यक्रमों के चरित्रों के साथ खुद को जोड़ लिया, बल्कि उन्होंने टीवी की हिंसा को वास्तविक जीवन का ही प्रतिबिंब करार दिया।
प्रारंभिक स्कूली उम्र (6 से 11 साल) में बच्चों की ध्यान देने व संज्ञान लेने की क्षमता में बढ़ोतरी होती है और वे पात्रों को व उनकी नीयत को पहचानने तथा उनके कार्यों के नतीजों को समझने लगते हैं। साथ ही वे मानसिक प्रयास भी कम करने लगते हैं। यही मानसिक प्रयास तय करता है कि वे टीवी से मिलने वाली सूचनाओं को गहराई से ग्रहण करते हैं या ऊपरी तौर पर।
टीवी की हिंसा बच्चों की बाद की जिदंगी पर असर डाल सकती है। यह बच्चों को समय से पहले ही वयस्क बना सकती है। बहुत छोटे बच्चे भी काफी तेजी से गतिशील कार्टून पात्रों के जरिए हिंसा से रू-ब-रू होते हैं। बच्चे केवल हिंसात्मक दृश्यों से ही आकर्षित नहीं होते, बल्कि उसके साथ अन्य मजाकिया फीचर्स भी उन्हें पसंद आते हैं। जैसा कि मनोविज्ञान के प्रोफेसर जॉन मरे कहते हैं, 'पात्रों को गोली मारी जाती है और इसे जिस तरह हास्य के साथ फिल्माया जाता है उससे बच्चों को संदेश जाता है कि हिंसा तो मजाक जैसी है और इसलिए उसमें कोई दिक्$कत नहीं है।'
टीवी पर हिंसात्मक दृश्य देखने के बाद छोटे बच्चे खेलकूद के दौरान अपेक्षाकृत अधिक आक्रामक व्यवहार करते हैं। टीवी सीरियल कूंग- फू की वजह से बच्चों में मार्शल आर्ट के प्रति रुझान फैशन की तरह बढ़ गया। कुछ स्कूलों में तो बच्चे उसी प्रकार के सितारे बनाते और एक-दूसरे पर फेंकते पाए गए जैसा कि इस सीरियल में दिखाया गया।
माना जाता है कि टीवी की हिंसा लोगों को जिदंगी की वास्तविक विभीषिकाओं के प्रति संवेदनहीन बनाती है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह न्यूयार्क की 9/11 या मुंबई की 26/11  जैसी घटनाओं के आघात को सहने के लिए हमें पूर्व से तैयार नहीं कर सकती। अधिकांश लोग गैंगस्टर्स की फिल्मों को इस भावना के बगैर देखते हैं कि हिंसा की उन्हें जरूरत है। दरअसल, पुराने जमाने में दोषियों को सरेआम फांसी देने या रोमन काल में हिंसात्मक ग्लैडिएटर खेलों या थिएटरों में प्रदर्शनों का मुख्य मकसद ही यही होता था कि लोग विद्रोह या बगावत से दूर रहें। टीवी पर हिंसात्मक दृश्यों को रोकना आसान है, लेकिन व्यावसायिक हितों की वजह से ऐसा नहीं किया जाता। ऐसे में बच्चों को हिंसात्मक कार्यक्रमों से दूर रखने की सारी जिम्मेदारी अभिभावकों पर ही है। बच्चों को हिंसात्मक दृश्यों से दूर रखने का एकमात्र तरीका तो यही है कि जब भी ऐसा कोई दृश्य आए, टीवी बंद कर दें।
एक छोटे बच्चे के लिए उसके अभिभावक ही आदर्श होते हैं। यदि वह बचपन में यह सीख लेता है कि टीवी पर क्या चीज उसके लिए खराब है, तो बड़ा होने पर भी वह उसे खराब ही मानेगा और टीवी पर ऐसे खराब दृश्यों के आने पर स्वयं ही टीवी बंद कर देगा। अधिकांश माता- पिता सेक्स संबंधी दृश्यों को अपने बच्चों के लिए देखना ठीक नहीं मानते हैं और ऐसे दृश्य आते ही वे टीवी बंद कर देते हैं। ठीक यही रवैया वे हिंसात्मक दृश्यों को लेकर भी आजमा व अपना सकते हैं। (स्त्रोत)
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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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